लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन उवाच 

प्रवेश:

एक ओर भार्गव जी का लेख पढा, और दूसरी ओर फेस बुक पर निम्न अनुरोध।

The government of India is about to declare Sanskrit as dead language if less than 1 crore of people declare that they do not know Sanskrit in the on going census.

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और मैं Cause से जुड गया। पता नहीं कौन इस जनगणना के परिच्छेद के पीछे है?

फिर मनमोहन सिंह जी भाषण में जो बोले, उसका उपरि अनुरोध से ताल मेल कैसे बैठाएं? और संस्कृत के प्रचार-प्रसारार्थ कार्यवाही करने के लिए शासन को ६५ वर्षों से कौन रोक रहा था?

पर मैंने निम्न लेख जो, मेरी तीन एक शालाओ एवं उत्सवों पर, हापुड़, हिमाचल प्र. एवं गाज़ियाबाद इत्यादि स्थानों पर ३ माह पहले, प्रस्तुतियां हुयी थी, उस के आधार पर बनाया था। शाला के बाल बालिकाओं को भी समझ में आए ऐसे सरल शब्दों से प्रारम्भ किया है। फिर कुछ कठिन शब्दों को अन्त की सूचि में प्रस्तुत किया है। केवल अंतिम भाग ही कुछ कठिन हो सकता है। आगे, और संस्कृत धातुओं से व्युत्पादित सामग्री प्रस्तुत करने का सोचा जा सकता है।

युवाओं के मन-मस्तिष्क में, राष्ट्र की अस्मिता यदि जाग गयी, तो युवा वर्ग कठोर परिश्रम करने के लिए कटिबद्ध हो जाता है, यह अनुभव मुझे बार बार हुआ है। यही उद्देश्य है।

हिंदी/संस्कृत-अंग्रेज़ी प्रवाह

(१)

अब कुछ सरल शब्दों का अनुसंधान स्रोत ढूंढते हैं।

पहला सभी के परिचय का, और बोल चाल का अंग्रेज़ी शब्द है “NAME”। आप, अब सोचिए कि हमारे हिन्दी-संस्कृत के एक सरलतम शब्द “नाम” से यह मिलता जुलता है या नहीं?

इसी से प्रारंभ करता हूं। यही नाम अंग्रेज़ी में पहुंचकर नेम (Name) बन गया है। कुछ और ढूंढ ने का प्रयास किया तो पता लगा कि इस Name का ही स्पेलिंग, कुछ सदियों पहले Nahm (ना:म) हुआ करता था। और यह नाःम की आप नामः इस शुद्ध संस्कृत से तुलना कर सकते हैं। यह स्पेल्लिंग मैं ने किसी पुस्तक या शोध-लेख में पढा हुआ स्मरण होता है। अब आप के ध्यानमें आया होगा, शुद्ध संस्कृत का नामः (Namah), पहले नाःम (Nahm) बना, और बाद में नेम (Nem उच्चारण ) Name बना। शायद और भी कुछ बदलाव की मध्यस्थ कडियों से गया होने का संभव नकारा नहीं जा सकता, पर मुझे यही जचता है।

फिर Nomination, Anonyamous, Nominally इत्यादि इसी Name से निकले हैं।

(२)

दूसरा सभी का परिचित शब्द “DOOR” लेते हैं। इस Door के लिए : हिंदी-संस्कृत शब्द है “द्वार” ( अर्थात दरवाज़ा)। अब अंग्रेज़ी में यही द्वार –>डोअर कैसे बदला होगा, इसका आप अनुमान करें। मेरा अनुमान है, यह डोअर उच्चारण बनने का कारण, अंग्रेज़ी में द जैसा सौम्य उच्चार नहीं है। मेरे मधुसूदन इस नाम को भी अमरिकन “मढुसूडन” ऐसे उच्चारित करते हैं। तो द के स्थान पर ड का उच्चार उन के लिए सहज है। अनुमानतः निम्न बीच की कडियों से यह द्वार रुपांतरित हुआ होगा।

द्वार से ड्वार बना होगा, फिर शायद ड्वार से ड्वॉर बना होगा, और बाद में ड्वॉर से –> ड्वोर और अंत में ड्वोर से डोअर (जो आज कल) प्रयुक्त होता है।

वैसे गौरव की बात है कि हमारी देवनागरी में मूल शब्द का उच्चारण बदलने की सम्भावना न्य़ून मात्र है। इस लिए जो उच्चारण वैदिक काल में रहे होंगे, वे लगभग आज भी वैसे ही उच्चरित होते हैं। कुछ ऋ, ज्ञ, कृ, क्ष ऐसे कतिपय अक्षर है, जिन के विषय में कुछ संदिग्धता संभव है। पर यह हानि हमारी गुरूकुल प्रणाली के लोप होने के कारण ही मानता हूँ।

(३)

COW: तीसरा अपना “गौ” शब्द लेते हैं। उच्चारण प्रक्रिया को समझने में सरलता हो, इसलिए यह जानने की आवश्यकता है, कि, उच्चारण की दष्टिसे क और ग दोनोंका उचारण मुख-विवर के कंठ के निकट के भागों से ही आता है। यही गौ, हिन्दी में गऊ भी उच्चरित होता है। यही गऊ का गाउ हुआ होगा, और गाउ से काऊ जो आज कल COW -स्पेल्लिंग से लिखा जाता है।

(४)

MEDIUM:चौथा लेते है माध्यम जैसे प्रचार माध्यम –यही माध्यम अंग्रेज़ी में Medium( मिडीयम) बना हुआ है। इस मिडियम का बहुवचन मिडीया है। तो आज कल बहुत चर्चा में मिडीया, मिडीया हम करते रहते हैं। उसके बदले हमारा शुद्ध माध्यम शब्द का प्रयोग किया जा सकता है।

एक बडा विचित्र अवलोकन है। सोचिए हमारे माध्यम शब्द से अंग्रेज़ी में पहुंचा मिडियम जिसका बहुवचन है मिडिया।

तो अचरज इस बात का है, हमसे उधार लेकर शब्द बना है मिडिया। उस मिडिया शब्द का प्रयोग हिन्दी में करने में कौनसी बुद्धिमानी समझी जाएगी? पर हम ठहरे बुद्धिभ्रमित !

एक और विशेष बात ध्यान में आयी है। कुछ अंग्रेज़ी के शब्दोंको (Phonetically)ध्वन्यानुसारी रीति से पढकर देखिए, तो उनके मूल जानने में सरलता होगी। एकाध उदाहरण से यह बिंदू विषद करता हूं।

(५)

अंग्रेज़ी में प्रयुक्त होता एक शब्द CENTRE है। इसका अमरिका में प्रयुक्त स्पेलिंग Center है। उच्चारण सेंटर ही है।

इसका इंग्लिश स्पेल्लिंग Centre होता है। अब C को स भी पढा जाता है, जैसे Cycle सायकल पढते हैं, और क भी जैसे Cat कॅट पढाता है। जब हम उसका Centre के C का उच्चार क करेंगे, तो Centre को केंट्र ही पढेंगे। अब सोचिए कि यह Centre का केंट्र उच्चार हमारे “केंद्र” के निकट है या नहीं?

हमारे निकट एक गांव में एक नाट्य शाला का नाम Centrum सेन्ट्रम ही है। यह सेन्ट्रम हमारे केंद्रम जैसे शुद्ध संस्कृत शब्द से बहुत मिलता है। आपने Central अर्थात सेन्ट्रल सुना होगा। उसे केन्द्रल समझा जा सकता है।

(६)

कुछ मात्रा में निम्न सूचि कठिन है, पर जिन बंधुओं को संस्कृत व्याकरण और धातुओं का ज्ञान है, वे विचार कर सकते हैं।

मैं केवल छोटी निम्न सूची देता हूं। एक बौद्धिक व्यायाम की दृष्टिसे इस सूचि के शब्दों का संस्कृत मूल ढूंढनेका प्रयास करें। ऐसा प्रयास, आप को आनन्द ही देगा। टिप्पणियों में आप अपने उत्तर लिख सकते हैं। कुछ उत्तर सरल है, कुछ कठिन। मूल ढूंढिए–>

(७)

Character का, Heart का, Day का, Night का, Hour का, We का, You का, They का, Mother का, Father का, Daughter का, Son का, Widow का, Widower का, Brother का, Uncle का, Know का, Stop का, Equal का, Axis का, Dentist का, Generate का, Same का, Octagon का, Decagon का, November का, September का, October का, December का, Calendar का, Man का, Sewing का, Create का, Ignite का, Station का, attic का, Fan का, Decimal का, Navy या Naval का, Nose का, Signal का, Signature का, मूल क्या रहा होगा?

(८)

बहुत सारे शब्दों का अनुसन्धान किया जा सकता है। पर इस लघु लेख का अंतिम (७वाँ) भाग छोडकर , सरल समझ में आए ऐसे ही शब्द चुनकर लिखने का प्रयास किया है।

ऐसी विश्व-प्रभावी भाषा को “मृत भाषा” घोषित करने का प्रयास कर, एक सर्व हितकारी, सर्व समन्वयी, विचारधारा को क्षीण करने का प्रयास किन बलों के संकेत पर किया जा रहा है?

18 Responses to “अंग्रेज़ी का संस्कृत स्रोत”

  1. Jeet Bhargava

    मधुसूदन जी, सब पाठको को धन्यवाद देने से काम नहीं चलेगा 🙂
    हमें आप से संस्कृत के बारे में और लेखो की आशा है.
    क्योंकि इस विषय में आपकी पकड़, वैज्ञानिक सोच और सरल प्रस्तुति के हम कायल है.

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    • डॉ. मधुसूदन

      Dr. Madhusudan

      जीत जी
      अवश्य|
      सामग्री बहुत है|
      देव नागरी एक ऐसा दैवी परिधान है, और देव वाणी, जब उस में प्रकट होती है, तो साक्षात माँ शारदा अवतरित होने का ही अनुभव कराती है|
      मैं इसे इश्वरी संकेत ही मानता हूँ|
      हमें पता ही नहीं, कि हम, अर्थात भारत, कितना भाग्य शाली है, जिसके पास देव वाणी ही नहीं देवनागरी भी है|
      संसार की सारी भाषाएँ एक ओर, और देव वाणी एक ओर, पलड़ा देव वाणी की ओर ही झुकेगा|
      और हमारा पाणिनि| {आज उसकी जन्म स्थली पाकिस्तान में है, उसपर पाकिस्तान भी डिंग मारता है}
      पर परदेशियों की उक्तियाँ, बिना भारत मानता ही नहीं| यही विवशता है, भारत की|
      प्रयास करूंगा|
      आप के शब्दों से भाव जग गए|
      धन्य वाद|

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  2. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    डॉ. राजेश कपूर जी, एवं बहन रेखाजी,पंकज जी, सिंह साहब, जीत जी, और मोहन जी, अनिल गुप्ता जी, और विनायक शर्मा जी —–
    आप सभी ने लेख, समय निकाल कर पढ़ा| धन्यवाद|

    विश्व की सर्वोत्तम भाषा देव वाणी संस्कृत की गुणवत्ता ही है ऐसी, कि उसे जो भी जानेगा, गुण ही गायेगा|
    लेखक सराहा जाए, यह लेखक का नहीं विषय का ही गुण गान मानता हूँ|
    सविनय|
    परमात्मा की कृपा रही है|

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  3. Rekha singh

    अति उत्तम लेख है |मै तो उनको बीसों सालो से जानती हूँ और उनके सानिध्य का लाभ तथा इन विषयो पर बहुत बार उनसे पहले भी सुना है | डॉ . मधु सुदन जी बहुत ही ज्ञाता है और उनके विविध लेखो से हमे बहुत कुछ सीखने को मिलता है और मिलता रहेगा |

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  4. डॉ. राजेश कपूर

    rajesh kapoor

    अति उत्तम, अति महत्व पूर्ण और सरल लेख है. विद्वान लेखक को नमन और साधुवाद. एक और ख़ास बात यह की टिप्पणियाँ भी बड़ी उत्तम आयी हैं.

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  5. Jeet Bhargava

    श्री आर सिंह ने संस्कृत के विषय में महत्वपूर्ण बातो पर प्रकाश डाला है. अब इन कमियों को दूर करना चाहिए, तो ही संस्कृत के प्रसार का मार्ग प्रशस्त होगा.

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  6. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    धन्यवाद सभी,सूज्ञ टिप्पणी कार और अन्य पाठक।
    पराए तो समझ सकता हूं।
    पर अभी तो, अपने ही संसार की सर्वोत्तम, सर्व श्रेष्ठ, पूर्णाति पूर्ण, महामातृ समी अपनी भाषाओं की जननी, और अन्य भाषाओं की भी स्रोत मानी गयी भाषा को उचित सम्मान देने में कर्तव्य विमुखता दिखा रहे हैं।
    लघु द्रष्टा, वामन, नेतृत्व की गलतियां आगे, शतकों तक हमारे राष्ट्र रूपमें, शनैः शनैः र्‍हास कर सकती है, आगे, अगली पीढी हमें दोष दे सकती है।
    आज भी दे रही है। परम्परा हमारी पहचान है।
    और पहचान हमें ऊर्जा, प्रेरणा, एकात्मता इ. इ. देती है। इसे दुर्लक्षित नहीं किया जाना चाहिए।

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  7. Mohan Gupta

    स्रेस्ट लेख. ऐसे लेखे सो संस्कृत भासा को प्रोत्साहन मिलेगा और प्रचार और प्रसार होगा. . हिंदी भाषा में कूड़ा करकट भर्रा हुआ हैं. ऐसे लेखो से शुद्ध हिंदी भाषा का चलन होगा क्यों के संस्कृत के परचचार के कारन लोग हिंदी में अंग्रेजी और उर्दू भाषा का कूड़ा करकट नहीं daalenge मदुसुदन जी हमेस्श बहुत बड़ा काम करते हैं.

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  8. आर. सिंह

    R.Singh

    मुझे संस्कृत का थोड़ा ही ज्ञान है,पर मुझे लगता है की हमलोगों से कहीं न कहीं गलती अवश्य हुई जिसके चलते हम इस विशुद्ध वैज्ञानिक भाषा से दूर हट गएँ है.जहां तक मुझे मालूम है,(मैं गलत भी हो सकता हूँ)जातक कथाएं संस्कृत में नहीं लिखी गयी हैं.अगर ऐसा है तो क्या कारण था की बौद्ध धर्म के प्रचार में भी संस्कृत का सहारा नहीं लिया गया?बौद्ध धर्म का आरम्भ कब हुआ था,इस पर प्रकाश डालने की आवश्यकता मैं नहीं समझता.ऐसे साहित्य के प्रधान भाषा रूप में यह हर्ष वर्धन के काल तक तो था हीं उसके बाद शायद साहित्य में भी इसका महत्त्व कम होता गया. संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा का इस तरह जन मानस की निगाह से दूर होना और फिर साहित्य से भी पलायन मेरी समझ के परे है.कहीं ऐसा तो नहीं है की बौद्ध या जैन धर्म के विकास के साथ ही संस्कृत केवल सनातनी पंडितों की भाषा होकर रह गयी.ऐसा भी हो सकता है की उस समय के तथाकथित प्रबुद्ध लोगों ने एक सोची समझी चाल के अंतर्गत इसे विशिष्ट वर्ग की भाषा का रूप दे दियाऔर यही इसकी अवनति का कारण बना.ऐसे ये सब मेरे अनुमान हीं हैं,अतः गलत भी होसकते हैं.

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  9. Pankaj

    मनोरंजक व ज्ञानवर्धक!
    पूरा पढ़ा, समयाभाव में उत्तर नहीं लिख रहा, क्षमा करे, सचमुच बहुत अच्छा लगा.

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  10. Jeet Bhargava

    We का वयं, Character का चरित्र, Night का निशा, Hour का हौरा, Mother का मातर/मातर!!
    क्या मैं सही हूँ??
    यह वाकई में मजेदार अनुभव है. इसके ऊपर तो बच्चो के ली\ये एक गेम बनाया जा सकता है. जिससे उनके अंगरेजी, और फोनिक्स ज्ञान के साथ ही संस्कृत का ज्ञान भी बढेगा. और हाँ अपनी अनमोल थाती संकृत पर गौरव की अनुभूती भी!!

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन उवाच

      जित भार्गव जी—आपके अन्य सभी उत्तर सही लगते हैं। केवल नाईट का मूल (मुझे)लगता है—> नक्त। जैसे एट का है—-> अख्ट—->अष्ट ।
      उत्तर देना छूट गया था।

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  11. Jeet Bhargava

    डॉ. साहब इस क्रम में दो और शब्द संस्कृत मूल के होने की संभावना है..Cruel -क्रूर और Praise -प्रसंशा.

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन उवाच

      जित जी,
      इस विषय-क्षेत्र का बहुत काम बचा हुआ है।
      आपका संकेत कभी धातु ओं के मूलसे तलाशना होगा। जैसे शब्द वृक्षों में किया गया है। संभव नकारा नहीं जा सकता।

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  12. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    २६ अप्रैल २००७ को, भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम जी ग्रीस देश गए थे। वहाँ आप के स्वागत समारम्भ में ग्रीस के राष्ट्रपति श्री कार्लोस पम्पाडॅलिस ने “राष्ट्रपति महाभाग। सुस्वागतम् यवन देशे” ऐसे किया।

    जुलाई २००७ में, अमरिकी सेनेट का सत्र प्रारम्भ संस्कृत वैदिक प्रार्थना से हुआ। गत २१८ वर्षों के अमरिका के इतिहास में ऐसी घटना पहली बार ही घटी। ॐ शान्तिः,शान्तिः, शान्तिः के उद्गारों से प्रार्थना का अन्त हुआ, तो सेनेट में शान्ति छायी रही । पश्चात तालियों की गड गडाहट से सभागार गूँज उठा।

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  13. Anil Gupta

    ऐसा ही एक शब्द मेरे विचार में वेलान्तायीं है. जो हमारे वसंती शब्द से बना लगता है. वसंत ऋतू में वसंत उत्सव मनाया जाता है. इसके साथ ये कहानी भी जुडी है की जब शिवजी का तीसरा नेत्र खुलने पर उसके सामने आये कामदेव भस्म ओ गए तो सब देवी देवताओं ने शिवजी से कहा की कामदेव के न रहने से साड़ी स्रष्टि रुक जाएगी तो शिवजी ने कहा की अब वसंत ऋतू में साडी प्रकृति में कामदेव का वास होगा.वसंत ऋतू में साडी प्रकृति में श्रंगारिक भाव व्याप्त रहता है. इससे प्रभावित होकर संत वेलान्तायीं की कहानी बना दी गयी और पूरी दुनिया में वेलान्तायीं डे मनाया जाने लगा.वास्तव में हमें वेलान्तायीं डे का विरोध करने की जगह वसंतोत्सव पर जोर देना चाहिए.

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  14. विनायक शर्मा

    Vinayak Sharma, Editor Amar Jwala weekly, Himachal

    बहुत ही सरल, रोचक और सुन्दर शब्दों में व्याख्या की है संस्कृत भाषा की आपने. संस्कृत ही सभी भाषाओँ की जननी है ऐसी ही मान्यता है भाषा विद्वानों की…और अब जननी के साथ ही पुत्रों का षड़यंत्र….कहाँ से कहाँ पंहुंच गए हम ?

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