सकारात्मक सोच की वैज्ञानिकता और कोरोना मुक्ति

  • ललित गर्ग –
    सोचना एक कला है, हर आदमी इस कला को नहीं जानता, इस कला को जो जान लेता है, उसका मार्ग बहुत साफ, निष्कंटक, निरोगी एवं उसका जीवन सफल बन जाता है। विचारों का ही परिणाम है कि हम जैसा सोचते हैं, वही सच्चाई बन जाती है। घटनाएँ, अनुभव, कार्य एवं जीवन पथ विचारों को उत्पादित करती है एवं अवचेतन में रखती है। सफल व्यक्ति परिस्थिति को सकारात्मक स्वरूप देते हैं। अनेक कोरोना पीड़ित अपनी सकारात्मक सोच से स्वस्थ हुए, वहीं दूसरे अपने शारीरिक स्वास्थ्य, सामाजिक परिस्थिति एवं भाग्य को अभिशाप मान खुद ही नकारात्मक भाग्य विधाता बने हैं। चिंतन की दो दृष्टियाँ हैं-निषेधात्मक दृष्टि और सकारात्मक दृष्टि। आदमी बहुत बार निषेधात्मक दृष्टि से ही सोचता है, वह सकारात्मक दृष्टि से नहीं सोचता। निषेधात्मक दृष्टि से सोचने का परिणाम होता है-निराशा, अनुत्साह, आवेग, रोग को बढ़ाना, कर्तव्य से पलायन। एक शब्द में कहें तो निषेधात्मक दृष्टि का परिणाम है-जीवन में असफलता का उदय एवं अंधेरों का वर्चस्व। निराशावादी विचार भावनाजन्य बीमारियाँ, रुग्णता, तनाव, कुंठा, डर, भय, विषाद, वितृष्णा ही देते हैं और कोरोना से लड़ने की शक्ति को निस्तेज कर देते हैं।
    कोरोना ने हमारी सोच एवं आत्मविश्वास को कुंद कर दिया है, ऐसे लोगों को हम देखते हैं जिनका चेहरा बुझा-बुझा है। न कुछ उनमें जोश है न होश। ऊर्जा का स्तर उनमें गिरावट पर होता है। क्यों होता है ऐसा? कभी महसूस किया आपने? यह सब हमारी शारीरिक स्वस्थता के साथ-साथ मानसिक स्थिति का और विचारों का एक प्रतिबिंब है। जब कभी आप चिंतातुर होते हैं तो ऊर्जा का स्तर गिरने लग जाता है। उस समय जो अनुभूति होती है, वह है-शरीर में थकावट, निराशा, कुछ भी करने के प्रति अनिच्छा और अनुत्साह। चिंता या तनाव जितने ज्यादा उग्र होते हैं, उतनी ही इन सब स्थितियों में तेजी आती है, किसी काम में तब मन नहीं लगता और ये स्थितियां कोरोना के संकट को कम करने की बजाय बढ़ाती है। अभी पता नहीं, कोरोना की कितनी लहरों का सामना करना है, इसलिये सकारात्मकता को विकसित करना ही होगा।
    आज के कोरोना विभीषिका के समय में यह बहुत गंभीर मसला है कि निराशा और अवसाद में डूबे लोग सकारात्मकता और ऊर्जा कैसे पाये? सकारात्मकता का अर्थ है- अपने जीवन जीने की दिशाओं को आशाभरी नजरों से देखना। यदि आप कोरोना को मात देने के कार्य में अयोग्य हैं तो अपने को कमजोर मान निराशा या अवसाद में डूबने की जरूरत नहीं है। क्योंकि कोरोना को हराना आपके विश्वास पर ही निर्भर है। शोधों से निष्कर्ष निकला है कि डर व तनाव से हाई ब्लडप्रेशर बढ़ता है। क्रोध व ईष्र्या से हार्ट अटैक एवं लकवा की स्थिति बनती है। लालचीपन एवं अत्यधिक व्यसन डायबिटीज व दिल की बीमारियों की जननी है। डाॅ. रबेका बियर्ड के अनुसार निराशा एवं कुंठा इन्सुलिन गलाती है जिससे डायबिटीज उत्पन्न होता है। होलिस्टीक मेडिसिन का सिद्धांत है कि यदि मन में समाए निराशाजनक, खराब व गंदे विचारों को निकाल दिया जाए तो स्वस्थ होने की संभावना प्रबल हो जाती है, लेकिन मनुष्य की विचित्र प्रकृति है-अच्छा काम करने वाला जल्दी निराश हो जाता है और बुरा काम करने वाला निराश नहीं होता। कालाबाजारी, लोभी, चोर, लुटेरे, डाकू कहाँ निराश होते हैं, यह एक सच्चाई है। महान दार्शनिक संत आचार्य श्री महाप्रज्ञ कहते हैं कि मैंने चिंतन किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जितनी गहरी आस्था बुराई में होती है, उतनी अच्छाई में नहीं होती। अच्छाई में उतनी ही गहरी आस्था संपादित करने के लिए बहुत साधना की आवश्यकता होती है।’ असल में इस साधना के लिए सबसे पहले सकारात्मक सोच जरूरी है। हम कैसे सोचें? हमारा सोचने का तरीका क्या हो? इसे जानना इसलिए जरूरी है कि निषेधात्मक दृष्टि से चिंतन करने वाला व्यक्ति हर सच्चाई को नकारता चला जाता है और सकारात्मक दृष्टि से चिंतन करने वाला व्यक्ति सच्चाई के पास पहुँच जाता है, सच्चाई को उपलब्ध हो जाता है और वह अनेक समस्याओं का समाधान पा लेता है।
    जीवन की सफलता का सबसे महत्त्वपूर्ण सूत्र है सकारात्मक दृष्टि से सोचना। सकारात्मक दृष्टि से वही व्यक्ति सोच सकता है जिसने जीवन में संतुलन स्थापित किया है, जिसने चित्त को निर्मल किया है, जिसने मन को एकाग्र कर लिया है, जिसने आत्मविश्वास को बढ़ाया है। सकारात्मक विचारों के प्रणेता डाॅ. नार्मन विन्सेन्ट पीले ने हजारों लोगों की वैवाहिक, व्यापारिक, मानसिक एवं शारीरिक समस्याएँ केवल प्रार्थना से सुलझाई। विचारों को व्यावहारिक, सकारात्मक एवं वैज्ञानिक बनाकर न केवल कोरोना संकट बल्कि डर, फोबिया, कुंठा, विषाद, एलर्जी का शतप्रतिशत निवारण किया जा सकता है। विश्वविख्यात लेखक जार्ज आलेख का कहना है कि ‘यदि विचार भाषा को गंदा करते हैं तो भाषा विचारों को भी।’ सफल, प्रसन्न, स्वस्थ एवं शक्तिशाली व्यक्ति सोचने में सकारात्मक ऊर्जायुक्त शब्द ही प्रयोग करते हैं। मेडिकल अनुसंधानों से यह प्रमाणित हो गया है कि आशावादियों के मस्तिष्क में इंडोर्फीन नामक हारमोन अधिक पाया जाता है जिसका असर मार्फिन से हजारों गुना अधिक होता है। इसी प्रकार शांति की मनःस्थिति में न्यूरोपेपटाइड नामक हारमोन पाया जाता है जिससे हमें प्राकृतिक एवं मानसिक सुख, शांति, संतुलन का अनुभव होता है। शोधों के अनुसार तनाव एवं निराशा वाले विचार रोग प्रतिरोधक शक्ति कम करते हैं। विचार व्यक्तित्व, स्वभाव, मान्यता, धारणा एवं शारीरिक क्रियाओं को भी नियंत्रित करते हैं। विश्व प्रसिद्ध हिप्नोथिटैपिस्ट डाॅ. मिलटन एरिकसन के एक प्रयोग में एक हिप्नोटाइज किए हुए व्यक्ति के हाथ में फफोला उठ आया, क्योंकि उससे कहा गया कि गर्म सलाख का स्पर्श कराया गया है जबकि बर्फ का स्पर्श कराया गया था।
    मस्तिष्क विशेषज्ञों के अनुसार सफलता, सुख एवं समृद्धि के लिए तार्किक तथ्यों एवं आँकड़ों पर आधारित विचार ही एकमात्र उपाय हैं उच्चतम परिणाम के लिए। साफ, विधेयक एवं निश्चित विचारों का ही प्रयोग करना चाहिए। शेक्सपियर ने लिखा है कि अच्छा या बुरा कुछ नहीं है केवल विचार ही किसी वस्तु को अच्छा या बुरा बनाता है। असल में अपने बारे में धारणा विचारों को बहुत प्रभावित करती है। कई व्यक्ति प्लास्टिक सर्जरी के बाद भी अपने को बदसूरत समझते हैं। उनमें आत्महीनता ही बनी रहती। जबकि साधारण लोग अपने को सुंदर एवं आकर्षक मानते हैं तो उनमें आकर्षण एवं निखार आता ही जाता है, सोचना उत्पाद का पहला मसाला है।
    सफलता, योग्यता एवं विशेषता दैवीय एवं प्राकृतिक विशेषता नहीं है वरन् सकारात्मक सोच, विश्वास एवं मेहनत का अर्जन है। इतिहास गवाह है कि जो हस्तियाँ अकाल युद्ध, कोरोना महामारी व दैवीय विपदाओं से बच निकलते हैं उनके विचारों में सदैव मानवता, मानव शक्ति एवं सद्कर्म की प्रधानता रही है। अपने को हीन एवं अशक्त समझना अपराध है। अपनी ऊर्जा को सकारात्मक रूप देने और उसे बढाने के लिए आप इस तथ्य को अपने मन मस्तिष्क में बिठा लें कि सामान्यतः मनुष्य कोरोना को लेकर जो कुछ कर रहा है वह उसकी क्षमता से बहुत कम है। यदि वह ठान ले तो कोरोना को हारना ही होगा। महावीर वाणी के आधार इस बात को दृढ़ता के साथ और सही ढ़ंग से प्रस्तुत किया कि इस ह्यूमन बॉडी में जो विराट शक्तियाँ छिपी हुई हैं, उनका सही उपयोग किया जाए तो निःसंदेह मनुष्य सर्वज्ञता, निरोगिता और महानता जैसी स्थिति को प्राप्त कर सकता है और यही स्थिति कोरोना मुक्ति की सार्थक दिशा है।
    चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में आंकना और सामथ्र्य व परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जीवन जीना ही कोरोना मुक्ति का मार्ग है। यदि परिस्थितियां हमारे हित में नहीं है तो उन्हें अपने हित में करने के लिए जूझना होगा। दुनिया में ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिसे इंसान न कर सके। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो बदला न जा सके। संयम, अनुशासन एवं कोरोना मुक्ति के नीति-नियमों से समृद्ध होकर आप कोरोना व्याधि एवं संकट के बीच भी जीवन को आनंदित बना सकते हैं, समाज और राष्ट्र के लिए भी ज्यादा उपयोगी साबित हो सकते हैं। सदा उत्साहित रहकर खुद को ऊर्जा से भरपूर रखें, इससे आपके व्यक्तित्व को नई पहचान एवं आत्मविश्वास मिलेगा। जब आपका इस तरह आत्मविश्वास बढेगा, तो कोरोना महासंकट से मुक्ति में सफलता की सीढियों पर बहुत जल्दी आप आरोहण कर सकेंगे।

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