शिवेन्दु राय

bullet trainमोदी सरकार के आने से अच्छी बात देश में यह हुई है कि विश्व के सभी देश मान गए हैं कि व्यापार के अनन्त अवसर यहां है | इसी बात को लेकर उत्तर भारत के एक छोटे से गाँव में चर्चा हो रही थी | आखिर क्या बात है कि जापान का प्रधानमंत्री अपनी बुलेट के लिए 98000 करोड़ रुपए दे गया | पैसे की बात छोड़ भी दे तो मियां उसकों क्या जरुरत थी एक घंटे तक खड़े हो कर गंगा मईया की आरती देखने की ? देखो भाई तपेसर, खड़ा तो मैं भी होता हूँ जब मुझे नहर पर सब्जी बेचनी होती है | ठीक वैसे ही उसको भी अपना माल बेचना था खड़ा हो लिया, इसमें कौन सी नई बात है ? आप अपनी तुलना प्रधानमंत्री से कर रहे है ? क्यूँ नहीं करूँ, माल मेरा कम लगात वाला है तो यार तुम हलके में ले रहे हो | खैर, हम तुमको नहीं समझा सकते हैं अर्थव्यवस्था का मामला है तुम सब्जी बेचने वाले कहाँ समझने वाले हो | तुम कौन सा बुलेट ट्रेन का पंचर बना रहे हो, साईकल का ही बना रहे हो, लगे समझाने अर्थव्यवस्था |

खैर, मेरी चिंता अर्थव्यवस्था को लेकर नहीं है | मुझे तो बस चाचा की चिंता है अगर वो दो घंटे में मुंबई से अहमदाबाद पहुँच गए तो सही से फ्रेस भी नहीं हो पाएंगे | शुगर के मरीज़ है 3 घंटा तो उनको हगने में लगता है, अन्याय होगा उनके साथ बुलेट ट्रेन में बैठना | तो आप भी मान रहे हैं न कि मोदी सरकार किसी का भला नहीं कर रही है | भाई तुम बार-बार मोदी सरकार को क्यूँ दोष देने लगते हो ? पूरा देश शुगर का मरीज नहीं है भाई, एक आदमी के लिए बुलेट ट्रेन नहीं चलाना बेमानी होगी 120 करोड़ जनता के साथ | ठीक है चलिए आपकी बात मान भी लेते हैं तो एक बात बताएं लखराज काकी बकरी चराने कैसे जाएँगी ? आपकी सरकार तो पटरी के दोनों तरफ बाड़ लगा रही है | आपकी सरकार की मनसा बकरियों को भूखे मारना है | और जो पूल बनेगा पटरी पार करने के लिए वो भी अपने गाँव से काफी दूर बनेगा | बाबूजी को गठिया है वो कैसे इतनी दूर पैदल चलेंगे ? पूल कैसे चढ़ पाएंगें ? है आपके पास कोई जवाब ?

मेरे पास तुमको समझाने के लिए समय नहीं है, तुम जाहिल लोग समझ भी नहीं सकते हो | मिश्रा जी आप मुझे जाहिल नहीं बोल सकते हैं | आपकी सरकार ब्राह्मणों की सरकार है, ट्रेन का नाम भी ब्राह्मणवादी ‘बुलेट ट्रेन’ रखा है | भाई बुलेट नाम ब्राह्मणवादी ट्रेन कैसे हो सकता है ? कैसे नहीं है ब्राह्मणवादी ‘ब’ से ब्राह्मण और ‘ब’ बुलेट रखा है | आपकी सरकार के खिलाफ कोई धरना भी नहीं दे सकता पटरी पर बैठ कर | जब तक ट्रेन ड्राईवर देखेगा लोगों को, तब तक गरीबों को कुचल कर चली जाएगी ब्राह्मणवादी ट्रेन | अब तो मानव समाज को ही खतरा नहीं है, पुरे जीव-जंतुओं को भी खतरा है बुलेट ट्रेन से |

देश में बुलेट ट्रेन चलाने से पहले एक कमिटी बनानी चाहिए थी, जो बुलेट ट्रेन से संबंधित सभी बिन्दुओं पर गौर कर सके | कमिटी सदस्यों में सभी लोगों का प्रतिनिधित्व हो, बकरी पालने वालों के तरफ से, हर राज्यों का अपना प्रतिनिधि, ब्राहमणों का प्रतिनिधि, दलितों का प्रतिनिधि, सभी बिमारिओं से ग्रसित लोगों का एक-एक प्रतिनिधि और बाकि जरुरत के हिसाब से प्रतिनिधित्व दिया जाए | तब जा के देश में बुलेट ट्रेन की कल्पना भी की जा सकती है | कल ही मेरी मुलाकात ट्रेन में मूंगफली बेचने वाले बटोरन से हुयी थी, कह रहा था इतने कम समय में  मूंगफली कैसे बेचा जा सकता है | ट्रेन बहुत तेज़ चलाना हमारे पेट पर लात मरना है | आपकी सरकार को उसके रोजगार के बारे में भी सोंचना होगा | आपकी सरकार ने चोरों का भी रोजगार छिनने का प्रयास किया है | ट्रेन में चेन नहीं खिंच सकते हैं, फिर चोरी कैसे होगी | देखिये जनाब आप ख़ामिया निकालने बैठेंगे तो हर जगह ख़ामिया है | इस देश में तो कोई जिन्दा जान 24 कैरेट का नहीं है तो कोई मुर्दा सामान 24 कैरेट का कैसे हो सकता है |

खैर, बाकि बातें आपकी मर्ज़ी के साथ बाद में करूँगा | खुदा हाफिज़,लाल सलाम, जय श्री राम !!!

 

2 thoughts on “किस्सा-ए-बुलेट ट्रेन

  1. शानदार व्यंग्य ! इनसे और लिखने को कहा जाता तो बेहतर होता

  2. गंभीर व्यंग है. पर सच्चाई यह है की हम आज से ६ दशक पहले चीन से रेल में आगे थे, लेकिन आज पीछे हो गए. चीन ने भी भी छोटी दूरी की बुलेट ट्रेन की तकनीकी किसी यूरोपीय देश से खरीदी और फिर खुद बनाने की क्षमता हासिल कर लिया. बात २ घंटे की और ९८००० करोड़ की और हगने मुतने की नहीं है. सवाल यह है की भारत तकनीकी के मामले में शेष विश्व से कदम से कदम मिला कर चलना चाहता है. कुछ पीछे रह गए, वहां दौड़ कर दूरी को पाटने की जरुरत है. और तकनीकी की कीमत तो होती है. और तकनीकी चाहे बुलेट ट्रेन की हो या क्रूज मिसाईल की या फिर ज्यादा पैदावार वाली कृषि की – सब आपस में जुड़े तो है किसी जगह. बात बात की नहीं एटीत्युड की है.

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