श्री राम जन्मभूमि के लिए राजमाता विजया राजे सिंधिया का समर्पण …

-विनोद बंसल  

      जब-जब श्री राम जन्मभूमि आन्दोलन की बात होगी ग्वालियर राज घराने की राजमाता विजया राजे सिंधिया का नाम स्मरण होगा ही. वे एक ऐसा महान व्यक्तित्व थीं जो राजमाता होते हुए भी भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व राजनीति क्षितिज पर सदैव एक दैदीप्तिमान सूर्य की तरह छाई रहीं. 1989 में भारतीय जनता पार्टी के पालमपुर में हुए राष्ट्रीय कार्यकारिणी के अधिवेशन में भगवान श्री राम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर के लिए प्रस्ताव लाने वाली राजमाता विजयाराजे सिंधिया ही थीं. छह दिसंबर 1992 की कारसेवा के दौरान भी अयोध्या में वे अहम भूमिका में रहीं और एक प्रमुख नेत्री की तरह आंदोलन का नेतृत्व किया। अयोध्या के रामकथा कुंज के मंच से उन्होंने भी कारसेवकों को सम्बोधित किया था। अन्य नेताओं की तरह उन्हें भी बाबरी विध्वंस मामले का आरोपी बनाया गया था। यही नहीं, श्री राम जन्मभूमि आंदोलन की बदौलत राष्ट्रीय राजनीति में सितारा बनकर चमकी साध्वी उमा भारती व ज्ञान, आध्यात्म व वात्सल्य की देवी दीदी माँ ऋतंभरा के यहाँ तक पहुँचाने के पीछे भी राजमाता सिंधिया का भी बड़ा आशीर्वाद माना जाता है।

      सागर के राणा परिवार में सन् 1919 में जन्मी राजमाता विजयाराजे सिंधिया सरलता, सहजता और संवेदनशीलता की त्रिवेणी थीं। इंदिरा सरकार के आपात काल में वे जेल गईं. उसके बाद वे धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद से जुड़ती चली गईं। इसके उपरांत तो उन्होंने तन-मन-धन से श्री राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए हुए हर आन्दोलन में बड़ी भूमिका निभाई. आडवाणी जी की रथ-यात्रा में तो राजमाता की भूमिका वास्तव में एक सारथी की तरह थी. राजमाता श्रीमती विजया राजे सिंधिया का हिन्दू समाज व श्री राम जन्मभूमि के प्रति समर्पण ना सिर्फ अनुकरणीय है वल्कि युगों युगों तक हम सभी भारतीयों के लिए प्रेरणा देता रहेगा।

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