लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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.मनोज ज्वाला
भीमराव अम्बेदकर को भारतीय संविधान का निर्माता बताया जाना
अंग्रेजों के हाथों सत्ता का सौदा करने वाले जवाहर लाल नेहरू और उनकी
कांग्रेस की एक बहुत बडी चाल है । वास्तव में भारत का संविधान न तो
भारतीय है, न ही अम्बेदकर द्वारा निर्मित । सच तो यह है कि हमारे देश का संविधान ‘भारतीय संविधान’ है ही नहीं , यह ‘अभारतीय संविधान’ है । मतलब यह कि जिसे भारतीय संविधान कहा जा रहा है , इसका निर्माण हम भारत के लोगों ने , अथवा हमारे पूर्वजों ने हमारी इच्छा व अपेक्षा के अनुसार नहीं किया है । दरअसल यह संविधान जो है सो ब्रिटिश पार्लियामेण्ट द्वारा निर्मित इण्डियन काऊंसिल ऐक्ट-१८६१ के पश्चात बाद हमारे ऊपर थोपे गए उसके विभिन्न अधिनियमों, यथा- ‘भारत शासन अधिनियम-१९३५’ एवं ‘कैबिनेट मिशन अधिनियम-१९४६’ तथा ‘भारत स्वतंत्रता अधिनियम-१९४७ के संकलन-सम्मिश्रण का विस्तार मात्र मात्र है जिसे ब्रिटिश शासन के अधीनस्थ एक अंग्रेज-परस्त आईसीएस अधिकारी वी०एन० राव ने प्रारुपित किया हुआ है ।
वैसे कहने-कहाने देखने-दिखाने को तो इस संविधान की मूल प्रति पर देश के २८४ लोगों के हस्ताक्षर हैं । किन्तु  इसका मतलब यह कतई नहीं हुआ कि यह संविधान भारत का है और भारतीय है , क्योंकि उस पर स्वीकारोक्ति-सूचक हस्ताक्षर करने वाले संविधान-सभा के उन लोगों को समस्त भारत की ओर से
अधिकृत किया ही नहीं गया था कि वे किसी संविधान पर हस्ताक्षर कर उसे भारत
के संविधान तौर पर आत्मार्पित कर लें । इस दृष्टि से यह संविधान अवैध ,
फर्जी व अनैतिक है , जिसे नेहरू के दबाव में अपना कर कांग्रेस ने भारत के
ऊपर थोप देने का पाप किया है और इसी कारण कांग्रेसियों और उनके
झण्डाबरदारों ने अपने उस कुकृत्य का ठिकरा उस अम्बेदकर के मत्थे फोड दिया
जो उस तथाकथित संविधान-सभा की प्रारुपण समिति (ड्राफ्टिंग कमिटी) के
अध्यक्ष थे न कि सम्पूर्ण सभा के । संविधान-सभा के अध्यक्ष डा० राजेन्द्र
प्रसाद थे, जबकि जिस कांग्रेस की मुट्ठी में वह सभा थी उसके अध्यक्ष
जवाहरलाल नेहरू थे ।
मालूम हो कि इस संविधान को तैयार करने के लिए कैबिनेट मिशन
प्लान के तहत ३८९ सदस्यों की एक “संविधान सभा” का गठन किया गया था ,
जिसमे ८९ सदस्य देशी रियासतों के प्रमुखों द्ववारा मनोनीत किये गए तथा
अन्य ३०० सदस्यों का चुनाव ब्रिटेन-शासित प्रान्तों की विधानसभा के
सदस्यों द्वारा किया गया था । इन ब्रिटिश प्रान्तों की विधानसभा के
सदस्यों का चुनाव, ‘भारत शासन अधिनियम १९३५’ के तहत निर्धरित सिमित
मताधिकार से , मात्र १५% नागरिको द्वारा वर्ष १९४५ में किया गया था ,
जबकि ८५% नागरिक तो उस बावत मतदान से ही वंचित रखे गए थे ।
वह संविधान-सभा सर्वप्रभुत्ता-संपन्न और भारतीय जनता
की सर्वानुमति से उत्त्पन्न नहीं थी । ब्रिटिश संसद के कैबिनेट मिशन
प्लान १९४६ की शर्तो के दायरे में रह कर काम करना और संविधान के अंतिम तय
मसौदे पर ब्रिटिश सरकार से अनुमति प्राप्त करना उस सभा की बाध्यता थी ।
उस संविधान-सभा के ही एक सदस्य दामोदर स्वरूप सेठ ने उक्त सभा की
अध्यक्षीय पीठ को संबोधित करते हुए कहा था कि “ यह सभा भारत के मात्र १५
% लोगों का प्रतिनिधित्व कर सकती है , जिन्होंने प्रान्तीय विधानसभाओं के
चयन-गठन में भाग लिया है । इस संविधान-सभा के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष
ढंग से हुआ ही नहीं है । ऐसी स्थिति में जब देश के ८५ % लोगों
प्रतिनिधित्व न हो, उनकी यहां कोई आवाज ही न हो , तब ऐसे में इस सभा को
समस्त भारत का संविधान बनने का अधिकार है , यह मान लेना मेरी राय में गलत
है ।”
उल्लेखनीय है कि १३ दिसंबर १९४६ को नेहरू के द्वारा
संविधान का उद्देश्य-प्रस्ताव पेश किया , गया था जिसे २२ जनवरी १९४७ को
संविधान-सभा ने संविधान की प्रस्तावना के रूप में स्वीकार किया । सभा की
उस बैठक में कुल २१४ सदस्य ही उपस्थित थे, अर्थात ३८९ सदस्यों वाली
संविधान-सभा में कुल ५५% सदस्यों ने ही संविधान की प्रस्तावना को स्वीकार
किया , जिसे संविधान की आधारशिला माना जाता है । यहां ध्यान देने की बात
है कि २२ जनवरी १९४७ को, संविधान की प्रस्तावना को जिस दार्शनिक आधारशिला
के तौर पर स्वीकार किया गया था उसे अखंड भारत के संघीय संविधान के
परिप्रेक्ष्य में बनाया गया था वह भी इस आशय से कि इसे ब्रिटिश सरकार की
स्वीकृति अनिवार्य थी क्योंकि २२ जनवरी १९४७ को भारत ब्रिटिश क्राऊन से
ही शासित था । १५ अगस्त १९४७ के बाद से लेकर २६ जनवरी १९५० तक भी भारत का
शासनिक प्रमुख गवर्नर जनरल ही हुआ करता था जो ब्रिटिश क्राऊन के प्रति
वफादारी की शपथ लिया हुआ था न कि भारतीय जनता के प्रति । इस संविधान के
अनुसार राष्ट्रपति का पद सृजित-प्रस्थापित होने से पूर्व लार्ड माऊण्ट
बैटन पहला गवर्नर जनरल था , जबकि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी दूसरे । मालूम
हो कि ब्रिटिश सरकार के निर्देशानुसार तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय बावेल ने
बी०एन० राव नामक एक आई०सी०एस० अधिकारी को संविधान-सभा का परामर्शदाता
नियुक्त कर रखा था , जिसने ब्रिटिश योजना के तहत संविधान का प्रारूप
तैयार किया हुआ था । डा० अम्बेदकर ने उसी प्रारूप को थोडा-बहुत आगे-पीछे
खींच-खांच कर संविधान-सभा के समक्ष प्रस्तुत किया जिसने वाग्विलासपूर्ण
लल्लो-चप्पो के साथ उसे स्वीकार कर लिया ।
गौरतलब है कि उच्चतम न्यायलय की १३ जजों की संविधान
पीठ ने वर्ष १९७३ में ही “ केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य ” के मामले
में भारतीय संविधान के बारे में कह रखा है कि इस संविधान का स्त्रोत भारत
नहीं है और ऐसी परिस्थिति में हमारी विधायिका , कार्यपालिका व
न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्थाए भी स्वदेशी उपज नहीं हैं और न ही
भारत के लोग इन संवैधानिक संस्थाओ के स्रोत हैं । उपरोक्त वाद में उच्चतम
न्यायलय के न्यायाधीशों ने इस ताथाकथित भारतीय संविधान को ही इसके स्रोत
और इसकी वैधानिकता के बावत कठघरे में खडा करते हुए निम्नलिखित बातें कही
हैं, जो न्यायालय के दस्तावेजों में आज भी सुरक्षित हैं-

१- भारतीय संविधान स्वदेशी उपज नहीं है । – जस्टिस पोलेकर

२- भले ही हमें बुरा लगे , परन्तु वस्तु-स्थिति यही है कि संविधान सभा को
संविधान लिखने का अधिकार भारत के लोगो ने नहीं दिया था, बल्कि ब्रिटिश
संसद ने दिया था । संविधान सभा के सदस्य न तो समस्त भारत के लोगों का
प्रतिनिधित्व करते थे और न ही भारत के लोगो ने उनको यह अधिकार दिया था कि
वे भारत के लिए संविधान लिखें । – जस्टिस बेग

३- यह सर्वविदित है कि संविधान की प्रस्तावना में किया गया वादा ऐतिहासिक
सत्य नहीं है . अधिक से अधिक सिर्फ यह कहा जा सकता है कि संविधान लिखने
वाले संविधान सभा के सदस्यों को मात्र २८.५ % लोगो ने अपने परोक्षीय
मतदान से चुना था और ऐसा कौन है , जो उन्ही २८.५% लोगों को ही ‘भारत के
लोग’ मान लेगा ? – जस्टिस मैथ्यू

४- संविधान को लिखने में भारत के लोगो की न तो कोई भूमिका थी और न ही कोई
योगदान । – जस्टिस जगमोहन रेड्डी
भारत की माटी संस्कृति रीति परम्परा व भारतीय जीवन-दृष्टि से
सर्वथा दूर ऐसे अभारतीय संविधान को अंगीकार कर इसे समूचे देश पर थोप देने
के कुकृत्य का दोषारोपण भावी पीढियां नेहरू और उनके सिपहसालारों पर न कर
पाये इस कुटिल नीति के तहत उनने यह प्रचारित कर-करा दिया कि यह गर्हित
काम अम्बेदकर ने किया है । अन्यथा कोई कारण नहीं दिखता कि देश के हर
अच्छे काम का श्रेय स्वयं ले लेने में सिद्धस्त नेहरू ने संविधान बनाने
का सेहरा आखिर अम्बेदकर के माथे क्यों बांध दिया ? जाहिर है जिस तरह से
हर घृणित काम को पहले अपने समाज के सवर्ण लोग दलितों से जबरन भी कराया
करते थे उसी तरह से कांग्रेस के सवर्ण-नेताओं ने ऐसा अभारतीय संविधान
बनाने के अपने पाप का ठिकरा भी अपनी उसी प्रवृति के अनुसार अम्बेदकर माथे
फोड दिया , जो सरासर अन्यायपूर्ण है । ‘करे कोई और भरे कोई’ की तर्ज पर
अम्बेदकर तो बलि का बकरा बना दिए गए ।
अम्बेदकर अपने साथ हुए इस अन्याय और कांग्रेसियों की चाल को
समझ गए थे तभी तो उन्होंने ०२ सितम्बर १९५३ को तत्कालीन गृहमंत्री
कैलाशनाथ काट्जु द्वारा यह कहने पर कि आपने ही इस संविधान का प्रारूप
तैयार किया है , भरी संसद में उत्तेजित होते हुए कहा- “अध्यक्ष महोदय !
मेरे मित्र कहते हैं कि मैंने अर्थात अम्बेदकर ने यह संविधान बनाया ,
किन्तु मैं यह कहने को बिल्कुल तैयर हूं कि इसे जलाने वालों में मैं पहला
व्यक्ति होउंगा, क्योंकि मैं इसे बिल्कुल नहीं चाहता , यह किसी के हित
में नहीं है ”। विपक्षी सदस्यों द्वारा पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते
हुए बाबा साहब ने यह भी कहा था कि “ उस समय मैं भाडे का टट्टू था , मुझे
जो कुछ करने को कहा गया , वह मैंने अपनी इच्छा के विरूद्ध जाकर किया ” ।

2 Responses to “नेहरू-कांग्रेस के पाप का ठिकरा अम्बेदकर के मत्थे फोडे जाने की त्रासदी”

  1. Binay Yadav

    आंबेडकर ने भारत को एक राष्ट्र बनाने में बहुत बड़ी भूमिका खेली है. सभी नागरिको के बीच सदभाव, समानता और स्वतन्त्रता एक राष्ट्र के लिए निहायत अनिवार्य तत्व है. कांग्रेस सिर्फ द्वंद पैदा कर रहे है. द्वंद के समाधान में ही सब का हित है.

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  2. Anil Gupta

    अब समय आ गया है की भारत का एक नया संविधान रचा जाये जिसका निर्माण प्रत्यक्ष जनमत द्वारा चुनी हुई संविधान सभा द्वारा किया जाये!

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