लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

Posted On by &filed under कविता.


आँखों में था

पूरा ही आकाश

तब भी और अब भी

और थे उसमें से झाँकतें निहारतें

कृतज्ञता के ढेरों सितारें.

 

और थे उसमें आशाओं के कितने ही कबूतर

जिन्हें उड़ना होता था बहुत

और नीचें धरती पर होता था

सेकडों मील मरुस्थल

और आशाओं निराशाओं के फलते फलियाते

फैलते दावानल.

 

सम्बन्धों की दूरियों के बीच

कितने ही तो बिम्ब प्रतिबिम्ब थे

और कितनें ही प्रतीक और उदाहरण

किस किस पर छिड़क दें प्राण

और किस किस के ले लें प्राण?

 

ये कैसी है उड़ान

कि बहुत सी सुनी अनसुनी बातों को

उठाये अपनी पलकों पर

इस तरह

कि वे पलक झपकते ही गिर जाएँ

या हो जाएँ अपलक ही कोई स्वप्न पूरा.

 

One Response to “अपलक देखतें सपनें”

  1. Vijay Nikore

    सम्बन्धों की दूरियों के बीच

    कितने ही तो बिम्ब प्रतिबिम्ब थे

    और कितनें ही प्रतीक और उदाहरण

    किस किस पर छिड़क दें प्राण

    और किस किस के ले लें प्राण?

    बहुत सुन्दर !
    बधाई।
    विजय निकोर

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *