शिव :पूर्वोत्तर भारत के सर्वमान्य ईश्वर

प्रकृतिपूजक समुदाय पर भी हिंदू धर्म और संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है I प्रकारांतर से भगवान शिव की सर्वोच्चता में पूर्वोत्तर के सभी समुदायों की आस्था है I असमिया साहित्यभ, संस्कृमति, समाज व आध्याआत्मि क जीवन में युगांतरकारी महापुरुष श्रीमंत शंकर देव का अवदान अविस्मोरणीय है । उन्होंभने पूर्वोत्तार क्षेत्र में एक मौन अहिंसक क्रांति का सूत्रपात किया । उनके महान कार्यों ने इस क्षेत्र में सामाजिक- सांस्कृंतिक एकता की भावना को सुदृढ़ किया । उन्हों ने रामायण और भगवद्गीता का असमिया भाषा में अनुवाद किया ।

धर्म की दृष्टि से पूर्वोत्तर भारत को निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया जा सकता है :
1. प्रकृतिवादी अथवा ब्रहमवादी
2. हिन्दू
3. मुस्लिम
4. ईसाई
5. बौद्ध
6. सिख एवं जैन
पूर्वोत्तर की बहुत बड़ी आबादी प्रकृतिपूजक या ब्रह्मवादी हैं I विशेषकर आदिवासी समुदाय सूर्य, चन्द्रमा, नदी, पर्वत, पृथ्वी, झील, जल प्रपात, तारे, वन इत्यादि की पारंपरिक विधि से पूजा करते हैं। जिन आदिवासी समुदायों ने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया है वे भी प्रकृति की पूजा करते हैं। ईसाई धर्म अपनाने के बावजूद इन लोगों ने अपने मूल रीति – रिवाजों का परित्याग नहीं किया है। वे चर्च में भी जाते हैं और अपने पारंपरिक विधि – निषेधों का भी पालन करते हैं। प्रकृतिपूजक (animistic) जनजातियाँ देवी -देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशु – पक्षियों की बलि चढ़ाती हैं। इनकी धारणा है कि कुछ अदृश्य शक्तियाँ सृष्टि का संचालन करती हैं, सुख – समृद्धि देती हैं, शांति एवं आरोग्य प्रदान करती हैं, फसलों की रक्षा करती हैं तथा क्रोधित होने पर हानि भी पहुँचाती हैं। यहाँ दो प्रकार की दैवी शक्तियों की अवधारणा है – हितकारी देवी-देवता और अनिष्टकारी देवी-देवता। यदि समय और परिस्थिति के अनुसार इन देवी- देवताओं की पूजा की जाए और बलि देकर उनको संतुष्ट किया जाए तो मनुष्य का जीवन सुख-शांतिपूर्ण रहता है। इन समुदायों में स्वर्ग – नरक की संकल्पना भी है। विभिन्न समुदायों में प्राकृतिक शक्तियों, देवी-देवताओ आदि को भिन्न-भिन्न नामों से संबोधित किया जाता है I विभिन्न समुदायों की पूजा विधियों में भी भिन्नता है परंतु बलि प्रथा प्रायः सभी प्रकृतिपूजक जनजातियों में विद्यमान हैं।
प्रकृतिपूजक समुदाय पर भी हिंदू धर्म और संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है I प्रकारांतर से भगवान शिव की सर्वोच्चता में पूर्वोत्तर के सभी समुदायों की आस्था है I असमिया साहित्यभ, संस्कृमति, समाज व आध्याआत्मि क जीवन में युगांतरकारी महापुरुष श्रीमंत शंकर देव का अवदान अविस्मोरणीय है । उन्होंभने पूर्वोत्तार क्षेत्र में एक मौन अहिंसक क्रांति का सूत्रपात किया । उनके महान कार्यों ने इस क्षेत्र में सामाजिक- सांस्कृंतिक एकता की भावना को सुदृढ़ किया । उन्हों ने रामायण और भगवद्गीता का असमिया भाषा में अनुवाद किया । पूर्वोत्तनर क्षेत्र में वैष्णेव धर्म के प्रसार के लिए आचार्य शंकर देव ने बरगीत, नृत्य़–नाटिका (अंकिया नाट), भाओना आदि की रचना की । उन्हों ने गांवों में नामघर स्थानपित कर पूर्वोत्तटर क्षेत्र के निवासियों को भाइचारे,सामाजिक सदभाव और एकता का संदेश दिया । इसलिए हिंदू धर्म पर श्रीमंतशंकरदेव का बहुत प्रभाव है I पूर्वोत्तर राज्यों में हिन्दू धर्मावलंबियों की संख्या सबसे अधिक है। इस क्षेत्र में हिन्दू धर्म की तीनों शाखाओं – शैव, वैष्णव, शाक्त के उपासक विद्यमान हैं। शिव सभी समुदायों के सर्वमान्य देवता हैं। आदिवासी और गैर आदिवासी सभी समुदायों में शिव की पूजा की जाती है, इन्हे भिन्न-भिन्न नामों से संबोधित किया जाता है। असम के बोड़ो कछारी के सर्वोच्च ईश्वर शिव हैं, जिन्हें ‘बाथो बरई’ अथवा ‘खोरिया बरई महाराजा’ कहा जाता है। देवरी समुदाय के भी प्रमुख भगवान शिव-पार्वती हैं। ये लोग शिव-पार्वती को ‘कुंडी’ और ‘मामा’ नाम से पुकारते हैं। ‘गिरा -गिरासी’ भी शिव-पार्वती के नाम हैं। देवरी समुदाय के लोग गणेश, कार्तिकेय की भी पूजा करते हैं। दिमासा कछारी लोग भीम की पत्नी हिडिम्बा को अपनी पूर्वजा मानते हैं। इस समुदाय के भी सर्वोच्च ईश्वर शिव हैं जिन्हें ‘शिबराई’ कहा जाता है। किसी भी आयोजन में सर्वप्रथम शिव की पूजा की जाती है I इस समुदाय का विश्वास है कि यदि विधिवत शिबराई की पूजा – अर्चना की जाए तो सुख वैभव आता है, परिवार के सदस्य स्वस्थ रहते हैं एवं दुष्ट शक्तियों का शमन होता है I सोनोवाल कछारी समुदाय हिंदू धर्मावलम्बी है I ये लोग महापुरुषीया वैष्णव धर्म में आस्था रखते हैं I गाँवों में मुख्य रूप से दो धार्मिक विभाजन है – सरनिया और भजनिया I इस समाज की वैष्णव धर्म में अटूट आस्था है, साथ – साथ ये लोग कुछ परंपरागत विश्वासों एवं रीति-रिवाजों को भी मानते हैं I अच्छी और बुरी आत्मा, दिव्य शक्तियों आदि के प्रति भी इनकी अटूट आस्था है I ये भगवान शिव की पूजा करते हैं I बर्मन समुदाय हिंदू धर्मावलम्बी है I बर्मन जनजाति में हिंदू धर्म के सभी देवी – देवताओं की पूजा की जाती है I पूजा और वैदिक संस्कारों को संपन्न कराने के लिए पंडित की सेवाएँ ली जाती हैं I इनके सर्वोच्च ईश्वर शिव हैं I बर्मन समुदाय हिंदू धर्म के सभी पर्व – त्योहार मनाता है I इस समुदाय की आत्मा के अस्तित्व में पूर्ण आस्था है I भूत – प्रेतों, दुष्ट शक्तियों एवं कुछ परंपरागत धार्मिक प्रतीकों के प्रति यह समाज अब भी आस्थावान है I धार्मिक दृष्टि से राभा समुदाय ब्रह्मवादी अथवा प्रकृतिपूजक है, परन्तु हिंदू धर्म के प्रभाव में आने के कारण ये लोग हिंदू देवी – देवताओं की पूजा करते हैं I वे शिव और शक्ति दोनों की उपासना करते हैं I ये लोग काली पूजा, दुर्गा पूजा, गणेश पूजा, शिव पूजा और हिंदू धर्म के सभी त्योहार मनाते हैं I इस प्रकार राभा समुदाय धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से हिंदू धर्म को आत्मसात कर चुका है I धार्मिक दृष्टि से मिशिंग समुदाय प्रकृतिपूजक अथवा ब्रह्मवादी है, लेकिन ये लोग हिंदू धर्मावलम्बी के रूप में अपना परिचय देते हैं I वे लोग हिंदू देवी – देवताओं की पूजा करते हैं, अनेक लोग वैष्णव धर्म को भी मानते हैं I दिव्य शक्तियों के प्रति ये लोग श्रद्धावनत रहते हैं I दिव्य शक्तियों को उई के नाम से जानते हैं I इनका मानना है कि यदि उई की पूजा नहीं की जाए तो मनुष्य बीमार पड़ता है, अकाल मृत्यु होती है, गरीबी आती है और सुख – शांति का अभाव हो जाता है I ये लोग पुनर्जन्म, आत्मा, स्वर्ग, नरक की अवधारणा में आस्था रखते हैं I ये लोग प्राकृतिक शक्तियों की पूजा – अर्चना करते हैं I इनके अतिरिक्त पहाड़ों और वनों में रहनेवाले अनेक देवी – देवताओं तथा भूत – प्रेतों के प्रति भी यह समाज गहरी आस्था रखता है I तिवा समुदाय हिंदू धर्मावलम्बी है I ये लोग शक्ति के उपासक हैं I इस समुदाय के कुछ लोग वैष्णव धर्म में भी आस्था रखते हैं I पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों में रहनेवाले तिवा समुदाय के धार्मिक विश्वासों एवं रहन – सहन में अंतर है I

पहाड़ों पर रहनेवाले तिवा थान में स्थापित मूर्तियों की पूजा करते हैं I इनके सर्वोच्च देवता पाला कोंवर हैं I फा – महादेव भी इस समुदाय के प्रमुख देवता हैं I इसके अतिरिक्त बोतोलमा जी, मोरामु जी,रुंगसु कोंवारी, सुमई मोरा भी इस समाज के प्रमुख देवी – देवता हैं I इस समुदाय में सभी गोत्रों के खुल देवता भी होते हैं I मैदानी क्षेत्रों के तिवा कोई मूर्ति स्थापित नहीं करते I इनके पूजा स्थलों में त्रिपद की स्थापना की जाती है जो भगवान शिव का प्रतीक है I भगवान महादेव इनके सर्वोच्च ईश्वर हैं I महादेव की पूजा सबसे पहले की जाती है I भगवान शिव के अतिरिक्त ये लोग अन्य अनेक देवी – देवताओं की भी पूजा करते हैं I धार्मिक दृष्टि से हाजोंग समुदाय हिंदू धर्मावलम्बी है, परन्तु अभी भी इस समाज में कुछ पारंपरिक रीति- रिवाजों एवं विश्वासों का पालन किया जाता है I अधिकांश लोग शक्ति के उपासक हैं किन्तु कुछ लोग वैष्णव भी हैं I येलोग अनेक देवी – देवताओं की पूजा करते हैं जिनमे से कुछ हिंदू धर्म से संबंधित हैं तो कुछ प्रकृतिपूजा से I तुलसी के प्रति हाजोंग समुदाय की अगाध आस्था है I प्रत्येक घर में तुलसी का पौधा विद्यमान होता है I तुलसी के पौधे के निकट संध्या के समय महिलाओं द्वारा धूप, दीप, अगरबत्ती जलाई जाती है तथा आध्यात्मिक गीत गाए जाते हैं I हाजोंग समुदाय अनेक भूत – प्रेतों में विश्वास करता है, कुछ के नाम हैं – जारंग देव, माचंग देव, डैनी, मैला, भूत, जुखिनी इत्यादि I प्रतिवर्ष श्रावण मास के अंतिम दिन सर्पों की देवी मनसा की पूजा की जाती है I

धार्मिक दृष्टि से मेच समुदाय हिंदू धर्मावलम्बी है, परन्तु अभी भी इस समाज में कुछ पारंपरिक रीति- रिवाजों एवं विश्वासों का पालन किया जाता है I अधिकांश लोग शिव के उपासक हैं किन्तु कुछ लोग वैष्णव भी हैं I शिव को बाथो कहा जाता है I काली की भी पूजा की जाती है जिसे बाली खुंगरी कहा जाता है I ये लोग अनेक देवी – देवताओं की पूजा करते हैं I सिजु पौधे के प्रति हाजोंग समुदाय की अगाध आस्था है I प्रत्येक घर में सिजु पौधा विद्यमान होता है I सिजु के पौधे के निकट संध्या के समय महिलाओं द्वारा धूप, दीप, अगरबत्ती जलाई जाती है तथा इसकी पूजा की जाती है I ऐसा विश्वास है कि सिजु पौधा शिव का प्रतिनिधि है I मेच समाज धन की देवी लक्ष्मी (मैनाव) की भी पूजा करता है I मेच समुदाय का एक वर्ग केवल ब्रह्मा की पूजा करता है I इनकी पूजा में पशु – पक्षियों की बलि नहीं दी जाती है और पूजा के दौरान मदिरा पान भी नहीं किया जाता है जबकि बाथो के उपासकों द्वारा पशु – पक्षियों की बलि देना अनिवार्य है I

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