हर परिस्थितियों में लाभ-हानि देखने से देश का भला नहीं होगा

राजनीति भी ग़ज़ब चीज़ है गुरु! यहां कब कौन क्या कह दें। यह राम जानें या फ़िर वह सियासतदां। चलिए वर्तमान की बात कर लेते हैं। इन दिनों मौसम भले ही सर्द हो लेकिन राजनीतिक गलियारों में सरगर्मियां तेज़ हैं। बात चाहे कोरोना वायरस की वैक्सीन पर मच रहे घमासान की हो या फिर कृषि बिल की। कोई भी पार्टी अपने लिए माहौल बनाने से कतई बाज नहीं आ रही है।  जिस कोरोना वायरस ने समूचे विश्व में कोहराम मचा रखा था। सम्पूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था को अर्स से फर्स पर ला दिया था। आज उसी कोरोना वायरस के नए नए रुपों के साथ ही चुनोतियों का नया स्वरूप भी सामने आ रहा है, लेकिन सियासत के सूरमाओं को फ़र्क कहाँ पड़ता इससे। वो तो कोरोना वायरस जैसी महामारी की आड़ में भी अपनी रोटी सेंकने में बाज नही आ रहे है। आज करीब 8 महीने के लंबे इंतजार के बाद कोरोना जैसी गम्भीर बीमारी से निजात दिलाने के लिए भारत ने कोरोना का टीका बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है। वैसे तो इस महामारी के टीके के लिए कई देश वैक्सीन बनाने की रेस में लगे थे। 
        चीन, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों ने अपनी वैक्सीन तैयार कर ली। तो वही भारत ने भी अपनी स्वदेशी वैक्सीन तैयार कर ली है। लेकिन भारत मे किसी मुद्दे पर राजनीति न हो ऐसा असम्भव ही है और हो भी क्यों न आख़िर राजनीति के रणबाकुरों को तो बस मुद्दा चाहिए हंगामे के लिए। फिर चाहे बात इंसान की जान की ही क्यो न हो। तभी तो देश मे वैक्सीन के ट्रायल के साथ ही राजनीति भी शुरू हो गयी है। हमारे देश में राजनीति हो और उसे मजहब से न जोड़ा जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता है। मज़हब के नाम पर राजनीति करना तो जैसे राजनेताओं का अपना एक अलग धर्म बन गया है। आख़िर कोरोना वैक्सीन का मज़हब से क्या लेना देना है? जहां पूरी की पूरी इंसानी जमात के अस्तित्व पर ख़तरा आन पड़ा हो। वहां मज़हब का आड़े आना समझ से परे दिखता है। कहा गया है, धर्म वह है जो धारण किया जाएं। लेकिन राजनीति के लम्पटों को कौन समझाए? जिस कोरोना वायरस ने बिना जाति और धर्म देखे न जाने कितने ही लोगो को मौत की नींद सूला दिया हो। उस वायरस से निजात दिलाने के लिए देश ने अपनी वैक्सीन तैयार कर ली है। उस पर राजनीति करना क्या सही है? इतना ही नहीं अगर इंसानी सभ्यता ही नहीं रहेगी फ़िर कैसा मज़हब और कैसा सम्प्रदाय? कुछ ही समय पहले मुस्लिम समुदाय ने शरीयत का हवाला देकर कोरोना वैक्सीन पर बवाल मचा दिया था। मुस्लिम समुदाय का कहना था कि वैक्सीन बनाने में सुअर का इस्तेमाल किया गया है। उनका मत है कि टीका बनाने में “पोर्क जेलेटिन” का यूज़ किया गया है जो कि “नापाक” है तो वही ईसाई समुदाय ने भी कोरोना वैक्सीन का जमकर विरोध किया। अब सवाल यह उठता है कि इस तरह धर्म की आड़ लेकर राजनीति करना क्या सही है? क्या अब मुल्ला-मौलवी और सियासी रोटी सेंकने वाले सियासतदां ही तय करेंगे कि आवाम के लिए क्या सही और क्या ग़लत? आख़िर जो सभी के जीवन-मरण का प्रश्न हो, फ़िर उसमें किसी दूसरे की बात किस काम की। 
    यूं तो दुनिया में ऐसे कई संगठन है जो वैक्सीन का विरोध करते रहे है। वे अनिवार्य टीकाकरण को नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन मानते है। उन्हें इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कि इस तरह के विरोध से वह अनगिनत ज़िन्दगियों को मौत के मुंह मे डालने से भी कतरा रहें है। इनमें वे तमाम लोग शामिल होते है जो कभी धर्म के नाम पर तो कभी प्रकृतिवादिता का हवाला देकर तो कभी अन्य वैकल्पिक कम्पनियों के समर्थक तक हो सकते है। बात अगर वैक्सीन की करे तो जब जब दुनिया महामारी के दौर से गुजरी है तब तब वेक्सिनेशन ने दुनिया को मौत के मुंह से बाहर निकाला है। पोलियो, चेचक, येलो फीवर यहां तक कि रूबेला जैसी बीमारी से निजात दिलाने में वैक्सीन कारगर साबित हुई है। एक शोध के अनुमान के मुताबिक दुनियाभर में हर साल करीब 20 से 30 लाख लोगों की जान वैक्सीन से बचाई जा रही है। तो अब भी दुनिया के किसी न किसी कोने में वैक्सीन विरोधी स्वर मुखर हो ही उठता है। भले ही वैक्सीन का विरोध करने वालो की संख्या कम हो लेकिन इन विरोधों से देश का बहुत बड़ा तबका प्रभावित होता है। यही वजह है कि चाहे धर्म की आड़ में हो या फिर राजनीतिक लाभ की मंशा से हो वैक्सीन का विरोध होता ही है।
यही वजह है कि पढ़े लिखे राजनीति के पंडित भी राजनीतिक लाभ उठाने में अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल कर ही लेते है। वे यह तक भूल जाते है कि अपने राजनीतिक लाभ के लिए किस चीज का विरोध करे और किस बात का समर्थन। उन्हें तो मतलब रहता है कि किसी तरह सत्ता की चाबी हथिया ली जाए। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव ने वैक्सीन को लेकर विवादित बयान जारी किया है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया है कि यह कोरोना वैक्सीन का टीका “बीजेपी का टीका” है। जिसे वह नहीं लगवाएंगे। अब उन जैसे पढ़े लिखे नेता को यह बात कौन समझाए कि टीका किसी पॉलिटिकल पार्टी का नहीं होता है। इतना ही नहीं टीका कोई नरेंद्र मोदी या किसी भाजपा के नेता के घर मे नही बना। बल्कि जब भी कोई टीका तैयार होता है तो उसे तमाम वैज्ञानिक कसौटियों पर परखा जाता है, देश के तमाम बड़े डॉक्टर मिलकर टीका तैयार करते है। तो वह टीका किसी पार्टी का कैसे हो सकता है। हद तो तब हो गई जब कांग्रेस पार्टी के एक नेता तो यहां तक कह गए कि यह वैक्सीन विपक्ष को खत्म करने के उद्देश्य से तैयार की गई है। अब यह कहना अतिश्योक्ति नही होगी कि आधुनिक भारत मे राजनेता अपनी राह से भटक रहे है। अब राजनेताओं को सही राह दिखाने का काम देश की आवाम को ही करना होगा। उन्हें यह याद दिलाना होगा कि राजनीति में पक्ष – विपक्ष सहमति- असहमति भले हो लेकिन जिन मुद्दों पर देश को एकजुटता की आवश्यकता हो ऐसे मुद्दों पर राजनीति से बढ़कर देश हित में खड़े होना चाहिए। तभी राजनीति की सार्थकता सिद्ध होगी और आवाम का हित सिद्ध हो पाएगा।

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