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    Homeसाहित्‍यकविताबिहार सासाराम का शेरशाह सूरी

    बिहार सासाराम का शेरशाह सूरी

    —विनय कुमार विनायक
    छबीला बाबर छब्बीस दिसंबर
    पन्द्रह सौ तीस में मर गया!
    किन्तु ,“पानी’ ‘खा’ ‘चन्द’ ‘घाघ” जीता रहा
    (पानीपत की लड़ाई/20 अप्रैल 1526 ई.
    बाबर और इब्राहीम लोदी के बीच/
    अफगान शक्ति पराजित)
    (खान्वा की लड़ाई/16 मार्च 1527 ई.
    बाबर और राणा सांगा के बीच/
    हिन्दू शक्ति पराजित)
    (चंदेरी की लड़ाई/29 जनवरी 1528 ई.
    बाबर और मेदिनी राय के बीच/
    हिन्दू शक्ति पराजित)
    (घाघरा की लड़ाई/06 मई 1529 ई.
    बाबर और इब्राहीम लोदी का भाई
    महमूद लोदी के बीच
    अफगान शक्ति पराजित)
    प्रतिशोध की आग में जलता रहा!
    घूंट जहर का पीता रहा!
    मौका मिला नौ साल के बाद
    1539 ई. में चौसा के मैदान में
    कलंक का टीका लगा मुगलों की शान में
    हारा हुमायूं, जीता पानीपत घाघरा में
    बेघर हुए शेरों के शेर ‘शेर खां’
    खिताब पाकर ‘शेरशाह’ बना बादशाह
    सिक्के चलाकर पढ़ा उसने फतवा
    किन्तु हुमायूं को यकीन था कहां?
    पुनः सन् पंद्रह सौ चालीस में
    वह नाखालिश आ पड़ा
    मैदाने कन्नौज/बिलग्राम में
    किन्तु पीठ दिखाकर भागा कायर
    भारत छोड़ ईरान में पनाह मांगने!
    अब दिल्ली की गद्दी पर
    निशंक शेरशाह बैठा था
    और बर्बर बाबर का बेटा
    कहीं धूल में लेटा था।
    शेरशाह था बिहारी सूरी अफगान,
    साम्प्रदायिक कम, ज्यादा इंसान,
    पांच वर्षीय शासन में बनी पहचान,
    कलकत्ता से पेशावर तक जीटी रोड़,
    किनारे आम के पेड़,सराय निर्माण,
    कर रियायत, खुश रियाया किसान!
    —विनय कुमार विनायक

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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