श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ के ब्रह्मा थे श्री ओंकार भावे….

विनोद बंसल

      29 अगस्त, 1964 को मुंबई के संदीपनि आश्रम में जन्मी विश्व हिंदू परिषद ने अपने जन्म के 20वे वर्ष में ही एक ऐसा संकल्प लिया जिसने भारत ही नहीं विश्व मानस पटल पर एक अमित छाप छोड़ी. श्री राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए हुए शांतिपूर्ण आंदोलनों की विविध कड़ियों में लगभग 16 करोड़ से अधिक लोगों की भागीदारी ने सम्पूर्ण हिन्दू समाज को एक सूत्र में पिरो कर भारत के स्वाभिमान की पुन: प्रतिष्ठा की. इस 35 वर्ष की लम्बी यात्रा में अनेक पड़ाव आए. यूं तो इस आन्दोलन का श्री गणेश मार्च 1983 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर में हुए हिन्दू सम्मेलन ने ही कर दिया था जिसमें अयोध्या के साथ मथुरा व काशी की मुक्ति की भी मांग की गई. किन्तु इसकी विधिवत घोषणा अप्रेल 1984 में 575 पूज्य धर्माचार्यों की उपस्थिति में दिल्ली के विज्ञान भवन में हुई. इस प्रथम धर्म संसद के अधिवेशन में पहली बार श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के गठन की घोषणा हुई. इसमें गोरक्ष पीठाधिपति पूज्य महंत अवैद्यनाथ जी महाराज को अध्यक्ष, श्री दाऊ दयाल खन्ना को महामंत्री तथा श्री ओंकार भावे को सर्व सम्मति से मंत्री चुना गया. धर्म संसद में अयोध्या, मथुरा और काशी के तीनों धर्मस्थलों को हिंदुओं को सौंपने का प्रस्ताव भी पारित किया था। इसे श्री ओंकार भावे ने ही धर्मसंसद में रखा था। श्री राम जन्मभूमि पर लगे ताले को खुलवाने हेतु जन-जागरण का निर्णय हुआ. चाहे सितम्बर’84 में सीतामणी (बिहार) से श्री राम जानकी रथ यात्रा की बात हो या 7 अक्टूबर’84 को अयोध्या के सरयू तट की संकल्प सभा(जिसमें 20,000 से अधिक संत व अन्य राम भक्त थे), सभी कार्यक्रमों में भावे जी की सक्रियता मानो आन्दोलन को नई ऊंचाई की ओर ले जा रही थी. 

      उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में 26 जुलाई 1924 को जन्मे श्री भावे सन् 1945 में संघ के प्रचारक बनने के बाद अनेक दायित्वों का निर्वहन करते हुए सन् 1995 में विहिप के संयुक्त महामंत्री तथा 2009 में अंतर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने। संगठन के शीर्ष स्तर पर चाहे वे बाद में पहुंचे हों किन्तु श्री राम जन्मभूमि की मुक्ति हेतु वे पहले दिन से सामिल थे. आन्दोलन के विविध चरणों में उनकी भूमिका सदैव अग्रणी रही.

      बात 2002 की है जब गोधरा में 59 कार सेवकों को ज़िंदा जला दिया गया. परिणाम स्वरूप जब शेष गुजरात उबाल पर था, उस समय राज्य में सेना को तैनात कर दिया था और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दिल्ली में हिंदू और मुस्लिम नेताओं से मुलाक़ात कर धैर्य बनाए रखने और स्थिति पर क़ाबू पाने की अपील की थी. सरकार की सहयोगी पार्टियों के नेताओं की ओर से विश्व हिंदू परिषद की गतिविधियों पर रोक लगाने हेतु दबाव बढाया जा रहा था. ऐसे समय में विहिप के तत्कालीन संयुक्त महासचिव श्री ओंकार भावे ही थे जिन्होंने तत्कालीन केंद्र सरकार पर अयोध्या मुद्दे की ”अनदेखी” करने का आरोप लगाते हुए द्रणता से कहा था कि विहिप की मंदिर निर्माण समिति की बैठक 14 मार्च को ही रहेगी जिसमें आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा. ”मंदिर का निर्माण तय कार्यक्रम के अनुसार ही किया जाएगा और कोई भी शक्ति इसे नहीं रोक सकती.” 1984 से लेकर अंतिम समय तक वे श्री राम जन्मभूमि आन्दोलन से प्राण-पण से जुड़े रहे तथा अनेक विषम परिस्थितियों में भी समाज का नेतृत्व करते रहे. मुझे व्यक्तिगत रूप से अनेक बार उनका मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ. यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वे सच्चे मायने में श्रीराम जन्मभूमि नामक पवित्र यज्ञ के ब्रह्मा थे जिनके निर्देशन में इतना बड़ा आन्दोलन लड़ा गया जो, चाहे उनके ब्रह्मलोक गमन के बाद ही सही, किन्तु अंततोगत्वा अपने अंतिम लक्ष्य तक पहुंचा.  

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