सम्मानित करने का टुकड़ा

ज्यों ही यह खबर पूरे जंगल में जंगल की आग की तरह फैली कि मैं अबके फिर अपनी टांग अड़ा सरकार की नरवंश अधिसूचना कमेटी का सक्रिय सदस्य हो गया हूं, तो मुझे देश के समस्त पशुओं, जानवरों के संगठनों के फोन पर फोन आने लगे। आदमी तो मुझे देखते ही ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। फोन पर फोन आने पर पहली बार ये भी पता चला कि आदमी से अधिक संगठन, संप्रदाय तो देश में पशुओं, जानवरों के हैं। संगठनों, संप्रदायों को लेकर हम बेकार में अपनी -अपनी दरी अपनी बगल में दबाए, हर गली मोहल्ले में बिछाए इतराते फिरते हैं।

अपना बस एक यही पैशन है कि मैं सरकार की हर कमेटी में टांग अड़ा कर ही दम लेता हूं। या कि अब सरकार मेरी टांग के लिए जगह हर हाल में हर कमेटी में आरक्षित रखती है कि हाशियार! खबरदार !! एक टांग  आना अभी बाकी है। जगह बचाए रखो।  अब तो कई बार मुझे भी इस बात का पता नहीं चलता कि मेरी टांगों में इस उम्र में भी इतनी ताकत आखिर है कैसे जो हर कमेटी में मजे से अड़ जाती हैं। मानता हूं, टांगों में अब पहले जितना दम नहीं , पर ये भी तो हो सकता है अब टांग अड़ाने का अनुभव ही अपना फर्ज अदा कर रहा हो? अब तो पता ही नहीं चलता कि कब जैसे मेरी कौन सी टांग किस सरकारी कमेटी में मेरे बिना प्रयास के ही फिट कब और कैसे हो गई? बस, पता तब चलता है जब मैं अपने को सरकार की अमुक कमेटी का सक्रिय सदस्य नॉमिनेट हुआ पाता हूं।

धन्य हो भगवान तुम! तुमने मुझे और कला दी हो या न पर सरकार की हर कमेटी में अपनी टांग अड़ाने की सब कलाओं की मां एक कला तो ऐसी दी है कि उसके आगे लोक, परलोक, स्वर्गलोक की सारी कलाएं बिना किसी चूं चां के पानी भरती हैं। जिसके पास जहां उसका मन करे, अपनी टांग अड़ाने की सिद्ध कला हो उसकी इस कला के आगे शेष सब कलाएं बौनी लगती हैं, आधी पौनी लगती हैं।

अधजले का भरापन इसी में है कि जब कोई उसको फोन कर रहा हो तो वह उसे दो चार बार कॉल करने दें, अपने फोन को व्यस्त करते हुए। ऐसा करने पर दूसरे को ऐसा लगेगा कि अधजला हद से अधिक व्यस्त है। ऐसा होने पर उसे अधजले का कद न होने के बाद भी अधजले के ताड़ से भी ऊंचे कद का भ्रम होगा। अतः जो बौने अपने बौने कद को लेकर चिंतित हों उन्हें मेरी नेक सलाह है कि वे जब उनको किसीका फोन आए तो एकदम न उठाएं। ऐसी आदत डालने पर उन्हें अपने बौनेपन से पक्का छुटकारा मिल सकता है।

लगातार आते फोन को जब मैं व्यस्त करते -करते ऊब गया तो मैंने अनमने से आई कॉल अटैंड कर ही ली,‘ कौन??’

‘नमस्कार सर! सादर प्रणाम सर! चरणवंदना सर!’ दूसरी ओर से एक साथ इतने सारे चमचागीरी वाले आदर सूचक संबोधन सुनने को मिले तो मैं पल में ही भांप गया कि जो कोई भी हो, बंदा हद से आगे का चापलूस होगा ,‘कहिए कौन?’

‘सर, मैं गधा संघ का दुखिया बोल रहा हूं।’

‘दुखिया या मुखिया?’

‘मुखिया तो तब बनूं जो आपकी कृपा बरस जाए।’

‘देखो! अभी तो बादल भी नहीं बरस रहे । इंद्र तक गर्मी से परेशान हो विदेश भ्रमण पर निकल गए हैं।  अब रहे दूसरे कृपा बरसाने वाले, सो वे खुद अंदर हो दूसरों की कृपा की राह निहार रहे हैं। सॉरी, ऐसे में…’ मैं फोन काटने को हुआ तो दूसरी ओर से पीड़ा भरी आवाज यों आई जैसे बंदे ने एनएसडी से एक्टिंग की डिग्री की हो, मैरिट के साथ ,‘ सर एक विनती करनी थी आपसे? आपका हुकुम हो तो….’

‘कहो, पर शॉर्ट में करना,’ मैं अहंकार का साक्षात् रूप हुआ।

‘ओके सर, मुझे समय देने के लिए आपका बहुत- बहुत आभार! सर असल में बात यह है कि पहले तो आपको नरवंश अधिसचना में जानवरों को शामिल करने की योजना पर काम करने का सुअवसर मिलने पर हार्दिक बधाई। आप ही इसके लिए सबसे फिट थे सर! इस शुभ पर हम सर पूरे देश के गधे चाहते हैं कि आपको सम्मानित कर अपने को कृतार्थ करें। सरकार ने आपकी खूबी जानकर हम पर बहुत बड़ा अहसान किया है सर।’

‘वह कैसे??’ मैं चौंका।

‘सर! आपके हाथों ही हमारा कल्याण लिखा था शायद खुदा ने कि आप  इस  अधिसूचना कमेटी के सक्रिय सदस्य बनोगे तो हमें अपने गधेपन से सदा- सदा को मुक्ति मिलेगी। अब आपसे निवेदन है कि हमें भी नरवंश में आप सरकार से कहलवा शामिल करवा दें तो….. सर, बहुत दुख झेले हैं हमने युगों से… प्लीज सर…..’ उसकी बातें सुन मुझे बड़ा गुस्सा आया। क्या ये मुझे भी अपनी तरह गधा ही समझ रहा होगा? पर बात सम्मानित होने की थी , सो चुप रहा और गोलमोल सी बात शुरू कर दी,‘ सो तो बंधु ठीक है पर….’

‘ पर क्या सर …….’

‘अभी बहुत व्यस्त चल रहा हूं। कई और जानवर संघों के भी सम्मानित करने के ऑफर आ रहे हैं सो…..’

‘सर! मरने तक आपका इंतजार कर सकते हैं हम, पर प्लीज निराश मत कीजिएगा। मुद्दत बाद तो आशा की एक किरण आपमें दिखी है। प्लीज हमारे हाथों सम्मानित होने से न मत कीजिएगा सर! आपको सम्मानित कर हमें लगेगा कि जिंदगी में किसी एक को तो हमने सम्मानित कर सही किया।’

‘ तो तुम चाहते क्या हो??’ मैंने उसे मुद्दे पर संकेत ही संकेत में संकेत दिया तो वह फोन पर ही  लतियाया।

‘सर, बस यही कि हमें भी नरवंश की अधिसूचना में जैसे भी हो शामिल कर दो तो हमारा परलोक भले ही सुधरे या न पर कम से कम ये लोक तो सुधर जाए। हम तो हम, हमारी आने वाली पीढ़ियां तक आपके इस उपकार को सदा याद रखेंगी सर।  इसके लिए हम तब तक आपके आभारी रहेंगे जब तक धरती पर गधा समुदाय रहेगा। बाकि रही बात उसकी, तो वह सब आप तक पहुंच जाएगा।’

‘ तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है जो नरवंश में शामिल होना चाहते हो?’ मैंने देश की साधारण सी बात भी बेहद गंभीर होकर कहीं तो लगा सुन वह जैसे अपनी हंसी रोकने की कोशिश कर रह हो ,‘सर! हम देश का हर काम करते हैं। पर अपना काम निकाल बाद में गधा तक हम गधों को लात मारकर आगे हो लेता है। हमें तब बड़ा दुख होता है सर जब आप जैसों की नस्ल को भी हमारे संप्रदाय का मान लिया जाता है। युगों से हमारा शोषण, उत्पीड़न हो रहा है सर! इसीलिए हम आपको बस सम्मानित करना चाहते हैं सर! आपका ऐसा सम्मान करेंगे कि….रत्न, श्री तक अपने को हमसे सम्मानित करने हेतु कांटैक्ट करते फिरें।’

‘ ठीक है। कहीं बीच में समय देखता हूं।’

‘ पर सर! अधिसूचना में शामिल करने का जरूर देख लीजिएगा सर! जो हो सके तो हमें राष्ट्रिय पशु घोषित करवा दें तो …… हमारी ओर से कोई कमी न रहेगी। युगों से गधों तक से बहुत लातें खाई हैं । अब अपना उद्धार केवल और केवल आपके हाथों में है ,’ अब इस  गधे का कुछ तो करना ही पड़ेगा न। सम्मानित होने के सवाल के साथ एक और सवाल का सवाल जो है भाई साहब!

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