डा० सुरेन्द्र नाथ गुप्ता
आज विश्व के लगभग सभी देशों में प्रवासी भारतीय लोग पाए जाते हैं | भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार वर्तमान में प्रवासी भारतीयों की संख्या लगभग 2.8 करोड़ है | भारतीय प्रवासी समुदाय विश्व का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है| विश्व के ग्यारह देशों में तो प्रवासी भारतीयों की संख्या पाँच-पाँच लाख़ से अधिक है | इन प्रवासी भारतीयों में कुछ एन.आर.आई. (नॉन रेजिडेंट इन्डियन) है जो भारतीय पासपोर्ट धारक हैं और विदेशों में नौकरी या व्यापार के लिए गए हैं | परन्तु अनेक प्रवासी भारतीय वे हैं जो विदेशों में जाकर बस गए है और भारतीय पासपोर्ट छोड़ कर विदेशी नागरिक बन गए हैं | इन्हें पी.आई.ओ. (प्यूपिल आफ इन्डियन ओरिजिन) कहा जाता है | पी.आई.ओ. प्रवासियों में एक बड़ा प्रतिशत उनका है जिनकी तीन-चार पीढी पहले पूर्वजों को १९वी सदी के अंत में अंग्रेजो द्वारा झूठे सब्ज बाग़ दिखा कर मारीशस, ट्रिनिडाड, सूरीनाम और फिजी आदि उपनिवेशों में मजदूरी करने के लिए ले जाया गया था | इन अभागे मजदूरों को गिरमिटया कहा जाता था | इनको गुलामों से भी बदतर अमानवीय यातनाएं दी गई | इनमें से अधिकाँश कभी वापस भारत न आ सके और आज भी उनकी सन्ततियां भारत दर्शन की आस मन में संजोए हुए हैं | वे गिरमिट मजदूर अपने साथ रामायण, हनुमान चालीसा, ढोलक और मंजीरा लेकर गए थे और बस उसी के सहारे उन्होंने मृत्यु से सघर्ष करते हुए अपनी भारतीय संस्कृति को सुरक्षित बचाए रखा |
प्रत्येक प्रवासी भारतीय अपने साथ एक छोटा सा भारत अपने साथ लेकर जाता है | यह छोटा भारत और कुछ नहीं बल्कि उसके हिन्दू सांस्कृतिक मूल्य हैं जो भारत से बहुत दूर एक अनजान भूमि पर उसकी अपनी पहचान होती है | प्रवासी हिन्दू किसी भी देश में हों लेकिन उनका भारत के साथ आत्मीय जुड़ाव बना रहता है | भारत के सुख के अवसरों पर उनको हर्ष और दुखः के अवसरों पर उनको विषाद की अनुभूति होती है | भारत की जीत और हार में उन्हें अपनी जीत और हार महसूस होती है | भारत के स्वतंत्रता संग्राम में इन प्रवासी भारतीयों ने भी यथाशक्ति सहयोग किया था | स्वतंत्र भारत में भी अनेक अवसरों पर इनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है | संवैधानिक दृष्टि से कोई प्रवासी हिन्दू चाहे भारत का नागरिक हो या न हो पर उसके मन में भारत अवश्य बसता है अतः उनके सुख-दुखः की चिंता करना भारत का दायित्व है|
विदेशों में बसे हिन्दुओं की आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ती और जन्म से मृत्यु पर्यन्त सोलह सस्कारों की व्यवस्था तथा उनके साथ होने वाले जातीय व् नस्लीय भेदभाव के निवारण का एक ही उपाय है उनको संगठित करना| विदेशों में बसे हुए हिन्दुओं के हितों की रक्षार्थ उनको संगठित करने का कार्य राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कर रहा है| विदेशों में यह कार्य “हिन्दू स्वयं सेवक संघ” के नाम से चलता है| हिन्दू स्वयं सेवक संघ का कार्य पूरी तरह से गैर राजनैतिक है क्योंकि इस संगठन को उस देश की किसी भी राजनीतिक पार्टी का समर्थन या विरोध करना वर्जित है | हिन्दू संस्कृति का अपना वैशिष्ट्य है, यह राष्ट्रों की प्रतिद्वंदिता को नहीं मानती बल्कि वसुधैव कुटुम्बकम और विश्वबंधुत्व के उदात्त मूल्यों के आधार पर राष्ट्रों में परस्पर सहयोग को पुष्ट करती है| अतः प्रत्येक देश में हिन्दू स्वयं सेवक संघ वहाँ के हिन्दू समाज में हिन्दू सांस्कृतिक मूल्यों को पुष्ट करता हुआ उस देश की उन्नति में भरपूर सहयोग करता है| भारत का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ किसी भी देश के हिन्दू स्वयं सेवक संघ को केवल वैचारिक अधिष्ठान प्रदान करता है, लेकिन किसी प्रकार की आर्थिक सहायता न तो देता है और न लेता है| भारत के बाहर हर एक देश में हिन्दू स्वयं सेवक संघ का अपना स्वतंत्र और स्वपोषित संगठन है| विदेशों में हिन्दू स्वयं सेवक संघ के वैश्विक उद्देश्यों के अनुरूप इसका ध्येय वाक्य है “विश्वधर्म प्रकाशेन, विश्व शांति प्रवर्तके” और प्रार्थना भी भारत से अलग है|
हिन्दू स्वयं सेवक संघ की प्रार्थना
सर्वमङ्गल माङ्गल्यां देवीं सर्वार्थ साधिकाम्।
शरण्यां सर्वभूतानां नमामो भूमिमातरम्॥
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वमङ्गल हेतवे।
विश्वधर्मैक मूलाय नमोऽस्तु परमात्मने॥
विश्वधर्म विकासार्थं प्रभो सङ्घटिता वयम्।
शुभामाशिषमस्मभ्यम देहि तत् परिपूर्तये॥
अजय्यमात्मसामर्थ्यं सुशीलम लोक पूजितम्।
ज्ञानं च देहि विश्वेश ध्येयमार्ग प्रकाशकम्॥
समुत्कर्षोस्तु नो नित्यं निःश्रेयस समन्वित।
तत्साधकम स्फुरत्वन्तः सुवीरव्रतमुज्वलम्॥
विश्वधर्म प्रकाशेन विश्वशान्ति प्रवर्तके।
हिन्दुसङ्घटना कार्ये ध्येयनिष्ठा स्थिरास्तुनः॥
सङ्घशक्तिर्विजेत्रीयं कृत्वास्मद्धर्म रक्षणं।
परमं वैभवं प्राप्तुं समर्थास्तु तवाशिषा॥

भारत से बाहर संघ का कार्य सर्वप्रथम अफ्रीका के केन्या देश में १४ जनवरी १९४७ को वहाँ रहने वाले स्वयं सेवक जगदीश चन्द्र शास्त्री व् एक अन्य स्वयं सेवक द्वारा भारतीय स्वयं सेवक संघ नाम से शुरू किया गया था| चूंकि यह संगठन भारत के बाहर एक अन्य राष्ट्र की भूमि पर था अतः बाद में इसका नाम बदल कर हिन्दू स्वयं सेवक संघ कर दिया गया| धीरे-धीरे कार्य का विस्तार हुआ और केन्या के मोम्बासा, एल्डोरेट, मेरु और किसुमु आदि कई नगरों शाखाएँ लगने लगीं| वर्तमान में अफ्रिका महाद्वीप के कई देशों में हिन्दू स्वयं सेवक संघ की साप्ताहिक शाखाएं नियमित रूप से लगती है| लाइबेरिया के मोनरोविआ नगर में रोहित सूजी और उनके साथियों ने १४, अक्टूबर २०१७ से हिन्दू स्वयं सेवक संघ की साप्ताहिक शाखा प्रारम्भ की थी |
ब्रिटेन में हिन्दू स्वयं सेवक संघ की शुरुआत १९६६ में बिर्मिंघम और ब्रेडफोर्ड नगरों की शाखाओं से हुई और शनैः शनैः कार्य का विस्तार होता गया और अनेक नगरों में शाखाएं लगने लगी| ब्रिटेन में हिन्दू स्वयं सेवक संघ के सप्ताह में दो बार पारिवारिक एकत्रीकरण किये जाते हैं, पुरुषों के लिए शाखा, महिलाओं के लिए सेविका समिति और बच्चों के लिए बालगोकुलम लगते हैं जिनमें खो-खो, कब्बडी व् रिंग जैसे खेल और योग व् सूर्य नमस्कार आदि व्यायाम होते हैं और व्यक्तित्व विकास व् बौद्धिक विकास के कार्यक्रम किये जाते हैं| वहाँ के समाज के लिए कई प्रकार के सेवा कार्य भी चलाए जाते है जिससे ब्रिटेन में हिन्दू स्वयं सेवक संघ की सामाजिक स्वीकार्यता और लोक प्रियता निरंतर बढ़ रही है|
कनाडा में १९७० में विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना हुई थी जिसके द्वारा हिन्दू स्वयं सेवक संघ की शाखाएं प्रारंभ की गईं| यू.एस.ए. में हिन्दू स्वयं सेवक संघ का कार्य अनऔपचारिक रूप से १९७१ में प्रारंभ हुआ था परन्तु विधिवत रूप से १९८९ में हिन्दू स्वयं सेवक संघ को टैक्स-मुक्त 501(c)(3) नॉन-प्रॉफिट संगठन पंजीकृत कराया गया| और तब से लगातार इसकी लोकप्रियता बढती जा रही है और कार्य का विस्तार हो रहा है| और आज विदेश में नेपाल के बाद दूसरे नम्बर पर सबसे अच्छा कार्य यू.एस.ए. में है जहाँ १४० शाखाएँ हैं| यू.एस.ए. में करीब बीस लाख़ हिन्दू निवास करते हैं और उनका यू.एस.ए. के सामाजिक सांस्कृतिक व् आर्थिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान है| यू.एस.ए. में शाखाएं साप्ताहिक लगती है और पूरे परिवार सहित लगती हैं | भारत की शाखाओं की ही तरह सर्वप्रथम ध्वजारोहण और ध्वज प्रणाम होता है, ध्वज की बनावट भी भारतीय शाखाओं जैसी है| तत्पश्चात बच्चे बालगोकुलम में भाग लेतें हैं और युवा व् बुजुर्ग योग, खेल, गीत, चर्चा व् बौद्धिक संवाद में अपनी-अपनी रूचि अनुसार सहभाग करतें हैं| शाखा का समापन हिन्दू स्वयं सेवक संघ की वंदना के पश्चात सहभोज के साथ होता है| बालगोकुलम में बच्चों को लघु कथाओं के माध्यम से हिन्दू सांस्कृतिक मूल्यों से अवगत कराया जाता है| अनेक बाल उपयोगी खेल खिलाये जाते है जिनसे बच्चों में चरित्र निर्माण हो और नेतृत्व क्षमता विकसित हो| बालगोकुलम के बच्चों के लिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम तैयार किया गया है और उसके शिक्षको के प्रशिक्षण हेतु पुस्तिका भी तैयार की गई है| एक त्रैमासिक बालगोकुलम पत्रिका का प्रकाशन भी हो रहा है जिसमें अधिकांश बच्चों की ही कविता, कहानी, पेंटिंग आदि प्रकाशित की जाती है| पत्रिका के प्रत्येक अंक में अलग-अलग आयु वर्गों के लिए कई प्रतियोगिताएं भी होती हैं| इस पत्रिका की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यू.एस.ए. के अतिरिक्त कनाडा और आस्ट्रेलिया के बच्चे भी इसको मंगाने लगे हैं| यू.एस.ए. में हिन्दू स्वयं सेवक संघ शाखा के कार्यक्रमों के साथ-साथ अनेक समाज सेवा के कार्य भी करता है जिससे स्थानीय समाज में भी संघ के प्रति सद्भावना निर्माण हो रही है| कोविड-१९ महामारी में भारतीय संघ परिवार के संगठन “सेवा इंटरनेश्नल, यू.एस.ए.” के साथ मिल कर मास्क, सेनीटाईजर और भोजन वितरण के कार्य लगातार किये जा रहे हैं जिनकी वहाँ के मीडिया में भरपूर प्रशंसा हुई है|
हिन्दू स्वयं सेवक संघ का कार्य क्षेत्र विश्व के सभी महाद्वीपों में पहुँच चुका है| आज लगभग ८० देशों में इसका कार्य चल रहा है| दक्षिण पूर्व के देशों इंडोनेशिया, थाईलैंड, सिंगापुर और मलेशिया आदि में जहाँ हिन्दुओं की बड़ी आबादी है वहाँ कार्य सघन है| मध्य एशिया के देशों में सार्वजनिक स्थानों में कार्यक्रमों की अनुमति नहीं है अतः वहाँ शाखाएं निजी घरों में लगाई जाती हैं| हिन्दू स्वयं सेवक संघ एक ओर तो स्थानीय हिन्दू समाज में आत्म विश्वास निर्माण करता है वहीँ विश्व भर के हिन्दुओं में उनकी पुण्य भूमि भारत के प्रति मनोवैज्ञानिक अपनत्व के भाव भी पुष्ट करता है जो भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा की वृद्धि में सहायक होता है|

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