सरोजिनी को नापसंद था नारीवादी कहलाना

निर्भीकता, उत्कट स्वातंत्र्य प्रेम तथा नारियों को सबल-सक्षम-शिक्षित बनाने की प्रबलतम आकांक्षा- यही वह विशेषताएँ थीं जिन्होंने सरोजिनी नायडू के यशस्वी और संघर्षमय जीवन को संचालित किया। उनकी उपलब्धियां उनके अदम्य साहस और नारी मुक्ति के लिए उनके दुर्घर्ष संघर्ष की अमर गाथा का बयान करती हैं। वे द गोल्डन थ्रेशहोल्ड की प्रस्तावना में स्वयं बताती हैं कि मात्र तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने केवल 6 दिनों में 1300 पंक्तियों की कविता लेडी ऑफ द लेक की रचना की थी। तेरह वर्ष की आयु में ही उन्होंने 2000 पंक्तियों का एक नाटक लिखा, वह भी तब जब वे गंभीर रूप से बीमार थीं और चिकित्सक ने उन्हें पुस्तकों से दूर रहने का परामर्श दिया था। वे बताती हैं कि इसी अस्वस्थता के दौर में -14 से 16 वर्ष की आयु के बीच – जब उनकी औपचारिक पढ़ाई बाधित हो गई थी, उन्होंने सर्वाधिक पढ़ा और लिखा। यह घटनाएं तब की हैं जब स्त्री शिक्षा की स्थिति शोचनीय थी।
आगे चलकर वे उच्च शिक्षा के लिए हैदराबाद के निजाम से वजीफा प्राप्त करती हैं और लंदन की नामचीन शिक्षण संस्थाओं से पढ़ाई करती हैं। वे 1898 में अपने प्रेमी से अंतरजातीय विवाह करती हैं(तब इसे तत्कालीन समाज में बहुत बुरा समझा जाता था) और अपने डॉक्टर पति गोविंदराजुलु नायडू के साथ चार संतानों वाला परिवार रचती हैं। 1917 में मार्गरेट कजिन्स और ऐनी बेसेंट के साथ मिलकर वे  महिलाओं को मताधिकार दिए जाने की वकालत करती हैं। 1918 में जिनेवा में महिला मताधिकार परिषद के सम्मुख वे भारतीय महिलाओं की स्थिति पर मार्मिक उद्बोधन देती हैं और अंततः चन्द वर्षों बाद ही महिलाओं को मताधिकार दिलाने में सफल होती हैं। ऐनी बेसेंट की होम रूल लीग, मार्गरेट कजिन्स की इंडियन वीमेन्स एसोसिएशन और अखिल भारतीय महिला सम्मेलन जैसी संस्थाओं के माध्यम से वे महिलाओं की दशा को बदलने वाले सामाजिक सुधारों और न्यायिक प्रावधानों की आधारभूमि तैयार करती हैं।1915 से 1918 के बीच वे पूरे भारत का भ्रमण करती हैं और असहयोग, सत्याग्रह, शिक्षा, राजनीति, समाज सुधार तथा हिन्दू मुस्लिम एकता जैसे विषयों पर अपने भाषणों द्वारा देशवासियों को जाग्रत करती हैं। किन्तु उनका सर्वाधिक जोर हमेशा नारियों को शोषण से मुक्ति दिलाने, उन्हें मुख्यधारा में लाने, शिक्षित करने और अधिकार सम्पन्न बनाने पर होता है। 1925 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष बनती हैं। 1929 में वे अंतरराष्ट्रीय महिला कांग्रेस(बर्लिन) में भारत का प्रतिनिधित्व करती हैं। बाद में वे स्वतंत्र भारत की प्रथम राज्यपाल बनती हैं। राज्यपाल बनते समय जब वे टिप्पणी करती हैं कि वे स्वयं को कैद कर दिए गए वन्य पक्षी की भांति अनुभव कर रही हैं तो न केवल यह स्वतन्त्रता और खुलेपन के प्रति उनके आकर्षण को दर्शाता है बल्कि राज्यपाल पद की उबाऊ और आडंबरपूर्ण गरिमा की ओर भी संकेत करता है। अपना कर्त्तव्य निभाते हुए ही 1949 में उन्हें हृदयाघात होता है और वे हम सब को छोड़ कर चली जाती हैं।
महात्मा गांधी और अन्य शीर्षस्थ नेताओं के साथ स्वाधीनता संग्राम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने वाली सरोजिनी नायडू के लिए आंदोलनों का नेतृत्व और जेल यात्राएं मानो दिनचर्या का एक भाग थीं किन्तु इस सार्वजनिक सक्रियता ने उनके अंदर के कवि और चिंतक को कुंद नहीं किया बल्कि इसे संवेदनशील और जनोन्मुख बनाया। बतौर कवयित्री  जब वे कोरोमंडल फिशर्स और इंडियन वीवर्स जैसी रचनाएँ लिखती हैं तो न केवल उनके काव्य विषयों में आम मेहनतकश अवाम का समावेश होता है बल्कि यह भी पता चलता है कि एडमंड गोसे की उस आलोचनात्मक टिप्पणी से उन्होंने बहुत कुछ सीखा था जिसमें उन्होंने सरोजिनी की कविताओं में यूरोपियन प्रभाव को रेखांकित करते हुए इसके स्थान पर भारतीयता का समावेश करने का परामर्श दिया था। कवयित्री सरोजिनी राजनेत्री बनीं क्योंकि वे मानती थीं कि कवि समाज से अलग नहीं है। उसका भाग्य भी राष्ट्र की जनता और उसकी कठिनाइयों तथा उसकी परेशानियों से जुड़ा है। वह इनसे मुँह नहीं मोड़ सकता।
सरोजिनी नायडू के नारियों से सम्बंधित विचार पाश्चात्य नारीवाद से बिल्कुल भिन्न थे। सरोजिनी इस मामले में अनूठी हैं कि वे नारी को पुरुष के समान बनाने तक सीमित नहीं थीं। वे पुरुष की उच्छृंखलता, लापरवाही, कठोरता, क्रूरता, विलासिता और स्वेच्छाचारिता का अनुकरण करने को नारी के लिए वरेण्य नहीं समझती थीं अपितु नारी की सेवाभाव, समर्पण, सहिष्णुता, कोमलता, त्याग और ममता जैसी विशेषताओं के कारण उसे पुरुष से पृथक एक विलक्षण अस्तित्व के रूप में स्वीकृति देती थीं। एक ऐसा अस्तित्व जो पुरुष जाति का भरण- पोषण, संरक्षण-संवर्धन और मार्गदर्शन कर सकता है।
सरोजिनी नायडू ने अपनी कविताओं में वर्तमान संस्थागत धर्म के कारण उपजी सामाजिक कुरीतियों पर जमकर प्रहार किया किन्तु वे यह मानती थीं कि हमारा अतीत नारियों को देवी की तरह पूजने, उन्हें सम्मान और महत्व देने के अनेकानेक उदाहरणों से भरा पड़ा है और अतीत के इस गौरव की वापसी में नारियों की मुक्ति छिपी है। नारियों के शोषण और उनकी पीड़ा को अभिव्यक्त करने वाली कुछ मार्मिक रचनाएँ सरोजिनी ने रचीं जो काव्य साहित्य की धरोहर हैं। ये रचनाएँ कहीं से वैचारिकता से बोझिल नहीं हैं न ही इनका स्वरूप उपदेशात्मक है। संवेदनाओं की आंच इन रचनाओं में स्पष्ट महसूसी जा सकती है। द पर्दानशीन में वे बताती हैं कि किस प्रकार पर्दे के बाहर से शांत, सुंदर और सुरक्षित लगने वाली नारी पर्दे के अंदर नितांत एकाकी और उदास होती है। यहाँ पर्दा नारी की सोच और उसकी अभिव्यक्ति को कुंठित करने वाला औजार बन जाता है जिसके अंदर रहते रहते नारी दासता में जीने के लिए इस प्रकार प्रशिक्षित कर दी जाती है कि वह स्वतंत्रता की कामना करना भी भूल जाती है।   डर्ज (शोक गीत)भी सरोजिनी की ऐसी रचना है जो युवा नारी के वैधव्य और उसके बाद उसके दुःखमय जीवन का मार्मिक शब्दचित्र प्रस्तुत करती है। पति की मृत्यु के बाद विधवा स्त्री को विवाह के पारंपरिक प्रतीकों, गहनों और रंगीन परिधानों से रहित और वंचित कर देने की अमानवीय रस्म दरअसल उसे सारी खुशियों और सपनों से वंचित करने की प्रक्रिया का प्रारंभ है। कवयित्री समाज की परपीड़क प्रवृत्ति को बखूबी उजागर करती है।  कैप्रिस पुरुषवादी सोच को अभिव्यक्त करने वाली अद्भुत रचना है। कविता के प्रथम भाग में पुरुष नारी के पुष्पवत कोमल हृदय को निरुद्देश्य ही छिन्न भिन्न कर देता है। द्वितीय अर्द्धांश में पुरुष नारी का मद्य के प्याले की भांति उपभोग कर उसे फेंक देता है और नारी की आत्मा को तिरस्कृत- अपमानित करता है।  सरोजिनी की दो कविताएं- इंडियन जिप्सी और सती- बिल्कुल अलग अलग भाव भूमि की रचनाएं हैं और आलोचकों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या इन्हें आधुनिकता और पारंपरिकता के बीच चयन और वरीयता की समस्या से जूझती कवयित्री के अंतर्द्वंद्व की अभिव्यक्ति माना जा सकता है। एक कठिन संतुलन था जिसे सरोजिनी विचार और आचार में लाना चाहती थीं- आधुनिकता और पारंपरिकता के मध्य का संतुलन। इंडियन जिप्सी में फ़टी पुरानी उधड़े रंगों वाली घुटनों तक आने वाली पोशाक पहने जो अलमस्त लड़की है वह कोई बंधन नहीं जानती, मानने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। वन और वन्य जीवों की छवियों का उपयोग करते हुए कवयित्री सामाजिक बन्धनों और समय के तकाजों से अप्रभावित अपनी मन मर्जी का जीवन जीती उन्मुक्त नारी को चित्रित करती हैं जो पाठकों को चकित-चमत्कृत छोड़ जाती है। इसके बिल्कुल विपरीत सती नामक कविता है। यह कविता नारी के प्रेम की गहराई और पति – पत्नी के अविभाज्य अन्योन्याश्रित सम्बन्धों को दर्शाती है। कविता का गहराई से वाचन करें तो हमें यह बोध होता है कि सरोजिनी नारी और उसके प्रेम को अत्यंत उच्च और पवित्र मानती हैं इसी कारण उन्हें यह लगता है कि यह नारी ही है जो सती हो सकती है। किन्तु मन में यह संशय उठना स्वाभाविक है कि कहीं सरोजिनी उस पुरुषवादी मूल्यमीमांसा से अनजाने में प्रभावित तो नहीं हैं जो सारा त्याग नारी के हिस्से में डाल देती है और भोग को अपने लिए सुरक्षित रख लेती है। अपने भाषणों में वे सीता की पवित्रता, सावित्री के साहस, गार्गी की विद्वता, दमयंती के आत्मविश्वास और द्रौपदी की निष्ठा का बारंबार प्रशंसात्मक उल्लेख करती हैं। वे बारम्बार इस बात का उल्लेख करती हैं कि प्राचीन भारत में नारी का जो सम्मानजनक एवं पूज्य स्थान था वह उसे वापस दिलाना है। शास्त्रों की उस उक्ति का भी वे उल्लेख करती हैं कि जहाँ नारियों की पूजा होती है वहाँ देवता भी प्रसन्न होते हैं। वे आज के पुरुषों को प्राचीन नायकों की अधःपतित संतानों की संज्ञा देती हैं। किंतु आज जब हम भारतीय धर्म परंपरा के नारीवादी पाठ का अवलोकन करते हैं तो यह देखते हैं कि नारी को महिमामंडित करने वाली अनेक गाथाओं में नारी पुरुष की सुख-सुविधाओं, सम्पन्नता तथा स्वास्थ्य के लिए आत्मोत्सर्ग करती पाई जाती है जबकि पुरुष नारी के लिए ऐसा कुछ करते नहीं दिखते। धर्म ग्रंथों की इन आधुनिक नारीवादी व्याख्याओं के प्रकाश में सरोजिनी पुरुषवादी मूल्यों के आधार पर नारी की मुक्ति तलाशती लगती हैं।
लेकिन सरोजिनी के विचारों में ऐसा बहुत कुछ है जो हमें आश्वासन देता है। वे कहती हैं -सम्पूर्ण विश्व में एक बात अपरिवर्तनीय है- वह है- स्त्रीत्व की अविभाज्यता। सीमाएं, युद्ध, जातियां बहुत कुछ हैं जो विभाजन कराते हैं किंतु नारी संयोजन करती है, जोड़ती है चाहे वह रानी हो या फिर कृषक बाला। वे यह मानती थीं कि आज की भारतीय नारी भले ही वह किसी भी जाति या वर्ण की हो, अपने प्राचीन स्थान और उद्देश्य तथा अधिकार एवं दायित्व की गहन चेतना से प्रेरित हो गई है ताकि वह राष्ट्रीय विकास तथा अंतरराष्ट्रीय मैत्री भाव के लिए सहिष्णु परिस्थिति बना सके। उन्होंने भारतीय नारियों के लिए उपलब्ध विशाल कार्यक्षेत्र की ओर संकेत करते हुए कहा – क्या आपके आस पास कार्य नहीं है? क्या अनाथ बच्चे सहानुभूतिपूर्ण सहायता के लिए विलाप नहीं कर रहे? क्या समय के गलियारों से विधवाओं का विलाप आपके द्वार पर दस्तक नहीं दे रहा? क्या वे सब युगों से यह नहीं कह रहे कि हमारे साथ अन्याय हुआ है और आपकी पीढ़ी को हमें दासता से मुक्त कराना चाहिए? क्या इस देश की अशिक्षित स्त्रियाँ चुपचाप किन्तु आतुर होकर आपको नहीं पुकार रहीं? क्या ग्राम आपका परामर्श, आपकी चिंता और आपका निर्देश नहीं मांग रहे ताकि उनकी स्थिति में सुधार आए और कम से कम उनकी जरूरतें पूरी हों। सरोजिनी मानती थीं कि स्त्रियों से महान कोई नहीं है क्योंकि वे निर्माण करती हैं। वे कहती हैं कि प्रत्येक स्त्री को अपने विश्वास के प्रति ईमानदार रहना चाहिए क्योंकि वह प्राचीन आदर्शों की संरक्षक ही नहीं है बल्कि नवीन आदर्शों की निर्मात्री भी है। यही कारण है कि वे यह मानती हैं कि स्त्री शिक्षा पुरुष शिक्षा का अंधानुकरण न हो। ऐनी बेसेंट की अध्यक्षता में हुए 1917 के कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने अपने अविस्मरणीय वक्तव्य के दौरान कहा- मैं एक महिला हूँ। इस नाते मैं आपसे कहना चाहती हूं कि जब कभी आप संकट में होंगे या अंधकार में मार्ग तलाशते होंगे, जब कभी आप अपने लक्ष्य की महानता बनाए रखने के लिए सच्चे नेताओं की आवश्यकता महसूस करेंगे और जब कभी स्वयं में आत्मविश्वास की कमी पाएंगे, हम भारतीय स्त्रियाँ आपकी शक्ति को अक्षुण्ण रखने के लिए और आपको अपने महान उद्देश्य से विचलित न होने देने के लिए आपके साथ होंगी।
सरोजिनी नायडू पाश्चात्य नारीवाद की समर्थक नहीं थीं और जब वे कहती थीं कि मैं नारीवादी नहीं हूं तो उनका संकेत इसी पाश्चात्य नारीवाद की ओर होता था। वे भारत में पृथक नारीवादी आंदोलन की आवश्यकता महसूस नहीं करती थीं। न ही स्त्री और पुरुष के मध्य किए गए एकतरफा और मनमाने कार्य विभाजन में उनका विश्वास था। सरोजिनी के लिए भारत का स्वाधीनता संघर्ष और नारियों के अधिकारों का प्रश्न दोनों एक दूसरे के पर्याय थे और एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव न था। वे चाहती थीं कि स्त्री और पुरुष जिस कार्य के लिए उपयुक्त हैं वे वही विशिष्ट कार्य करें। उन्होंने कहा कि हमारी लड़ाई सामाजिक और बौद्धिक अस्तित्व प्राप्त करने की लड़ाई है। हमारा यह अस्तित्व पुरुषों के बराबर किंतु उनसे भिन्न होगा। सरोजिनी स्त्री और पुरुष को विरोधी न मानकर पूरक समझती थीं। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि नारी आर्थिक, बौद्धिक और सामाजिक रूप से पुरुष के बराबर बने किन्तु ऐसा नारीत्व की कीमत पर हो यह उन्हें मंजूर नहीं था। सरोजिनी के विचार आज और अधिक प्रासंगिक बन गए हैं तथा नारीवादी विमर्श को एक नई दिशा दे सकते हैं।
डॉ राजू पाण्डेय

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