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    सिकुड़ता आतंकवाद

    आतंकवाद पूरी दुनिया के लिए एक विकराल समस्या है। आतंकवाद का स्वरूप चाहे बाहरी रूप में हो या फिर आंतरिक, हर दृष्टि से समाज की जड़ों को खोखला करने का काम करता है। जो देश पहले आतंकवाद से अछूते थे वे इसकी भयावहता को नहीं समझते थे किंतु जैसे-जैसे दुनिया के तमाम देशों ने आतंकवाद का स्वाद चखा, इसके विरुद्ध खड़े होने लगे। भारत तो एक लंबे अरसे से आतंकवाद का शिकार रहा है, किंतु भारत जब दुनिया के सामने आतंकवाद की चर्चा करता था तो तमाम देश उसकी बात अनसुनी कर देते थे या फिर दबाने का प्रयास करते थे किंतु अब ऐसी स्थिति नहीं है। आतंकवाद के खिलाफ पूरी दुनिया में माहौल बना है। दुनिया के अधिकांश देशों ने आतंकवाद की भयावहता को देखते हुए इसकी निंदा करनी एवं इसके खिलाफ कदम उठाना शुरू कर दिया है।
    भारत के लिए यह निहायत ही सौभाग्य की बात है कि जब से प्रधानमंत्राी मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी है, तब से सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ पूरे विश्व में एक अभियान छेड़ दिया है। आज उसी का परिणाम है कि आतंकवाद का स्वरूप न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में सिकुड़ रहा है। एनडीए सरकार की उपलब्धियों पर यदि चर्चा की जाये तो मुझे लगता है कि आतंकवाद के खिलाफ देश एवं विदेश में प्रभावी आवाज उठना अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है।
    भारत सरकार के प्रयासों का ही नतीजा है कि आतंकवाद हर दृष्टि से दम तोड़ता नजर आ रहा है। प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालते ही आतंकवाद पर करारा प्रहार करना शुरू कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि आतंकवाद के लिए किसी भी रूप में कोई स्थान नहीं है। प्रधानमंत्राी बनने के बाद श्री नरेंद्र मोदी ने जितने भी देशों की यात्रा की है, सभी जगह आतंकवाद के मसले को गंभीरता से उठाया है। पूरी दुनिया ने उनकी बात को माना है।
    वर्तमान परिस्थितियों में यह कहा जा सकता है कि आतंकवाद का प्रसार जितना होना था, हो चुका, अब उसके बढ़ने की और संभावना नहीं है। जिस अमेरिका ने घोषणा की थी कि वह अफगानिस्तान से अपनी फौज जल्दी हटा लेगा अब उसने कह दिया है कि अफगानिस्तान से अभी अमेरिकी सेना नहीं हटेगी। अमेरिका ने घोषणा की है कि अफगानिस्तान में उसके 9800 सैनिक रहेंगे, किंतु 2016 के अंत में अमेरिकी सैनिकों की संख्या घटकर 5500 रह जायेगी। वैसे तो अमेरिका ने दुनिया भर में अपने सैनिकों की तैनाती कर रखी है।
    एक रिपोर्ट के अनुसार 150 देशों में अमेरिका के डेढ़ लाख से ज्यादा फौजी तैनात हैं। सबसे अधिक फौजी जापान और जर्मनी में हैं। विदेशों में अमेरिका के 800 सैनिक अड्डे भी हैं। हालांकि, विदेशों में सैनिकों की तैनाती की कुल संख्या का मिलना बेहद मुश्किल है। रिपोर्ट के आधार पर विदेशों में डेढ़ लाख अमेरिकी सैनिकों की जो संख्या बताई जा रही है, उसमें इराक, कुवैत और सीरिया में मौजूद सैनिकों की संख्या का जिक्र नहीं है। इसकी वजह मध्य पूर्व के देशों की संवेदनशील स्थितियां हैं।
    ‘रेंड कारपोरेशन’ के अनुसार जर्मनी और जापान जैसे देश काफी कुछ खर्च वहन करते हैं। फिर भी अमेरिकी करदाता को विदेश में अपने सैनिकों पर हर साल 10,000 से 40,000 डालर खर्च करने पड़ते हैं। ‘द नेशन’ वेबसाइट के आंकलन के अनुसार 2014 में अड्डांे और सैनिकों पर 85 अरब डालर का खर्चा आया था, अगर इसमें इराक और अफगानिस्तान में मौजूदगी को भी जोड़ लें तो यह खर्च 156 अरब डालर बैठेगा। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि अमेरिका ने पूरी दुनिया में अपने सैनिकों की तैनाती मात्रा आतंकवाद से लड़ने के लिए की है किंतु इतना तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि सैनिकों की तैनाती का मकसद शांति की स्थापना ही है। आतंकवाद इस समय पूरी दुनिया में शांति के लिए बहुत बड़ा खतरा है। इससे आसानी से समझा जा सकता है कि इन सैनिकों की तैनाती का असली मकसद क्या है?
    यूं तो कहा जाता है कि तमाम विकसित देश अपने हथियारों की बिक्री के लिण् अन्य देशों में लड़ाई-झगड़े एवं युद्ध जैसे हालात उत्पन्न करवाने के प्रयास में लगे रहते हैं किंतु अब उनकी भी समझ में आने लगा है है कि इससे कोई लाभ नहीं है क्योंकि आतंकवाद को बढ़ावा देना किसी भी हाल में किसी भी देश के लिए लाभकारी नहीं हो सकता है।
    कहा जाता है कि जिन देशों ने आतंकी गुटों को शह दी अब वे ही उसके लिए भस्मासुर बनने लगे। नतीजा यह हुआ कि इन देशों को भी आतंकी वारदातों से दो-चार होना पड़ा। उसके परिणामस्वरूप कुख्यात आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने पाकिस्तान में घुस कर मारा। पाकिस्तान के बारे में पूरी दुनिया में चर्चा है कि वह आतंकवाद की फैक्ट्री है। वहां से आतंकवादी तैयार कर पूरी दुनिया में सप्लाई किये जाते हैं किंतु वक्त की मार देखिये आज वही पाकिस्तान आतंकवाद की गिरफ्त में पूरी तरह से आ चुका है। वहां आये दिन आतंकी घटनायें घटित हो रही हैं। हालांकि, पाकिस्तान अपने यहां आतंक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई में लगा है। यह बात अलग है कि भारत के खिलाफ वह आज भी आतंकवाद के खिलाफ खड़ा नहीं है। उल्टे वह पाकिस्तान से समय-समय पर प्रशिक्षित आतंकी भेजता रहता है।
    बहरहाल, जो भी हो, पाकिस्तान आतंकवाद के मामले में पूरी दुनिया में बेनकाब होता जा रहा है। वैसे भी कभी-न-कभी तो पाकिस्तान को सुधरना ही पड़ेगा। पाकिस्तान पर एक कहावत निहायत ही चरितार्थ होती है कि ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय’।
    संयुक्त राष्ट्र संघ में भारतीय विदेश मंत्राी श्रीमती सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान के बारे में बेहद दृढ़तापूर्वक कहा कि वार्ता और आतंकवाद दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। आतंकवाद से पूरी दुनिया को कितनी हानि उठानी पड़ी है, यह एक लंबी बहस का मुद्दा है, किंतु इतना कहकर संतुष्ट हुआ जा सकता है कि देर आये, दुरुस्त आये।
    कहने का आशय यही है कि जो देश कभी आतंकवाद के खिलाफ बिल्कुल उदासीन एवं तटस्थ रहा करते थे आज वे विरोध में खड़े हैं। यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न करना ही एनडीए सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। किसी भी देश में यदि किसी भी प्रकार की अशांति उत्पन्न होती है या गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा होती है तो उससे भी आतंकवाद को बढ़ावा मिलता है। अराजक ताकतें अपने मकसद को अंजाम देने में लग जाती हैं।
    आतंकवाद की कमर टूटने के कारण ही ऐसे बहुत से युवक जो जाने-अंजाने में आतंकी बन चुके हैं, आतंक की दुनिया से अब वे निकलना चाहते हैं। ऐसे ही उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के एक परिवार ने अपने बेटे को आईएस के चंगुल से निकालने की गुहार सुरक्षा एजेंसियों से की है। सीरिया में रूस ने हमले कर आतंकियों की कमर तोड़नी शुरू कर दी है। रूस ने जिस तरह 1500 किलोमीटर की दूरी से मिसाइलें दाग कर क्रूर आतंकी संगठन आईएस के ठिकानों को तबाह किया है उससे आतंकियों में दहशत का माहौल है। आज पूरी दुनिया इस बात से भौचक है कि जो काम अमरीका जैसी महाशक्ति दो वर्षों में नहीं कर पाई वह रूस ने कर दिखाया। सीरिया में रूस की कार्रवाई का समर्थन अब चीन भी कर रहा है और सीरिया ने आईएस के खिलाफ कार्रवाई में रूस और चीन इकट्ठे दिखाई दे रहे हैं। यह चीन की नीति में बहुत बड़ा बदलाव है क्योंकि चीन हमेशा मध्य पूर्व में किसी भी अंतरर्राष्ट्रीय सैन्य अभियान का विरोध करता रहा है। रूस और चीन का मकसद भले ही अमेरिका को नीचे दिखाना हो किंतु दोनों देशों का आईएस जैसे खतरनाक आतंकी संगठन के खिलाफ खड़ा होना पूरी दुनिया के लिए शुभ संकेत है।
    रूस के ताबड़ तोड़ हवाई हमलों की वजह से इस्लामिक स्टेट के आतंकियों में दहशत का माहौल है। रूस की कार्रवाई से आईएस के आतंकवादी किसी भी कीमत पर अपनी जान बचाकर भागना चाहते हैं। आतंकवाद के खिलाफ इस प्रकार स्थिति उत्पन्न होना बहुत बड़ी बात है।
    वैसे तो भारत सीरिया में किसी भी तरह के बाहरी सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ है लेकिन आईएस को खत्म करने के लिए भारत सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद के साथ है। आतंकवाद के मामले में यदि भारत की बात की जाये तो यहां पाक प्रायोजित आतंकवाद है किंतु अब वह आतंकवाद से स्वयं जूझ रहा है।
    कश्मीर में अलगाववादी भावनाओं को भड़काने के लिए पाकिस्तान अभी भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है, लेकिन कश्मीर घाटी में लाखों लोग ऐसे हैं जो अलगाववादी नेताओं की रीति-नीति से सहमत नहीं हैं लेकिन अलगाववादी नेता ऐसा दिखाने का प्रयास करते हैं कि घाटी की अधिकांश जनता उनके विचारों से सहमत है। कुल मिलाकर कहने का आशय यही है कि पूरी दुनिया को यह समझ में आ गया है या आ रहा है कि आतंकवाद से कितना नुकसान है और उससे कितनी अशांति पैदा होती है? लोग यह भी समझ रहे हैं कि कौन आतंकवाद को शह दे रहा है? आतंकवाद का समर्थन कर कोई कितना भी अपने को छिपाने का प्रयास करे किंतु एक दिन उसे बेपर्दा होना ही पड़ेगा क्योंकि आतंकवाद के मुद्दे पर किसी भी देश को बहुत अधिक दिनों तक गुमराह नहीं किया जा सकता है।
    पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ एवं जिन देशों के समक्ष अपना दुखड़ा रोने जाता है वहीं उसे फटकार मिल रही है। अमेरिका बार-बार पाकिस्तान को आगाह कर रहा है कि वह आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करे। इस प्रकार का जो वातावरण बना हुआ है कोई एक-दो दिन में नहीं बना है।
    दरअसल, श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद सरकार ने आतंकवाद के मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दमदारी से अपनी बात रखी जिसे पूरी दुनिया ने गंभीरता से लिया। सउदी अरब यदि यमन पर हवाई हमले कर रहा है तो निश्चत रूप से कहा जा सकता है कि दुनिया उन तत्वों को समाप्त करना चाहती है, जिनके कारण अशांति एवं अराजकता पनपती है और आतंकवाद को बढ़ावा मिलता है।
    भारतीय गृहमंत्राी राजनाथ सिंह का रवैया आतंकवाद के मामले में एकदम स्पष्ट एवं सख्त है कि वे किसी भी कीमत पर अपने देश से आतंक की जड़ों को समाप्त करना चाहते हैं। वे जड़ें भारत को चाहे बाहरी रूप से नुकसान पहंुचा रही हों या फिर आंतरिक रूप से। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भारत सहित पूरी दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ जो वातावरण बना है, उससे आतंकवाद दम तोड़ता दिख रहा है। यह एनडीए सरकर एवं पूरे देश के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है किंतु इस पर अभी और आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

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    अरूण कुमार जैन
    अरूण कुमार जैन
    इंजीनियर लेखक राम-जन्मभूमि न्यास के ट्रस्टी हैं

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