संसार का उपकार और मनुष्यों की शारीरिक-आत्मिक-सामाजिक उन्नति

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मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्य व अन्य प्राणियों का जीवन प्रकृति प्रदत्त संसाधनों एवं दूसरों के उपकार के कार्यों पर निर्भर है। प्रकृति से हमें वायु, जल, अग्नि और अन्नादि पदार्थों सहित निवास वा आश्रय मिलता है। इसी प्रकार संसार में अन्य मनुष्य आदि प्राणियों से भी हम सब उपकृत होते हैं। माता-पिता से तो मनुष्य का जन्म होता ही है, इसके साथ समाज के अन्य मनुष्यों से भी हमें जीवन रक्षक अनेक पदार्थ उपलब्ध होते हैं। कृषक से अन्नादि पदार्थ, गोपालकों से गोदुग्धादि, वस्त्र बुनने का काम करने वालों से वस्त्र, श्रमिकों से हमारे निवास आदि बनने व उनकी समय समय पर मरम्मत आदि कार्य होते रहते हैं। जड़ वृक्ष हमें प्राण वायु और वर्षा, नदियों व कुओं आदि से हमें जल मिलता है। वायु के बिना हम कुछ मिनट भी जीवित नहीं रह सकते और इसी प्रकार जल का भी हमारे जीवन में महत्व है। अतः हमारा भी कर्तव्य है कि हम संसार व समाज की उन्नति के लिए समर्पित हों। हमसे सभी प्राणियों को अभय मिलना चाहिये और उनके जीवनयापन में हम सहयोगी बनें तो हम एक अच्छे मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाओं को पूरा करने वाले मनुष्य कहला सकते हैं। अब प्रश्न यह है कि हम स्वयं से पूछे कि क्या दूसरे प्रकृति व प्राणियों से मिलने वाले लाभों का प्रतिकार हम उन्हें अपनी यथोचित सेवाओं के द्वारा करते व कर रहे हैं वा नहीं? ऐसा करना ही हमारा कर्तव्य होता है और इसी को मनुष्य धर्म कहा जा सकता है। धर्म का अर्थ कर्तव्य होता है और दूसरा अर्थ सत्य का आचरण करना निश्चित होता है। अतः सत्याचरण एवं परोपकार ही धर्म हैं और इसके विपरीत कार्य अधर्म व अकर्तव्य हैं।

हमें संसार के लोगों व प्राणियों का उपकार इस लिए करना है कि वह सब भी हमें उपकृत कर रहे हैं। यदि वह ऐसा न करते तो हमारा जीवनयापन सम्भव न होता। अतः दूसरों की सेवा का प्रतिकार करना ही मनुष्य का कर्तव्य है। मनुष्य इसके लिए क्या करे, इसे ऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने आर्यसमाज के छठे नियम में बताया है। आर्यसमाज का छठा नियम है ‘संसार का उपकार करना इस (आर्य) समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् (सभी मरनुष्यों की) शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।’ इस कर्तव्य व दायित्व का पालन करके ही हम जीवनमुक्त हो सकते हैं। शास्त्रों में ईश्वर साक्षात्कार और जीवनमुक्त अवस्था को ही मोक्ष का प्रमुख कारण बताया गया है। यदि हम ऋषि-मुनियों व महापुरुषों के जीवनों पर दृष्टिपात करें तो वह भी हमें पर-उपकार अर्थात् परोपकार करते हुए ही दिखाई देते हैं। अपने बुद्धिमान ज्ञानी महापुरुषों का अनुकरण करना हमारा कर्तव्य है। हमें महापुरुषों के जीवन से परोपकार की शिक्षा लेनी चाहिये। यदि हम केवल ऋषि दयानन्द जी के जीवन का अध्ययन कर लें तो वह हमें सर्वांगपूर्ण जीवन अनुभव होता है। अन्य की तुलना में उनका जीवन सर्वाधिक प्रेरणादायक एवं अनुकरणीय है। उन्होंने संसार से अज्ञान व अविद्या दूर कर वेदों के अनुसार ज्ञान को स्थापित करने का संकल्प लिया था और वह इस कार्य में सफल भी हुए हैं। उनके प्रयत्नों से आज संसार में वेद अपने यथार्थ अर्थों के साथ उपलब्ध हैं। गायत्री मंत्र को विश्व के अधिकांश लोग जानते हैं और सभी इसे लाभकारी एवं उपयोगी भी मानते हैं। इस मंत्र से ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना भी होती है। इस मंत्र के उच्चारण से हम ईश्वर को अपना गुरु, आचार्य, राजा और न्यायाधीश वरण करते हैं और उससे श्रेष्ठ बुद्धि और सत्कर्मों में प्रेरणा करने की प्रार्थना करते हैं। समाज सुधार के क्षेत्र में भी ऋषि दयानन्द जी ने जो कार्य किये हैं उसकी तुलना हम अन्य किसी से नहीं कर सकते। वह अद्वितीय महापुरुष व वेदर्षि थे। ऐसा व्यक्ति सृष्टि में सम्भवतः दूसरा नहीं हुआ है। आज भारत चहुंमुखी प्रगति कर रहा है इसमें भी उनकी शिक्षाओं व वेद प्रचार कार्यों का मुख्य योगदान है। उनका जीवन संसार के सभी लोगों के लिए आदर्श होने के साथ अनुकरणीय भी है।

आर्यसमाज के छठे नियम में यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि संसार का उपकार करने के लिए मनुष्य को दूसरों की शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति में योगदान करना चाहिये। शारीरिक उन्नति अच्छी शिक्षा व संस्कारों सहित दूसरों को शुद्ध व पवित्र भोजन करने कराने की प्रेरणा देने एवं उन्हें व्यायाम व योगाभ्यास आदि से युक्त आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने की शिक्षा का प्रचार करने से होती है। शारीरिक उन्नति में निद्रा, अभय की स्थिति व संयमपूर्ण जीवन का महत्व निर्विवाद है। असंयमित जीवन से होने वाली हानियों का प्रचार भी किया जाना चाहिये। इसके अतिरिक्त शारीरिक उन्नति के लिए हितकारी, ऋतु के अनुकूल व मिताहारी भोजन करने का प्रचार भी आवश्यक है। आजकल लोग भोजन के नाम पर अनापशनाप पदार्थों का भक्षण करते हैं और अनेक रोगों व व्याधियों से ग्रसित होकर दुःखी जीवन जीते हुए अल्पायु होते हैं। ऋषि दयानन्द जी ने अपने सभी ग्रन्थों मुख्यतः सत्यार्थप्रकाश व ़ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका में शारीरिक उन्नति के सूत्र दिये हैं जो यत्र तत्र बिखरे हुए हैं। इन ग्रन्थों व उनके जीवन चरितों का अध्ययन कर व उनकी शिक्षाओं पर आचरण करके हम शारीरिक उन्नति ंको प्राप्त हो सकते हैं।

संसार के उपकार के लिए यह भी आवश्यक है कि हम अपनी आत्मिक उन्नति करें व दूसरों की आत्मिक उन्नति में सहयोगी बने। आत्मिक उन्नति के लिए ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति का ज्ञान आवश्यक है और इन्हें जानकर ईश्वरोपासना व दैनिक अग्निहोत्र आदि कर्तव्यों का निर्वाह भी आवश्यक है। आत्मिक उन्नति के प्रमुख साधनों पर विचार किया जाये तो हमें यह ‘स्वाध्याय’ प्रतीत होता है। वेद, उपवेद, वेदांग, उपांग, उपनिषद और प्रक्षेप रहित मनुस्मृति का अध्ययन करने से हमें ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति के यथार्थ ज्ञान सहित अपने कर्तव्यों का भी पूर्ण ज्ञान हो जाता है। स्वाध्याय व उससे प्राप्त यथार्थ ज्ञान मनुष्य को विद्वान, योगी व ऋषि के स्तर तक पहुंचा सकता है। ऐसा मनुष्य स्वयं ज्ञानी व साधक होता है व दूसरों का भी मार्गदर्शन कर सकता है। ऋषि दयानन्द व उनके गुरु ने भी यही कार्य किया। दोनों ही विद्वान व योगी थे। उन्होंने स्वयं की भी आत्मिक उन्नति की व समस्त देशवासियों की आत्मिक उन्नति के कार्य को भी प्रशस्त किया। वेद कहते हैं कि ईश्वर व आत्मा को जानकर मनुष्य अभय हो जाता है और मृत्यु को पार कर अमृत अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करता है। आत्मिक उन्नति का उद्देश्य मनुष्य जीवन की उन्नति अर्थात् अभ्युदय सहित मोक्ष की प्राप्ति ही है। आर्यसमाज के सदस्यों के लिए ऋषि ने छठे नियम में यह विधान किया है कि वह स्वयं की आत्मिक उन्नति भी करें व उसी प्रकार से अन्यों की उन्नति में भी सहयोगी व मार्गदर्शक बने। आत्मिक उन्नति को प्राप्त मनुष्य ही संसार में सबसे अधिक सुखी व सन्तुष्ट होता है। वह धन व अन्य किसी प्रलोभन में फंसता नहीं है। मृत्यु का दुःख अर्थात् अभिनिवेश क्लेश उसे क्लान्त व डराता नहीं है। वह सुख व दुःख की अवस्था में सम व अविचल रहता है। अतः सभी मनुष्यों को आर्यसमाज से जुड़कर अपनी अपनी आत्मिक उन्नति अवश्य करनी चाहिये।

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। यह अकेला रहकर अपना जीवन निर्वाह नहीं कर सकता। इसे अनेक मनुष्यों से सहयोग की आवश्यकता होती है। इसका अपना एक परिवार होता है जिसमें माता-पिता, भाई-बहिन व अन्य संबंधी होते हैं। परिवारों के समूह से मनुष्य समाज बनता है। यह सब प्रकृति प्रदत्त अनेक साधनों का उपयोग कर अपनी व अन्यों की उन्नति में सहायक होते हैं। सामाजिक उन्नति का अर्थ है एक ऐसा समाज व देश जहां कोई अन्धविश्वास, कुरीति, पाखण्ड व अविद्या आदि न हों। सभी सुशिक्षित व ज्ञानी हों। सभी ईश्वरोपासक व वेदभक्त हों। सभी यज्ञ करने वाले हों। सभी सत्य के ग्रहण करने और असत्य का त्याग करने में तत्पर रहने वाले हों। समाज के सभी लोग अपने सभी काम सत्य व असत्य को विचार कर धर्मानुसार करने वाले होने चाहियें। सभी मनुष्य सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार व यथायोग्य व्यवहार करने वाले होंं। सामाजिक उन्नति के लिए अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि का होना भी आवश्यक है। श्रेष्ठ समाज वही हो सकता हैं जहां अविद्या न हो और सभी विद्या से युक्त हों। सभी दूसरों की उन्नति को भी महत्व देते हो और दूसरों की उन्नति में ही अपनी उन्नति समझते हों। दूसरों की उन्नति के लिए महर्षि दयानन्द ने अपने समाधि अवस्था के सुख को छोड़कर वेद प्रचार, देशापकार एवं समाज सुधार के कार्यों को किया था। उन्नत समाज के लिए यह भी आवश्यक है उसके सभी लोग सामाजिक सर्वहितकारी नियम के पालन में स्वयं को परतन्त्र अनुभव करें तथा प्रत्येक हितकारी नियम के पालन में सभी मनुष्य स्वतन्त्र रहें। सामाजिक सुधार के यह स्वर्णिम सिद्धान्त हैं जो हमें व देशवासियों को ईश्वर व वेदभक्त महर्षि दयानन्द से प्राप्त हुए हैं। आश्चर्य एवं दुःख है कि इस पर भी हमारा देश और समाज अविद्या व पाखण्डों से ग्रसित है और सामाजिक उन्नति के सिद्धान्तों सहित शारीरिक और आत्मिक उन्नति के सत्य नियमों की उपेक्षा कर रहा है। उस उपेक्षा से जो हानि होनी है वह उसी मनुष्य की होनी है जो इनकी उपेक्षा कर रहा है।

देश, समाज और संसार का उपकार सभी मनुष्यों की शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति से ही होता है। आर्यसमाज ने अपने जन्म काल से ही इसके लिए आन्दोलन आरम्भ किया था जो आज भी जारी है। हिन्दू समाज जड़ पूजा से ग्रसित है। अन्य मत व पंथ भी निजी मत-पंथ की उन्नति व निजी स्वार्थों से ग्रसित हैं और अपने मत के अनुयायियों की संख्या में वृद्धि के कार्यों को ही सबसे अधिक महत्व देते हैं। जड़ व ईश्वर के मिथ्या स्वरूप की पूजा से सभी मतों के मनुष्यों की बुद्धि भी जड़ हो गई है। उन्हें अपनी व संसार की सर्वांगीण उन्नति के लिए जो जो करना चाहिये व जो ऋषि दयानन्द ने उन्हें प्रदान किया है, उससे वह लाभ नहीं उठा रहे हैं। ईश्वर सबको सद्बुद्धि दें कि सब सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग कर संसार व अपने समाज को उन्नत व समृद्ध कर सकें। ओ३म् शम्।

 

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