अपने-अपने खातिर कूदे मैदान में

                 ‘मै अपने कार उत्पादन सयंत्र को गुजरात लाया था, और इसके कुछ समय बाद यह दुनिया में कार निर्माण का एक केंद्र बन गया. आज जब मोदी के नेतृत्व में भारत एक नए युग में प्रवेश कर रहा है तो गुजरात की भी भूमिका रहेगी.’ ये प्रतिक्रिया किसी और की नहीं वल्कि पश्चिम बंगाल में नैनो कार का कारखाना लगाने की असफल कोशिश के बाद गुजरात में उसके स्थापित करने वाले  रतन टाटा की है . 
           अडानी और अम्बानी को लेकर मोदी पर निशाना साधने वालों को मालूम हो कि दरअसल जिन्हें व्यवसाय करना है, देश को विकसित होते देखना है उन्हें पता है कि वर्तमान में देश में उधमशीलता के लिए  सर्वाधिक अनुकूल माहौल मोदी के रहते ही संभव है . कृषि सुधार कानून के पीछे जो लोग बड़े व्यापारिक घरानों का हाँथ दिखाने कि कोशिश में लगे हैं उनमें  ऐसे धनपति नेता भी हैं जिनकी अनाज संग्रह करने के बड़े-बड़े वेयरहाउस की चैन स्थापित है. किसानों से ज्यादा उन्हें इन वेयरहाउस के भविष्य  को लेकर नयें कानून से खतरा दिख रहा है. निजी-क्षेत्र के आने से कृषि-व्यवसाय गेहूं,दलहन, चावल जैसे सीमित  पारंपरिक उपज  से बाहर  निकल विभिन्न किस्म के नए उत्पादों  के रूप को  प्राप्त कर सकेगा. इसके लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टोरेज, फ़ूड-प्रोसेसिंग   व आवश्यक स्थानीय व वैश्विक- बाजार उपलब्ध कराने में बड़े व्यापारिक समूह का वर्तमान में कोई विकल्प नहीं. आज कृषि-सुधार कानून के आभाव में ही सरकारी गौदामों के हवाले किया गया बड़ी मात्रा में सरप्लस आनाज  या तो सड़ जाता है, या जीव-जंतु-चूहों का भोजन बन जाता है; और, या फिर सरकारी तंत्र में मौजूद भ्रष्टाचारी तत्वों की कमाई का  साधन .
     वैसे आन्दोलन के समाधान में सबसे बड़ी बाधा बनकर आज भी वही तत्व खड़े हैं,  जो चीन के हितों को ध्यान में रख  समय-समय पर देश के अन्दर अपनी भूमिका तय करते हैं. आराजकता फैला कर इन्होनें ही  तूतीकोरीन स्थित  वेदांता स्टरलाइट कॉपर प्लांट को बंद करवा दिया था. जिसके  परिणामसवरूप देश का कॉपर उत्पादन  ४६.१%  गिर गया, और  २०१७-१८ में जहां हमारा विश्व में पांच बड़े निर्यातकों में नाम था, २०२० के आते-आते हम आयातक हो गए.          कुडनकूलम परमाणु सयंत्र को लेकर भी  धरना-प्रदर्शन,जन-आंदोलन जितना हो सकता था सब-कुछ अजमाया गया कि कैसे भी हो ये परियोजना अमल में लायी ही ना जा सके, पर वे सफल ना हो सके . तत्कालीन सप्रंग सरकार के मंत्री नारायण सामी नें आरोप लगाया था कि इस मामले में  दो एनजीओ को ५४ करोड़ रूपए दिए गए थे. बंगलोर से ६० कि.मी. दूर स्थित नरसापुर में स्थापित मोबाइल फोन निर्माता कंपनी विस्ट्रान में पिछले दिनों हुयी तोड़फोड़ में जिनका हाँथ पाया गया उनके भी इनसे सम्बन्ध पाए गए, और एक छात्र नेता को गिरफ्तार भी किया गया. 
और जहां तक केंद्र सरकार की बात है आज उसका कृषि-बजट १,३४०००  करोड़ के पार पहुँच चुका है, जो कि कभी पांच साल पहले मात्र १२००० करोड़ था. ये आंकड़े इस बात को बताने के लिए पर्याप्त हैं कि वर्तमान सरकार कृषि को लेकर कितनी गंभीर है.

Leave a Reply

28 queries in 0.397
%d bloggers like this: