विपिन किशोर सिन्हा

(पाण्डवों द्वारा हस्तिनापुर को दूत भेजना)

विश्वास ही नहीं होता था कि हमने वनवास के बारह वर्ष और अज्ञातवास का एक वर्ष लगभग निर्विघ्न पूरा कर लिया। वैसे भी समय और सागर की लहरें किसकी प्रतीक्षा करती हैं? दोनों अपनी गति से आगे बढ़ते जाते हैं। जो इनकी गति से सामंजस्य स्थापित कर लेता है, वह इतिहास रच डालता है और जो पिछड़ जाता है, समय के सागर में डूब जाता है। वनवास की अवधि में कई अवसर ऐसे भी आए जब हमें कंकड़-पत्थरों पर शयन करते हुए रात बितानी पड़ी – विशाल अंबर ने हमें छत प्रदान की, विपत्तियों ने दूध पिलाया और आंधियों ने लोरी सुनाई।

जीवन के तेरह वर्ष. मस्तिष्क के स्मृति पटल पर कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएं खींच, समय के प्रवाह में विलुप्त हो गए।

अभिमन्यु के विवाह के दूसरे दिन राजा विराट की राजसभा में, भविष्य के कार्यक्रम की रूपरेखा तय करने हेतु एक बैठक बुलाई गई। श्रीकृष्ण, पिता वसुदेव जी एवं अग्रज बलराम के साथ उपस्थित थे। पांचालराज द्रुपद अपने पुत्र धृष्टद्युम्न के साथ पधारे थे। हम पांचो भ्राता और सात्यकि राजा विराट के साथ पहले से ही विद्यमान थे। भविष्य की कार्य योजना श्रीकृष्ण को ही बनानी थी। जब भी वे हमलोगों के बीच रहते, हम पाण्डव और विशेष रूप से मैं अपने मस्तिष्क पर ज्यादा दबाव नहीं डालते। उनके निर्णय और परामर्श में किन्तु-परन्तु की संभावना रहती ही कहां थी? एक-से-एक बड़े और जटिल निर्णय लिए थे श्रीकृष्ण ने अपने जीवन काल में लेकिन हर बार सहज रहे। प्रत्येक निर्णय का परिणाम इतिहास के लिए मानक बन गया, मानवता के लिए वरदान सिद्ध हुआ। किसी निर्णय पर पश्चाताप करते नहीं देखा उनको।

सभा भवन में सभी शुभचिन्तकों ने अपने-अपने स्थान ग्रहण कर लिए। कौरव और पाण्डवों के संबन्ध, आर्यावर्त के भविष्य का निर्धारण करेंगे, सभी को ज्ञात था। सभी शान्त थे लेकिन दृष्टि श्रीकृष्ण के मुखमण्डल पर टिकी थी। सभी को श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निकलने वाले अमृत वचनों की प्रतीक्षा थी। अधिक विलंब न करते हुए उन्होंने प्रस्तावना रखी –

“सभी नृपगण एवं शु्भचिन्तक बन्धु-बान्धव! धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन ने किस तरह कपटद्यूत के माध्यम से शकुनि और कर्ण के परामर्श पर, महाराज युधिष्ठिर का राज्य छीन लिया और पांचो पुरुष सिंहों को वन-वन भटकने के लिए वाध्य किया, आप सबको विदित है। पाण्डव अपने शौर्य, पुरुषार्थ और पराक्रम से अपनी खोई राज्यलक्ष्मी प्राप्त करने में पूर्ण रूपेण समर्थ थे लेकिन वे धर्मनिष्ठ थे, अतएव कठोर नियमों का पालन करते हुए उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा का पालन करना उचित समझा। अब समय आ गया है – इन्हें इनका वह राज्य मिलना चाहिए, जिसे धरती के इन श्रेष्ठ वीरों ने अपने श्रम और बाहुबल से प्राप्त किया था। अगर धृतराष्ट्र और दुर्योधन इस न्यायोचित कार्य में किसी तरह का व्यवधान उपस्थित करेंगे तो वे इन पाण्डुपुत्रों के प्रचंड क्रोध के निश्चित लक्ष्य होंगे। उनका विनाश कोई रोक नहीं पाएगा। इस धर्मयुक्त कार्य में, पाण्डवों के हम सभी सुहृदगण संपूर्ण शक्ति और क्षमता से उनका साथ देंगे।

यद्यपि धृतराष्ट्र पुत्रों ने सदैव धर्मनिष्ठ पाण्डवों को असह्य कष्ट पहुंचाए हैं, फिर भी महाराज युधिष्ठिर सदा उनका मंगल ही चाहते हैं। दुर्योधन इस समय क्या चाहता है, उसके क्या विचार हैं, हमें ज्ञात करना होगा। एक पक्षीय युद्ध की घोषणा करना न्ययोचित नहीं है। अतः महाराज धृतराष्ट्र को यह सूचना दी जाय कि पाण्डव सफलतापूर्वक वनवास और अज्ञातवास की अवधि पूर्ण कर संप्रति विराटनगर में महाराज विराट के राजकीय अतिथि के रूप में निवास कर रहे हैं। उनसे आग्रह किया जाय कि अन्तिम द्यूतक्रीड़ा के प्रावधानों के अनुसार, वे पुरुषश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर को उनका अर्जित राज्य ससम्मान वापस करने का कष्ट करें। इन संदेशों के साथ कोई वाक्पटु, धर्मात्मा, पवित्रचित्त, कुलीन, सामर्थ्यवान और सावधान दूत हस्तिनापुर भेजा जाय, यह मेरा प्रस्ताव है।”

श्रीकृष्ण के प्रस्ताव पर सभी राजाओं ने अपनी सहमति प्रदान की। लेकिन दुर्योधन शान्तिपूर्ण सत्ता के हस्तान्तरण पर अपनी सहमति देगा, इसपर किसी को विश्वास नहीं था। अतः महाराज द्रुपद शान्ति-प्रस्ताव के साथ-साथ बिना समय गंवाए युद्ध की तैयारी के पक्ष में थे। उन्होंने श्रीकृष्ण को संबोधित करते हुए कहा –

“महाबाहो! मुझे विश्वास नहीं है कि दुर्योधन शान्तिपूर्वक पाण्डवों को राज्य दे देगा। अबतक की प्राप्त सूचनाओं के अनुसार, वह राज्य देने के बदले, युद्धभूमि में मृत्यु का वरण करने के लिए तैयार है। महाराज धृतराष्ट्र पुत्रमोह के कारण उसकी बात मानने के लिए वाध्य हैं। भीष्म और द्रोण, दीनता के कारण तथा कर्ण और शकुनि मूर्खता के कारण उसकी ‘हां’ में ‘हां’ मिलाएंगे ही। दुर्योधन मीठी बातों से प्रभावित होने वाला नहीं है। दुष्टजन मृदुभाषी को कायर समझते हैं। अतः हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र के पास ऐसा दूत भेजा जाय जो दृढता से अपनी बात रख सके। मेरे पुरोहित जी बड़े विद्वान ब्राह्मण हैं। इन्हें संदेश देकर महाराज धृतराष्ट्र के पास भेजा जाय। दुर्योधन, भीष्म, धृतराष्ट्र और द्रोणाचार्य से अलग-अलग क्या कहना है, वह भी इन्हें समझा दिया जाय।

शान्ति के साथ हमें युद्ध की तैयारी भी शीघ्रता से करनी पड़ेगी, क्योंकि युद्ध अवश्यंभावी है। हमें अविलंब मित्र देशों के पास दूत भेजने चाहिए, जिससे वे हमारे लिए सेना तैयार रखें। शल्य, जयेत्सन, धृष्टकेतु और केकयराज – इन सभी के पास शीघ्रगामी दूत भेजे जाने चाहिए। दुर्योधन भी सभी राजाओं के यहां दूत भेजेगा और वे जिसके द्वारा पहले आमंत्रित होंगे, उसी को सहायता के लिए वचन देंगे। इसलिए राजाओं के पास सर्वप्रथम हमारा निमंत्रण पहुंचे – इसके लिए शीघ्रता करनी चाहिए।”

श्रीकृष्ण समेत सभी राजाओं ने महाराज द्रुपद के प्रस्ताव पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगाई। बिना किसी विलंब के चारों दिशाओं में, महाराज विराट और द्रुपद ने युधिष्ठिर की ओर से युद्ध में सम्मिलित होने के लिए निमंत्रण भेजा। अधिकांश नरेशों ने हमारा निमंत्रण स्वीकार किया और प्रसन्नतापूर्वक विराटनगर आने लगे। उचित अवसर देख महाराज द्रुपद ने अपने श्रेष्ठ पुरोहित जी को बुलाया, युधिष्ठिर के दूत के रूप में उनकी नियुक्ति के पश्चात समझाते हुए कहा –

“पुरोहित जी! आप श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न एक सिद्धान्तवेत्ता ब्राह्मण हैं। आपकी बुद्धि शुक्राचार्य और बृहस्पति जी के समान है। आपको भलीभांति ज्ञात है कि कौरवों ने पाण्डवों को कैसे ठगा था – शकुनि ने कपट द्यूत के माध्यम से धर्मराज युधिष्ठिर को कैसे प्रवंचित किया था। वे स्वयं तो किसी प्रकार से भी राज्य नहीं देंगे किन्तु आप धृतराष्ट्र को धर्मयुक्त बातें सुनाकर उन वीरों के चित्त अवश्य बदल सकते हैं। विदुरजी भी आपकी बातों का समर्थन करेंगे। आप भीष्म, कृप और द्रोण आदि में मतभेद उत्पन्न कर सकते हैं। इस प्रकार जब उनके मंत्रियों में मतभेद हो जाएगा और योद्धागण उनके विरुद्ध हो जाएंगे तो कौरवों की संपूर्ण शक्ति, सर्वप्रथम उन्हें एक सूत्र में पिरोने में लग जाएगी। हमलोग इस समय का सदुपयोग सैन्य संगठन और धन संचय में करेंगे। आप वहां कई दौर के विचार-विनिमय के अनेक कार्यक्रम बनाइयेगा और अधिक से अधिक समय तक वहां प्रवास कीजिएगा। आपके वहां रहते हुए, वे सेना एकत्रित करने का काम नहीं कर पाएंगे। ऐसा भी संभव है, आपकी संगति से धृतराष्ट्र आपकी धर्मानुकूल बात मान लें। आप धर्मनिष्ठ हैं, अतः मेरा विश्वास है कि उनके साथ धर्मानुकूल आचरण करके कृपालु पुरुषों के आगे पाण्डवों के क्लेशों का विस्तारपूर्वक करके ज्येष्ठों के सम्मुख पूर्व पुरुषों द्वारा बरते हुए कुलधर्म की चर्चा चलाकर उनकी चित्तवृत्ति को बदल देंगे। अतः आप धर्मराज युधिष्ठिर की कार्यसिद्धि के लिए पुष्य नक्षत्र और विजय मुहूर्त्त में प्रस्थान करें।”

क्रमशः

 

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