दिवाली  13 अक्टूबर 2017  के  दिन हैं खरीदी का महामुहूर्त—-

इस वर्ष दिवाली 2017 पर खरीदी का सबसे बड़ा महामुहूर्त 13 अक्टूबर 2017 को है। इस दिन शुक्रवार होने से यह शुक्र पुष्य कहलाएगा। खरीदी के लिए लोगों को सुबह से शाम तक खूब समय मिलेगा। दीवाली से पहले आने वाला पुष्य सबसे खास माना जाता है। बाजार को भी काफी उम्मीद है। कारोबारियों की माने तो त्योहारी सीजन में मन तो खुश रहेगा ही बाजार पर धन भी बरसेगा। खरीदारी का महायोग होने से सर्वाधिक कारोबार सराफा में होने की उम्मीद है। वैसे भी सोने-चांदी की कीमतों में गिरावट आना कारोबार के लिए अच्छे संकेत है।

 

दीवाली या लोकप्रिय रूप से दीपावली के नाम से जाना जाने वाला भारत का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है। दीवाली दुनिया भर में रोशनी का प्रतीक, चमकदार प्रदर्शन, प्रार्थना और जश्न मनाये जाने वाला भारतीय त्यौहार है। दीपावली निश्चित तौर पर भारत में मनाया जाता है | पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यह सबसे बड़ा हिंदू त्यौहार है। दीपावली को दीप के रूप में आकार दिया जा सकता है जिसका मतलब है ‘प्रकाश’ और ‘वल’ जिसका मतलब है पंक्ति अर्थात रोशनी की एक पंक्ति। दीपावली का त्यौहार चार दिनों के समारोहों से चिह्नित होता है, जो अपनी प्रतिभा के साथ देश को रोशन करता है और हर किसी को अपनी खुशी के साथ चकाचैंध करता है।

 

चार दिवसीय उत्सव को विभिन्न परंपराओं से चिह्नित किया गया है, लेकिन जीवन का उत्सव, उत्साह, आनंद और भलाई स्थिर रहती है। दीवाली को इसके आध्यात्मिक महत्व के लिए मनाया जाता है, जो अंधेरे पर प्रकाश की विजय, बुराई पर अच्छाई, अज्ञानता पर ज्ञान और निराशा पर आशा का प्रतीक है। दीपावली हर भारतीय परिवार में मनाई जाती है। दीवाली का जश्न एक सप्ताह के लिए मनाया जाता है, जिसमें प्रत्येक दिन अलग-अलग त्यौहार होते हैं।

 

दिवाली इस बार 19 अक्टूबर 2017 को है, इससे पहले 13 अक्टूबर को पुष्य नक्षत्र आएगा। इस दिन शुक्रवार होने से यह शुक्र पुष्य कहलाएगा। दिवाली से पहले लोग बहुत सी खरीददारी करते हैं और बहुत से लोग शुभ मुहूर्त पर कोई खास चीज खरीदने में बहुत यकीन रखते हैं।धनतेरस और दिवाली के लिए लोग बाजार में पुष्य नक्षत्र के संयोग में ही सबसे अधिक खरीदारी करते हैं।

 

खरीदी के लिए लोगों को सुबह से रात तक खूब समय मिलेगा, क्योंकि 13 अक्टूबर को सुबह 7.45 बजे पुष्य नक्षत्र लग जाएगा जो कि अगले दिन 14 अक्टूबर को सुबह 6.34 बजे तक रहेगा।  365 दिन में 13 पुष्य नक्षत्र आते हैं। जिसमें से दीवाली के पहले आने वाला पुष्य सबसे विशेष माना जाता है। पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की सभी27 नक्षत्रों में पुष्य को नक्षत्रों का राजा कहा है, इसलिए खरीदी के लिए यह सबसे शुभ है।। इसमें की गई खरीदी समृद्धिकारक होती है। पुष्य नक्षत्र की धातु सोना है, इसे खरीदने के लाभ होता है। पुष्य में भूमि, भवन, वाहन व अन्य स्थाई संपत्ति में निवेश करने से प्रचुर लाभ की संभावना रहती है।
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जानिए दिवाली का ज्योतिष महत्व—
हिंदू धर्म में हर त्यौहार का ज्योतिष महत्व होता है। माना जाता है कि विभिन्न पर्व और त्यौहारों पर ग्रहों की दिशा और विशेष योग मानव समुदाय के लिए शुभ फलदायी होते हैं। हिंदू समाज में दिवाली का समय किसी भी कार्य के शुभारंभ और किसी वस्तु की खरीदी के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इस विचार के पीछे ज्योतिष महत्व है।पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार  दीपावली के आसपास सूर्य और चंद्रमा तुला राशि में स्वाति नक्षत्र में स्थित होते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य और चंद्रमा की यह स्थिति शुभ और उत्तम फल देने वाली होती है। तुला एक संतुलित भाव रखने वाली राशि है। यह राशि न्याय और अपक्षपात का प्रतिनिधित्व करती है। पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार तुला राशि के स्वामी शुक्र जो कि स्वयं सौहार्द, भाईचारे, आपसी सद्भाव और सम्मान के कारक हैं। इन गुणों की वजह से सूर्य और चंद्रमा दोनों का तुला राशि में स्थित होना एक सुखद व शुभ संयोग होता है।

 

दीपावली का आध्यात्मिक और सामाजिक दोनों रूप से विशेष महत्व है। हिंदू दर्शन शास्त्र में दिवाली को आध्यात्मिक अंधकार पर आंतरिक प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई का उत्सव कहा गया है।
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जानिए दीवाली क्यों मनाई जाती है?

 

दीवाली की शुरुआत को प्राचीन भारत से समझा जा सकता है। पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार दीवाली का इतिहास दिव्य चरित्रों से भरा हुआ है और ये पौराणिक कथाएं हिंदू धार्मिक ग्रंथों की कथानक, आमतौर पर पुराणों के लिए बाध्य हैं। यद्यपि, सभी कहानियां और इतिहास, बुराइयों पर अच्छाई की जीत के ही एक उत्कृष्ट सत्य की तरफ इशारा करता है। केवल प्रस्तुति के तरीके और पात्र हर कहानी के साथ अलग हैं। दीवाली को रोशनी का त्यौहार माना जाता है, शक्ति का दीपक, उच्च आत्माओं और हमारे भीतर ज्ञान को प्रकाश में रखते हुए इसका अर्थ है त्यौहार के पांच दिनों के प्रत्येक महत्वपूर्ण उद्देश्य पर व्याख्या और प्रतिबिंबित करना।
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इस साल दिवाली 19 अक्टूबर 2017 यानि गुरुवार को मनाई जाएगी। कार्तिक अमावस्या के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर सभी देवताओं की पूजा इस विधि से करनी चाहिए।

 

1.  देवी लक्ष्मी का पूजन प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त) में किया जाना चाहिए। प्रदोष काल के दौरान स्थिर लग्न में पूजन करना सर्वोत्तम माना गया है। इस दौरान जब वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ राशि लग्न में उदित हों तब माता लक्ष्मी का पूजन किया जाना चाहिए। क्योंकि ये चारों राशि स्थिर स्वभाव की होती हैं। मान्यता है कि अगर स्थिर लग्न के समय पूजा की जाये तो माता लक्ष्मी अंश रूप में घर में ठहर जाती है।
2.  महानिशीथ काल के दौरान भी पूजन का महत्व है लेकिन यह समय तांत्रिक, पंडित और साधकों के लिए ज्यादा उपयुक्त होता है। इस काल में मां काली की पूजा का विधान है। इसके अलावा वे लोग भी इस समय में पूजन कर सकते हैं, जो महानिशिथ काल के बारे में समझ रखते हों।
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दिवाली पर लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त (New Delhi, India ) के लिए—-
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त्त :19:13:36 से 20:19:22 तकअवधि :1 घंटे 5 मिनट
प्रदोष काल :17:48:02 से 20:19:22 तक
वृषभ काल :19:13:36 से 21:09:25 तक
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दिवाली महानिशीथ काल मुहूर्त
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त्त :23:41:08 से 24:31:34 तकअवधि :0 घंटे 50 मिनट
महानिशीथ काल :23:41:08 से 24:31:34 तक
सिंह काल :25:45:03 से 28:02:43 तक
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दिवाली शुभ चौघड़िया मुहूर्त
प्रातःकाल मुहूर्त्त (शुभ):06:24:02 से 07:49:32 तक
प्रातःकाल मुहूर्त्त (चल, लाभ, अमृत):10:40:32 से 14:57:02 तक
सायंकाल मुहूर्त्त (शुभ, अमृत, चल):16:22:32 से 20:57:12 तक

 

रात्रि मुहूर्त्त (लाभ):24:06:21 से 24:43:03 तक
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जानिए विशेष जानकारी/मुहूर्त दीपावली 2017  पर—
(सभी पूजन मुहूर्त उज्जैन , मध्यप्रदेश के अक्षांश-देशांतर पर दिए गए हैं)

 

प्रिय पाठकों/मित्रों, इस वर्ष का दीपोत्सव/दीवाली 19 अक्टूबर 2017 (गुरूवार) को मनाई जायेगा |इस दिन हस्त/चित्र नक्षत्र रहेगा |इस नक्षत्र का कारक ग्रह शुक्र होता हैं | इसके प्रभाव स्वरूप किसान और व्यापारी वर्ग को विशेष लाभकारी रहेगा | कृषक जगत की उन्नति होगी | महिलाओं और वुद्धिजीवी वर्ष का सम्मान बढ़ेगा |पीतल,तांबा,सोना,चांदी,लोहा और लकड़ी के भावों /कीमत में स्थिरता बनी रहेगी|

 

इस दीपावली पर सोना,पीतल और चांदी की खरीददारी शुभ–लाभकारी रहेगी |घर-परिवार में वैभव,शांति और समृद्धि बनी रहेगी |इस दीवाली आप लकड़ी और लोहा भूलकर भी नहीं खरीदें |

 

इस दीवाली पूजा के समय अपना मुख पूर्व दिशा में और माता लक्ष्मी का मुख पश्चिम दिशा में रखें |लक्ष्मी जी को पीतल, कांसे या चांदी की थाली में रखे और उन्हें लकड़ी की चौकी/पटिये/बाजोट  पर लाल ऊनी वस्त्र के आसान पर बिठाये |

 

फिर उसके बाद लक्ष्मी जी को केसर.कस्तूरी,गोरोचन एवं लाल चन्दन से तिलक करें |
दायीं तरफ पिताक के बर्तन/पत्र में देशी घी का दीपक चीनी/शक़्कर डालकर  जलाएं |
बायीं तरफ आंवले के तेल का दीपक मिटटी के पत्र/बर्तन में थोड़ा सा गुड़ डालकर जलाएं |
सामने की तरफ एक पीतल या चांदी की कटोरी में सुखें मेवे का भोग लगावें | इसके बाद विशेष रूप से तैयार/बनी हई माला ( 121 बादाम/किशमिश/चिरोंजी के से बनी) लक्ष्मी जी को पहनाएं | एवं अगले दिन यह प्रसाद रूपी माला सभी परिजनों को वितरित करें |
माता लक्ष्मी जी को घर पर बनी केशरयुक्त खीर और सूजी के हलवे का भोग लगाएं |
इसके साथ साथ बिना चुने वाला पान अर्पित करें, पिपरमेंट,गुलकंद और वर्क लगा हुआ |

 

विशेष लाभ हेतु — माता लक्ष्मी जी के समक्ष जलाएं गए दोनों दोपक को लगातार/निरंतर तीन दिनों तक अखंड जलाएं रखें और अपने घर को सुना ना छोड़े तथा ताला लगाकर/घर को बंद करके ना जाएँ |
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जानिए लक्ष्मी आगमन का समय–

 

सिंह  लग्न में माता लक्ष्मी का आगमन/प्राकट्य शुभ होता हैं | अतः 19 अक्टूबर 2017  को रात्रि में 01  बजकर 54  मिनट से 04  बजकर 11  मिनट तक  का समय “श्री लक्ष्मी” आगमन का रहेगा| अतः जो जागता हैं वो ही पता हैं | इस दीवाली रात्रि में जागरण करें और घी का दीपक जलाकर श्री सूक्त का पाठ करें | (सभी पूजन मुहूर्त उज्जैन , मध्यप्रदेश के अक्षांश-देशांतर पर दिए गए हैं)
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जानिए दीवाली और लक्ष्मी माँ के पूजन का शुभ मुहूर्त–(सभी पूजन मुहूर्त उज्जैन , मध्यप्रदेश के अक्षांश-देशांतर पर दिए गए हैं)

 

इस वर्ष 19  अक्टूबर 2017 (गुरूवार)को रात्रि 12  बजकर 38 मिनट तक कार्तिक कृष्ण पक्षीय अमावस्या रहेगी | इस दिन माता लक्ष्य,भगवान् गणेश और इंद्रा-कुबेर आदि देवताओं का पूजन तथा महाशित काल में महाकाली का मन्त्र विधान से पूजन परम सिद्धि दायक होता हैं |
लक्ष्मी पूजन प्रदोष युक्त अमावस्या में स्थिर लग्न एवं स्थिर नवांश में किया जाना सर्वश्रेष्ठ रहता हैं |अतः सूर्यास्त के समय/शाम को 07  बजकर 22  मिनट से रात्रि 09  बजकर 18  मिनट तक स्थिर लग्न और स्थिर नवांश 02  बजकर 52  मिनट से 04  बजकर 18  मिनट तक कुम्भ तथा मध्यरात्रि 01  बजकर 53  मिनट से 04  बजकर 11  मिनट तक सिंह लग्न नवांश पूजन हेतु उत्तम समय रहेगा |
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जानिए विशेष पूजन मुहूर्त–(सभी पूजन मुहूर्त उज्जैन , मध्यप्रदेश के अक्षांश-देशांतर पर दिए गए हैं)
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जानिए प्रदोष काल मुहूर्त –सायंकाल 05  बजकर 08  मिनट से रात्रि /सायंकाल 07  बजकर 32  मिनट तक रहेगा|
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जानिए स्थिर लग्न मुहूर्त–(सभी पूजन मुहूर्त उज्जैन , मध्यप्रदेश के अक्षांश-देशांतर पर दिए गए हैं)—–

 

वृषभ लग्न–सायंकाल 07  बजकर22  मिनट से रात्रि /सायंकाल 09  बजकर 18  मिनट तक रहेगा |
सिंह लग्न–रात्रि 01 बजकर 52  मिनट से रात्रि 04 बजकर 08  मिनट तक रहेगा |
कुम्भ लग्न–दोपहर  02  बजकर 49  मिनट से दोपहर 04  बजकर 18  मिनट तक रहेगा |
वृश्चिक लग्न– सुबह/प्रातःकाल 08 बजकर 42  मिनट से सुबह/प्रातःकाल 11 बजकर 02 मिनट तक रहेगा |
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जानिए चौघड़िया मुहूर्त–(सभी पूजन मुहूर्त उज्जैन , मध्यप्रदेश के अक्षांश-देशांतर पर दिए गए हैं)—

 

शुभ का चघड़िया–सायंकाल 16 बजकर 29  मिनट से रात्रि /सायंकाल 17  बजकर 54  मिनट तक रहेगा |
अमृत का चौघड़िया–सायंकाल 17 बजकर 54  मिनट से रात्रि /सायंकाल 19  बजकर 29  मिनट तक रहेगा |
चर का चौघड़िया– सायंकाल 19 बजकर 29  मिनट से रात्रि /सायंकाल 21 बजकर 03 मिनट तक रहेगा |
लाभ का चौघड़िया– अर्ध रात्रि  24 बजकर 12  मिनट से अर्ध रात्रि  25  बजकर 44  मिनट तक रहेगा |
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जानिए दिवाली पर लक्ष्मी पूजा की विधि—
दिवाली पर लक्ष्मी पूजा का विशेष विधान है। इस दिन संध्या और रात्रि के समय शुभ मुहूर्त में मां लक्ष्मी, विघ्नहर्ता भगवान गणेश और माता सरस्वती की पूजा और आराधना की जाती है। पुराणों के अनुसार कार्तिक अमावस्या की अंधेरी रात में महालक्ष्मी स्वयं भूलोक पर आती हैं और हर घर में विचरण करती हैं। इस दौरान जो घर हर प्रकार से स्वच्छ और प्रकाशवान हो, वहां वे अंश रूप में ठहर जाती हैं इसलिए दिवाली पर साफ-सफाई करके विधि विधान से पूजन करने से माता महालक्ष्मी की विशेष कृपा होती है। लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ कुबेर पूजा भी की जाती है। पूजन के दौरान इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

 

1.  दिवाली के दिन लक्ष्मी पूजन से पहले घर की साफ-सफाई करें और पूरे घर में वातावरण की शुद्धि और पवित्रता के लिए गंगाजल का छिड़काव करें। साथ ही घर के द्वार पर रंगोली और दीयों की एक शृंखला बनाएं।
2.  पूजा स्थल पर एक चौकी रखें और लाल कपड़ा बिछाकर उस पर लक्ष्मी जी और गणेश जी की मूर्ति रखें या दीवार पर लक्ष्मी जी का चित्र लगाएं। चौकी के पास जल से भरा एक कलश रखें।
3.  माता लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्ति पर तिलक लगाएं और दीपक जलाकर जल, मौली, चावल, फल, गुड़, हल्दी, अबीर-गुलाल आदि अर्पित करें और माता महालक्ष्मी की स्तुति करें।
4.  इसके साथ देवी सरस्वती, मां काली, भगवान विष्णु और कुबेर देव की भी विधि विधान से पूजा करें।
5.  महालक्ष्मी पूजन पूरे परिवार को एकत्रित होकर करना चाहिए।
6.  महालक्ष्मी पूजन के बाद तिजोरी, बहीखाते और व्यापारिक उपकरण की पूजा करें।
7.  पूजन के बाद श्रद्धा अनुसार ज़रुरतमंद लोगों को मिठाई और दक्षिणा दें।
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जानिए दिवाली पर क्या करें?
1.  कार्तिक अमावस्या यानि दीपावली के दिन प्रात:काल शरीर पर तेल की मालिश के बाद स्नान करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से धन की हानि नहीं होती है।
2.  दिवाली के दिन वृद्धजन और बच्चों को छोड़कर् अन्य व्यक्तियों को भोजन नहीं करना चाहिए। शाम को महालक्ष्मी पूजन के बाद ही भोजन ग्रहण करें।
3.  दीपावली पर पूर्वजों का पूजन करें और धूप व भोग अर्पित करें। प्रदोष काल के समय हाथ में उल्का धारण कर पितरों को मार्ग दिखाएं। यहां उल्का से तात्पर्य है कि दीपक जलाकर या अन्य माध्यम से अग्नि की रोशनी में पितरों को मार्ग दिखायें। ऐसा करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
4.  दिवाली से पहले मध्य रात्रि को स्त्री-पुरुषों को गीत, भजन और घर में उत्सव मनाना चाहिए। कहा जाता है कि ऐसा करने से घर में व्याप्त दरिद्रता दूर होती है।
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रहेगी खरीदी शुभ, शुक्र पुष्य ( 13 अक्टूबर 2017 को, शुक्रवार के दिन) में सभी सामानों की —

 

शुक्र पुष्य नक्षत्र के संयोग में दीवाली पर वैसे तो हर चीज की खरीदी शुभ होगी लेकिन 13 अक्टूबर 2017 को, (शुक्रवार के दिन)  होने से यह सौंदर्य एवं सजावट की चीजों की खरीदारी के लिए खास माना जा रहा है। नौ ग्रहों में शुक्र को सौंदर्य से जोड़कर देखा जाता है। इसमें घर, दुकान की सजावट के लिए जैसे डायनिंग टेबल, डबल बेड पलंग, ड्रेसिंग टेबल, चद्दर, परदे, आर्टिफिशियल एवं सोने-चांदी की ज्वैलरी, बर्तन व नए कपड़े आदि की खरीदी की जा सकती है। पुष्य नक्षत्र में लोग इलेक्ट्रॉनिक आइटम व नए वाहन भी खरीद सकते हैं।
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बाजार में है उत्साह का माहौल—

 

सभी बिजनेस में की नजर अब करवा चौथ और दीपावली उत्सव एवं पुष्य नक्षत्र पर सबकी नजरें हैं। इन त्योहारों के लिए व्यापारियों ने तैयारी शुरु कर दीहै। नया स्टॉक मंगाने के लिए अभी से बुकिंग शुरु हो गई है। ग्राहक भी नई चीजों के इंतजार में है। लोगों ने शुभ दिनों के साथ ही शादी के लिए भी खरीदारी शुरू कर दी है। अब सराफा संस्थानों में उपभोक्ताओं की चहल पहल बढ़ती जा रही है। अब निश्चित रूप से पुष्य पर कारोबार में जबरदस्त तेजी आने की उम्मीद है।

 

नोटबंदी और जीएसटी आने के बाद बाजार में नवरात्र दौरान काफी दिनों बाद रौनक रही। उत्सव के दौरान विभिन्न शोरूम में काफी व्यापार हुआ। दशहरा पर भी इसी तरह का उत्साह रहा, लोगों ने उत्साह के साथ खरीदारी करी। इस रविवार को करवा चौथ है, उसके बाद दीवाली पर अच्छे कारोबार की उम्मीद है, क्योंकि अभी से ही मुख्य बाजारों में भीड़ नजर आ रही है।
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जानिए भारत में सभी प्रमुख धर्मो में दिवाली/दीपाली मनाये जाने के कारण (दिवाली की पौराणिक कथा) —

 

रामायण

 

दीवाली की उत्पत्ति के कई कारण हैं जो मानते हैं और विश्वास करते हैं। दीवाली मनाने के पीछे सबसे प्रसिद्ध कारण महान हिंदू महाकाव्य में रामायण है। रामायण के अनुसार, अयोध्या के राजकुमार राम को अपने देश से चैदह वर्ष तक चले जाने के लिए और अपने पिता, राजा दशरथ द्वारा जंगल में रहने के लिए नियत किया गया था। इसलिए, राम अपनी पत्नी ‘सीता’ और वफादार भाई ‘लक्ष्मण’ के साथ वनवास में चले गये थे।

 

जब राक्षस रावण ने सीता का अपहरण कर लिया और उसे अपने राज्य में ले गया, राम ने उसके खिलाफ युद्ध लड़ा और रावण को मार डाला। ऐसा कहा जाता है कि राम ने सीता को बचाया और चैदह वर्ष बाद अयोध्या लौट आये। उनकी वापसी पर, अयोध्या के लोग अपने प्रिय राजकुमार को फिर से देखने के लिए बहुत खुश थे। अयोध्या में राम की वापसी का जश्न मनाने के लिए, घरों को (छोटे-छोटे लैंप) रोशन किया गया, पटाखे फोड़े गए और अयोध्या शहर को अत्यधिक सजाया गया। इस दिन को दीवाली परंपरा की शुरूआत माना जाता है। हर साल, भगवान राम के घर वापसी के त्यौहार दीवाली को रोशनी, पटाखे, आतिशबाजी और उच्च भावनाओं के साथ मनाया जाता है।

 

महाभारत—-

 

दीवाली के त्यौहार से संबंधित एक और प्रसिद्ध कहानी हिंदू महाकाव्य, महाभारत में वर्णित है। यह हिंदू महाकाव्य हमें बताता है कि कैसे पांच शाही भाई, पांडवों ने अपने अन्य भाई कौरवों से जुऐ के खेल में हार का सामना किया। नियमों के अनुसार, पांडवों को 13 साल के वनवास में चले जाने के लिए कहा गया था। तेरह वर्षों से वनवास के बाद, वे अपने जन्मस्थान ‘हस्तिनापुर’ में कार्तिक अमावस्या (इसे कार्तिक महीने के नए चन्द्र दिवस के रूप में जाना जाता है) के दिन वापस आ गये। पांचों पांडव, उनकी मां और उनकी पत्नी द्रौपदी बहुत दयालु, भरोसेमंद, कोमल और अपने तरीके से देखभाल करने वाले थे। हस्तिनापुर में लौटने के इस हर्षित अवसर को मनाने के लिए, आम नागरिकों द्वारा सभी स्थानों पर दीये जलाकर राज्य को रोशन किया गया। माना जाता है कि इस परंपरा को दीवाली के माध्यम से जीवित रखा गया है, जैसा कि कई लोगों द्वारा माना जाता है और पांडवों के घर वापसी के रूप में याद किया जाता है।

 

जैन दीवाली—-

 

जैन समुदाय के लिए, दीवाली भगवान वर्धमान महावीर के ज्ञान के रूप में मनाया जाता है। वर्धमान महावीर जैन के चैथे और अंतिम तीर्थंकर और आधुनिक जैन धर्म के संस्थापक पिता हैं। भगवान महावीर का जन्म जैनियों के दीवाली के त्यौहार को मनाने के लिए एक और कारण है।

 

सिख दीवाली

 

दीवाली सिखों के लिए एक विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह दीवाली का दिन था जब तीसरे सिख गुरु अमर दास ने एक शुभ अवसर के रूप में रोशनी के त्यौहार को प्रस्तावित किया जब सभी सिख गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इकट्ठा होंगे। 1619 में, यह दीवाली का दिन था जब उनके छठे धार्मिक गुरू, गुरु हरगोविंद सिंह जी को ग्वालियर किले में मुगल सम्राट जहांगीर द्वारा रिहा किया गया था। उन्हें 52 हिंदू राजाओं के साथ कारावास से रिहा कर दिया गया था जिसका उन्होंने अनुरोध किया था। यह दीवाली का शुभ अवसर था, जब अमृतसर में स्वर्ण मंदिर की नींव का पत्थर 1577 में रखा गया था।
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महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्र—-

 

देवराज इन्द्र द्वारा रचित लक्ष्मी जी के इस महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्र का जो जातक सदा भक्ति युक्त होकर प्रतिदिन पाठ करता है। वह सारी सिद्धियों और राज्यवैभव को प्राप्त कर सकता है। जो प्रतिदिन एक समय पाठ करता है, उसके बडे-बडे पापों का नाश हो जाता है। जो दो समय पाठ करता है, वह धन-धान्य से सम्पन्न होता है। जो प्रतिदिन तीन काल तक पाठ करता है उसके सभी शत्रुओं का नाश होता है और उसके ऊपर कल्याणकारिणी वरदायिनी महालक्ष्मी सदा ही प्रसन्न होती हैं।

 

नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।

 

शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्षि्म नमोस्तु ते॥1॥

 

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि।

 

सर्वपापहरे देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते॥2॥

 

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि।

 

सर्वदु:खहरे देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते॥3॥

 

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्ति मुक्ति प्रदायिनि।

 

मन्त्रपूते सदा देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते॥4॥

 

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्ति महेश्वरि।

 

योगजे योगसम्भूते महालक्षि्म नमोस्तु ते॥5॥

 

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्ति महोदरे।

 

महापापहरे देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते॥6॥

 

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि।

 

परमेशि जगन्मातर्महालक्षि्म नमोस्तु ते॥7॥

 

श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते।

 

जगत्सि्थते जगन्मातर्महालक्षि्म नमोस्तु ते॥8॥

 

महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं य: पठेद्भक्ति मान्नर:।

 

सर्वसिद्धिमवापनेति राज्यं प्रापनेति सर्वदा॥9॥

 

एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्।

 

द्विकालं य: पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वित:॥10॥

 

त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम्।

 

महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा॥11॥

 

अर्थात श्री पीठ पर स्थित और देवताओं से पूजित होने वाली हे महामाएं। तुम्हें नमस्कार है। हाथ में शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने वाली हे महालक्षि्म! तुम्हें प्रणाम है॥1॥

 

गरुड पर आरूढ हो कोलासुर को भय देने वाली और समस्त पापों को हरने वाली हे भगवति महालक्षि्म! तुम्हें प्रणाम है॥2॥

 

सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, समस्त दुष्टों को भय देने वाली और सबके दु:खों को दूर करने वाली, हे देवि महालक्षि्म! तुम्हें नमस्कार है॥3॥

 

सिद्धि, बुद्धि, भोग और मोक्ष देने वाली हे मन्त्रपूत भगवति महालक्षि्म! तुम्हें सदा प्रणाम है॥4॥

 

हे देवि! हे आदि-अन्त-रहित आदिशक्ते ! हे महेश्वरि! हे योग से प्रकट हुई भगवति महालक्षि्म! तुम्हें नमस्कार है॥5॥

 

हे देवि! तुम स्थूल, सूक्ष्म एवं महारौद्ररूपिणी हो, महाशक्ति हो, महोदरा हो और बडे-बडे पापों का नाश करने वाली हो। हे देवि महालक्षि्म! तुम्हें नमस्कार है॥6॥

 

हे कमल के आसन पर विराजमान परब्रह्मस्वरूपिणी देवि! हे परमेश्वरि! हे जगदम्ब! हे महालक्षि्म! तुम्हें मेरा प्रणाम है॥7॥

 

हे देवि तुम श्वेत वस्त्र धारण करने वाली और नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषिता हो। सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त एवं अखिल लोक को जन्म देने वाली हो। हे महालक्षि्म! तुम्हें मेरा प्रणाम है॥8॥
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॥ महालक्ष्मी अष्टकम् ॥
॥ ॐ श्रीं हृीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः ॥
जब इन्द्रदेव ने अपना ऐश्वर्य, सम्मान खोया, तो उसे पुनः प्राप्ति हेतु उन्होंने सुख व ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी की उपासना की। महालक्ष्मी को प्रसन्न करने हेतु इन्द्रदेव ने लक्ष्मी की स्तुति की। इसी इन्द्र स्तुति द्वारा, उनको स्वर्ग एवं समस्त ऐश्वर्य पुनः प्राप्त हुए। इन्द्र स्तुति का पाठ शुक्रवार के दिवस विशेष प्रभावी माना गया है। वैभव, सुख, आनंद हेतु इस दिवस महालक्ष्मी की यथाविधि पूजा उपरांत इस स्तुति का पाठ करें। व्यावहारिक जीवन के दृष्टिकोण से लक्ष्मी स्तुति व्यापर में वृद्धि कर, घर परिवार में खुशहाली लाती है। संस्कृत भाषा का ज्ञान न होने पर इसके हिन्दी अर्थ का पाठ भी सुफल देता है…
इंद्र उवाच्नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥१॥
नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि ।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥२॥
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि ।
सर्वदु:खहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥३॥
सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्ति मुक्ति प्रदायिनि ।
मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥४॥
आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि ।
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥५॥
स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे ।
महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥६॥
पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।
परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥७॥
श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते ।
जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥८॥
महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं य: पठेद्भक्तिमान्नर: ।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥९॥
एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् ।
द्विकालं य: पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वित: ॥१०॥
त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् ।
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥११॥
॥ इतीन्द्रकृतम् महालक्ष्म्यष्टकम् सम्पूर्णम् ॥
अर्थ~
इन्द्र बोले, “श्रीपीठ पर स्थित व देवताओं से पूजित होने वाली, हे महामाये! तुम्हें नमस्कार है। हस्त में शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करने वाली, हे महालक्ष्मी! तुम्हें प्रणाम है ॥१॥
गरुड पर आरूढ हो कोलासुर को भय देने वाली एवं समस्त पापों को हरने वाली, हे भगवति महालक्ष्मी! तुम्हें प्रणाम है ॥२॥
सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, समस्त दुष्टों को भय देने वाली एवं सबके दु:खों को दूर करने वाली, हे देवि महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है ॥३॥
सिद्धि, बुद्धि, भोग एवं मोक्ष देने वाली, हे मन्त्रपूत भगवति महालक्ष्मी! तुम्हें सदा प्रणाम है ॥४॥
हे देवि! हे आदि-अन्त-रहित आदिशक्ति! हे महेश्वरि! हे योग से प्रकट हुई, भगवति महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है ॥५॥
तुम स्थूल सूक्ष्म एवं महारौद्ररूपिणी हो, महाशक्ति महोदरा हो एवं बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली हो। महालक्ष्मी तुम्हें नमस्कार है ॥६॥
हे कमल के आसन पर विराजमान, परब्रह्मस्वरूपिणी देवि! हे परमेश्वरि! हे जगदम्ब! हे महालक्ष्मी! तुम्हें मेरा प्रणाम है ॥७॥
हे देवि! तुम श्वेत वस्त्र धारण करने वाली एवं नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषिता हो। सम्पूर्ण जगत में व्याप्त एवं अखिल लोक को जन्म देने वाली हो। हे महालक्ष्मी! तुम्हें मेरा प्रणाम है ॥८॥
जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर इस महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्र का सदा पाठ करता है, वह समस्त सिद्धियों एवं राज्यवैभव को प्राप्त कर सकता है ॥९॥
जो प्रतिदिन एक समय पाठ करता है, उसके बड़े-बड़े पापों का नाश हो जाता है। जो प्रतिदिन दो समय पाठ करता है, वह धन-धान्य से सम्पन्न होता है ॥१०॥
जो प्रतिदिन तीन काल पाठ करता है, उसके महान शत्रुओं का नाश हो जाता है एवं उसके ऊपर कल्याणकारिणी वरदायिनी महालक्ष्मी सदा ही प्रसन्न होती हैं ॥११॥
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वैभव लक्ष्मी स्तुति—

 

श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते।
जगत्सि्थते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोस्तु ते॥
अर्थ: हे देवि तुम श्वेत वस्त्र धारण करने वाली और नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषित हो। सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त एवं अखिल लोक को जन्म देने वाली हो। हे महालक्ष्मी! तुम्हें मेरा प्रणाम है॥
महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं य: पठेद्भक्ति मान्नर:।
सर्वसिद्धिमवापनेति राज्यं प्रापनेति सर्वदा॥
अर्थ: जो मनुष्य भक्ति युक्त होकर इस महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्र का सदा पाठ करता है, वह सारी सिद्धियों और राज्यवैभव को प्राप्त कर सकता है
एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्।
द्विकालं य: पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वित:॥
अर्थ: जो प्रतिदिन एक समय पाठ करता है, उसके बड़े-बड़े पापों का नाश हो जाता है। जो दो समय पाठ करता है, वह धन-धान्य से सम्पन्न होता है॥
त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम्।
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा॥
अर्थ: जो प्रतिदिन तीन काल पाठ करता है उसके महान् शत्रुओं का नाश हो जाता है और उसके ऊपर कल्याणकारिणी वरदायिनी महालक्ष्मी सदा ही प्रसन्न होती हैं॥
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लक्ष्मी प्राप्ति के लिए गणेश स्तोत्र—

 

ॐ नमो विघ्नराजाय सर्वसौख्याप्रदयिने। द्रष्टारिष्टविनाशाय पराय परमात्मने ॥
लम्बोदरं महावीर्य नाग्यग्योपशोभितम। अर्ध्चन्द्रधरम देव विघ्न व्यूह विनाशनम॥
ॐ ह्रां, ह्रीं, ह्रूं ह्रे ह्रौं ह्रं : हेरम्बाय नमो नमः। सर्व्सिद्धिप्रदोसि त्वं सिद्धिबुद्धि प्रदो भव ॥
चिन्तितार्थ्प्रदस्तव हि, सततं मोदकप्रिय : । सिंदुरारून वस्त्रेस्च पूजितो वरदायकः ॥
इदं गणपति स्तोत्रं यः पठेद भक्तिमान नरः । तस्य देहं च गेहं च स्वयं लक्ष्मिर्ण मुंचति ॥

 

ऊपर गणेश लक्ष्मी स्तोत्र पाठ करे .. अवश्य ही लाभान्वित होंगें |
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लक्ष्मी प्राप्ति का अचूक स्तोत्र—कनकधारा स्तोत्र

 

जीवन में ‍आर्थिक तंगी को लेकर हम सभी बेहद परेशान रहते हैं। धन प्राप्ति के लिए हरसंभव श्रेष्ठ उपाय करना चाहते हैं। धन प्राप्ति और धन संचय के लिए कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से चमत्कारिक रूप से लाभ प्राप्त होता है। कनकधारा स्तोत्र की विशेषता यही है कि यह किसी भी प्रकार की विशेष माला, जाप, पूजन, विधि-विधान की मांग नहीं करता बल्कि सिर्फ दिन में एक बार इसको पढ़ना पर्याप्त है।

 

ऐसा कहा जाता है कि एक बार अद्वैत मत के जनक आदि शंकराचार्य भोजन की तलाश में इधर-उधर भटक रहे थे। एक महिला की नजर भिक्षा मांगते हुए उस बालक पर गई। उस महिला को बालक के प्रति अजीब सा खिंचाव महसूस हुआ। वह स्त्री बहुत निर्धन थी, उस बालक को कुछ भी अच्छा भोजन के लिए नहीं दे सकती, उस समय उसे अपने दुर्भाग्य पर बहुत क्रोध आ रहा था।

 

आदि शंकराचार्य ने उस स्त्री से कहा कि जो भी उनके पास हैं, भले ही बहुत कम, लेकिन वह पर्याप्त है। उस स्त्री ने एकादशी का व्रत रखा हुआ था और उसके पास एक बेर के अलावा व्रत खोलने के लिए और कुछ नहीं था। उसने वह बेर भी शंकराचार्य के पात्र में डाल दिया। शंकराचार्य जी को उस स्त्री की ऐसी दशा पर बड़ी दया आई और उन्होंने वही खड़े खड़े माता महालक्ष्मी की स्तुति की, जिससे माता इतनी प्रसन्न हुई कि उस स्त्री के घर में धन की वर्षा होने लगी। वही स्तुति, माता महालक्ष्मी का कनक धारा स्तोत्र कहा जाता है।

 

ऐसा कहा जाता है कि जो भी सच्चे मन और श्रद्धा से साथ नियमित तौर पर विशेषकर शुक्रवार के दिन कनकधारा स्तोत्र का जाप करता है, माता लक्ष्मी उसके जीवन से धन संबंधी परेशानियों को हर लेती हैं।

 

।। श्री कनकधारा स्तोत्रम् ।।

 

अङगं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङगाङगनेव मुकुलाभरणंतमालम्।
अङगीकृताखिलविभूतिरपाङगलीला माङगल्यदाऽस्तु मम मङगलदेवतायाः।। १।।

 

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः।। २।।

 

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक् षमानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धमिन्दीवरोदरसहो दरमिन्दिरायाः ।। ३।।

 

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दमनिमेषमनङगतन् त्रम्।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङगशयाङगनायाः।। ४।।

 

बाह्नन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः।। ५।।

 

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदङगनेव।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिर्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः।। ६।।

 

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान्माङगल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः।। ७।।

 

दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारामस्मिन्नकिंचनवि हङगशिशौ विषण्णे।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः।। ८।।

 

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्रदृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः।। ९।।

 

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै।। १०।।

 

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै।। ११।।

 

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै।। १२।।

 

सम्पत्काराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये।। १३।।

 

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः सेवकस्य सकलार्थसम्पदः।
संतनोति वचनाङगमानसैस्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।। १४।।

 

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।। १५।।

 

दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्टस्वर्वाहिनी विमलचारुजलप्लुताङगीम्।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेषलोकाधिनाथगृहिणीममृताब् धिपुत्रीम्।। १६।।

 

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरङिगतैरपाङगैः।
अवलोकय मामकिंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः।। १७।।

 

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः।। १८।।

 

स्वर्णधारा स्त्रोतं यच्छंकराचार्य विर्निमितम।
त्रिःसन्ध्यंयः पठेन्नित्यं स कुबेर समो भवेन्नरः।। १९।।

 

इति श्रीकनकधारा लक्ष्मीस्तोत्रम्

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