आत्मनिर्भर भारतः आपदा के साथ भी आपदा के बाद भी


वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में आत्मनिर्भरता की अर्थनीति एक बार फिर चर्चा में है। ये कोई नयी नीति नहीं है। राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही आत्मनिर्भरता भारतीय आर्थिक विचारधारा के बुनियादी तत्वों में शामिल रही। 1905 के बंग-भंग आंदोलन में सर्वप्रथम विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता की बात की गई, जिसे वंदे मातरम के नारे के साथ प्रचारित किया गया। बाद में महात्मा गाँधी ने ग्राम सुराज, आर्थिक विकेन्द्रीकरण तथा खादी व चरखे की नीति द्वारा आत्मनिर्भरता की अर्थनीति को लोकप्रिय बनाया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दूसरी से चौथी पंचवर्षीय योजना में आर्थिक आत्मनिर्भरता को मुख्य उद्देश्य घोषित किया गया। यद्यपि 1991 के पश्चात वैश्वीकरण तथा बाजार अर्थव्यवस्था के दौर में आत्मनिर्भरता की अर्थनीति का स्थान परस्पर निर्भरता की अर्थनीति ने लिया लेकिन इसके बावजूद आत्मनिर्भरता भारतीय अर्थनीति का केंद्र बिन्दु बनी रही। कोविड -19 से उत्पन्न आर्थिक चुनौतियों ने एक बार पुनः आत्मनिर्भरता की अर्थनीति को लाइम्लाइट में ला दिया है। हाल में ही भारत सरकार द्वारा 20 लाख करोड़ रूपये के आर्थिक पैकेज के साथ आत्मनिर्भर भारत योजना की शुरूआत की गई है । इस योजना का उद्देश्य कोविड-19 से उत्पन्न आर्थिक चुनौतियों से निपटना तो है ही साथ ही वर्तमान आपदा को अवसर में बदलना भी है। इस योजना की सबसे खास बात यह है कि इसे वर्तमान वैश्विक बाजार व्यवस्था के अन्तर्गत लागू किया गया है। ये योजाना न तो वैश्वीकरण विरोधी है और न ही हमारे स्वदेशी उद्योगों को संरक्षण प्रदान करती है। इस योजना का उद्देश्य वर्तमान वैश्विक बाजार व्यवस्था के अन्तर्गत स्थानीय स्तर पर कार्यरत लघु,मध्यम एवं कुटीर उद्योगों की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाना तथा उन्हें अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है,जिससे कि वे घरेलू एवं वैश्विक प्रतियोगिता में टिके रह सकें। कोविड-19 से उत्पन्न आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भ में इस योजना का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर उत्पादन को प्रोत्साहित कर आय तथा रोजगार का सृजन है जिससे अर्थव्यवस्था में मांग को बनाये रखा जाय। इस योजना के कुछ दीर्घकालिक उद्देश्य भी हैं, यही कारण है कि इस योजना को लोकल से ग्लोबल की नीति के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। विगत वर्षों में 7 से 8 प्रतिशत की आर्थिक संवृद्धि के बावजूद विश्व निर्यात में भारत का अंशदान मात्र 2.5 प्रतिशत है। निर्यात की दृष्टि से भारत विश्व में तेरहवें पायदान पर है। जबकि हमारा पडोसी देश चीन 9.5 प्रतिशत हिस्से के साथ विश्व का सबसे बडा निर्यातक देश है। इसका कारण यह है कि चीन ने अपने आर्थिक संवृद्धि दर को बढाने के साथ-साथ विश्व निर्यात में अपने अंशदान को भी तेजी से बढाया। यदि भारत भी भविष्य में अपने निर्यात को बढाना चाहता है तो उसे अपने स्थानीय आर्थिक विशिष्टताओं को व्यवसायिक रूप देना ही होगा। हम केवल कुछ ब्रांडेड बडे उद्योगों पर निर्भर रह कर विश्व निर्यात में अपने अंशदान को नहीं बढा सकते। हमें स्थानीय हुनर, स्थानीय कौशल, स्थानीय संसाधनों को व्यवसायिक रूप देना ही होगा। यही आत्मनिर्भरता भारत योजना का मूल उद्देश्य है। भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की दृष्टि से भी आत्मनिर्भरता भारत योजना महत्वपूर्ण है। 2018 में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की तीसरी सबसे तेज विकसित अर्थव्यवस्था थी किन्तु वैश्विक जी0डी0पी0 में भारत का अंशदान मात्र 3.2 प्रतिशत था तथा इस दृष्टि से भारत विश्व में छठवें स्थान पर था। सरकार की योजना भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार को वर्तमान 2.3 ट्रिलियन डालर से 5 ट्रिलियन डालर के आकार में परिवर्तित करने की है। ऐसा तभी संभव है जब हम स्थानीय संसाधनों का पूर्ण एवं कुशलतम इस्तेमाल सुनिश्चित करें,जो आत्मनिर्भर भारत योजना द्वारा ही संभव है। आत्मनिर्भर भारत योजना आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्याप्त रोजगार सृजन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। लघु एवं कुटीर उद्योग कम पूंजी में ज्यादा लोगों को रोजगार मुहैया करा सकते हैं क्योंकि उत्पादन कार्य में ये मशीनो तुलना में श्रमिकों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। अतः श्रम प्रचूर भारतीय अर्थव्यवस्था में कोविड-19 से उत्पन्न बेरोजगारी को दूर करने में लघु एवं कुटीर उद्योग रामबाण औषधि सिद्ध हो सकते हैं। ये स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। निष्कर्षतः आत्मनिर्भर भारत योजना का उद्देश्य न केवल कोविड-19 से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करना है बल्कि देश के परम्परागत उद्योगों, सांस्कृतिक औद्योगिक कौशल, स्थानीय संसाधनों को आर्थिक विकास हेतु प्रयुक्त करना भी है जिससे घरेलू अर्थव्यवस्था के विकास के साथ-साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास में भी भारत एक बडी भूमिका का निर्वाह कर सके। वस्तुतः आत्मनिर्भरता भारत योजना विकास का एक दुतरफा माडल प्रस्तुत करती है। विकास की दिशा केवल ऊपर से नीचे की ओर नहीं होना चाहिए बल्कि इसे नीचे से ऊपर की ओर भी होना चाहिए।

डाॅ. रोहित राय

असिस्टेंट प्रोफेसर – अर्थशास्त्र,  राजकीय महाविद्यालय

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