लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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– राजीव मिश्र

वैदिक धर्म के इतिहास में आचार्य शंकर का प्रादुर्भाव एक नवीन युग का सूचक है। पुरानी परंपराओं के प्रतिष्ठाता आचार्य शंकर राष्ट्रीय एकता के प्रतीक एवं अखंड भारत की स्थापना में सांप्रदायिक सद्भाव के सुदृढ़ सेतु हैं। आज के आतंकवाद से ग्रस्त अशांत संपूर्ण युग में मानव को शांति और सौहार्द, राष्ट्रीय चेतना, विश्व बंधुत्व एवं वैदिक संस्कृति का पावन संदेश प्रसारित करने हेतु परम पुज्य श्रीमद् आद्य शंकराचार्य का अविर्भाव 2593 कल्पद्ध 509 पूर्व नंदन संवत्, शुभ ग्रहो युक्त वैशाख शुक्ल पंचमी मध्याह्न में केरल स्थित कालड़ी ग्राम में ब्राह्मण दंपति के यहाँ हुआ था। इनके पिता का नाम शिवगुरू तथा माता का नाम आर्यम्बा था। यह निर्विवाद है कि आदि जगतगुरु शंकराचार्य भूतमानव भूतेष आशुतोष महेश्वर भगवान शंकर के अवतार थे। धार्मिकता की ज्योति आचार्य शंकराचार्य ने बुझाने से बचाया। देश भर में धर्म की वैदिक आभा फैल गई। वैदिक धर्म का शंखनाद ऊंचे स्वर में सर्वत्र गूंजने लगा। उपनिषदों की दिव्यवाणी, गीता का विशुद्ध एवं निर्मल ज्ञान अपने वास्तविक स्वरूप में जनता के सामने प्रकट हुआ। आचार्य शंकर ने अपने धर्मोद्धार संबंधी कार्यों को अक्षुण करने हेतु भारत के अति सुप्रसिद्ध धर्मों में चार पीठों(मठों) की स्थापना की। पूर्व में जगन्नाथ पूरी में गोवर्ध्दन पीठ, उत्तर में हिमालय बदरिका आश्रम में ज्योर्तिपीठ, पश्चिम में द्वारिका में शारदा पीठ, दक्षिण में शृंगेरीपीठ। इन पीठों में आचार्य शंकर ने अपने चार प्रमुख शिष्यों को पीठाधिपति नियुक्त किया। आज भी ये मठ आध्यात्मिकता के केंद्र हैं। आचार्य शंकर ने सन्यासियों की दस सुविख्यात श्रेणियाँ भी स्थापित की जो गिरि, पुरी, सरस्वती, तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, पर्वत एवं सागर नाम से प्रसिद्ध हैं। ब्रह्मसूत्र, ग्यारह प्रमुख उपनिषदों एवं ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ पर भाष्य लिख कर आचार्य शंकर अमर हो गए। आप निर्विवाद रूप से वेदांत दर्शन के सबसे महान आचार्य हैं। उन्होंने अपनी तीव्र मीमांसा द्वारा वेदांत का सार लेकर उस अद्भूत, अद्वैत तत्वज्ञान को प्रतिपादित किया जो कि उपनिषदों में निहित है। शंकराचार्य यद्यपि पूर्णतया अद्वैत थे, किंतु उनका अंतःकरण प्रगाढ़ भक्तिभाव से ओतप्रोत था। उनके द्वारा विरचित अद्वितीय स्त्रोत भक्ति एवं वैराग्य की भावना से परिपूर्ण है। इनसे पाषाण हृदय भी द्रवित हो उठते थे। बालक शंकर ने आयु के प्रथम वर्ष में ही अपनी मातृभाषा मलयालम के सभी अक्षरों को सीख लिया था। 2 वर्ष में विधिवत पढ़ना एवं लिखना सिख लिया था। 3 वर्षों में काव्य ग्रंथों एवं वेद पुराणों को श्रवण मात्र से समझ लिया था। 4 वर्ष में चूडाकरण संस्कार, 5 वर्ष में शास्त्रीय विधी से उपनयन संस्कार संपन्न हुआ। उनयन संस्कार के बाद विद्या अध्ययन हेतु अपने गुरू श्री गोविंदपाद के समीप पहुंचे। प्रभुपाद शंकर ने अल्प समय में हीं चारों वेदों और षट्शास्त्रों का अध्ययन कर लिया। गुरू के निवास में रहकर शिक्षा प्राप्त करने लगे एवं नियमानुसार भिक्षा हेतु भ्रमण करने लगे। ब्रह्मचारी शंकर ने भिक्षा के रूप में ऑंवला देने वाली निर्धन ब्राह्मणी की दरिद्रता को दूर करने हेतु तत्काल महालक्ष्मी की स्तुति की। परिणामस्वरूप लक्ष्मी ने ऑंवले के आकार के स्वर्णखंडों की वर्षा ब्राह्मणी के आंगन में कर दी। शंकर के इस अलौकिक शक्ति को देखकर सभी आश्चर्य में पड़ गए। आचार्य शंकर के जन्म के समय संपूर्ण भारत में जैन एवं बौद्ध धर्म (मत) का बोलबाला था। इन धर्मों के मानने वाले लोगों ने वैदिक धर्म को मानने वाले लोगों को खुल कर चुनौति दी। बौद्ध धर्म को राजा श्रय प्राप्त था। अतः इन लोगों ने उग्र रूप धारण कर लिया। अतः सनातन धर्म शनैः शनैः विच्छिन्न हो गया। ऐसी विषम परिस्थियों में धार्मिक जगत में किसी ऐसे उत्कृष्ट त्यागी, निःस्पृह, वीतराग, धुरंधर, विद्वान, तपोनिष्ठ, उदार, सर्वगुण संपन्न, अवतारी पुरूष की आवश्यकता थी। ठीक उसी समय इस भूतल पर वैदिक धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए भगवान महादेव आर्चाय शंकर के रूप में अवतरित हुए। यदि उस समय उनका अवतरण न हुआ होता तो न जाने वैदिक धर्म किस पाताल के गर्त में गिर कर समाप्त हो गया होता। उपरोक्त कार्यों को संपन्न करने के उपरांत, आचार्य शंकर ने मात्र 32 वर्ष की अल्प आयु में जीवन की जो सर्वांगीणता प्रस्तुत की, वह भारत देश कभी नहीं भूलेगा। अतः इस वंदनीय आचार्य शंकर के लिए निम्न वंदना अर्पित है ः

शंकर शंकराचार्य केशवं बादरायणं। सूत्रभाष्य कृतौवंदे भगवंतौ पुनः पुनः॥ अखिल विश्व को वेदांत सूत्र देने वाले बादरायण स्वरूप भगवान केशव तथा उन वेदांत सूत्रों को भाष्य देने वाले भगवतप्राद श्री शंकराचार्य के रूप में अवतार धारण करने वाले भगवान श्री शंकर, इन दोनों को मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ। श्रुति, स्मृत्ति और पुराण में सन्निध्दित समग्र ज्ञान के भंडार स्वरूप, जगत पर मंगल की वर्षा करने वाले, दया की मूर्ति भगवतप्राद श्री शंकराचार्य जी की मैं वंदना करता हूँ।

* लेखक, धर्म/दर्शन के स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

3 Responses to “आध्यात्मिकता की पुनर्स्थापना की थी आद्य शंकराचार्य ने”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन उवाच

    ॥लेख का ही निम्न उद्धरण ना भूले॥
    वैदिक धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए भगवान महादेव आचार्य शंकर के रूप में अवतरित हुए। यदि उस समय—
    ****===”उनका अवतरण न हुआ होता तो न जाने वैदिक धर्म किस पाताल के गर्त में गिर कर समाप्त हो गया होता।”===****

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  2. विश्‍वमोहन तिवारी

    Vishwa Mohan Tiwari

    कृपया 2593 कल्पद्ध 509 पूर्व नंदन संवत् तिथि का इस्वी सन में अनुवाद करें।
    धन्यवाद

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  3. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    भारतीय अध्यात्म के नंदन कानन में आद्द्य शंकराचार्यजी सदेव चिर स्मरणीय रहेंगे .
    भारत राष्ट्र के निर्माण में युगों युगों से जिन साधू संत एवं ज्ञानियों ने भारत को सुसभ्य सुसंस्कृत बनाने का भरपूर प्रयास किया उनमें आचार्य शंकर का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा हुआ है .महर्षि वाल्मीकि ;महर्षि व्यास की तरह उन्होंने ब्र्हम्सूत्रों संहिताओं आरण्यकों एवं आगम निगम का न केवल भाष्य लिखा अपितु अपने समय के धार्मिक पाखंड वाद का मुह तोड़ जबाब दिया .वे पुरातन आध्यात्मिक दर्शनों के प्रकांड समीक्षक भी थे .मंडन मिश्र .कुमारिल भट्ट जैसे ख्य्त्नाम आचार्यों को उन्ही के आँगन में परास्त कर अद्वेत सिद्धांत का प्रचंड मंडन करने बाले आद्द्य शंकराचार्य का पुन्य स्मरण करने हेतु आपको नमन .

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