लेखक परिचय

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं. लेकिन वे सिर्फ पढ़ाई ही नहीं कर रहे बल्कि एक सक्रिय पत्रकार की तरह कई अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन भी कर रहे हैं. इतना ही नहीं पढ़ाई और लिखाई के साथ-साथ मीडिया में सार्थक हस्तक्षेप के लिए मीडिया स्कैन नामक मासिक का संपादन भी कर रहे हैं.

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हिमांशु शेखर

भारत में आम तौर पर यह देखा गया है अगर किसी पर धर्म और आध्यात्म का रंग काफी ज्यादा चढ़ जाए तो या तो वह यहां-वहां घूमकर प्रवचन करने लगता है या फिर कहीं एकांत में जैसे किसी पहाड़ आदि पर जाकर साधना में लीन हो जाता है. इस देश में ऐसे लोगों की संख्या बेहद कम रही है जिन्होंने धर्म और आध्यात्म को वैज्ञानिकता से जोड़कर इसे सामाजिक उत्थान का जरिया बनाया है. इन गिने-चुने लोगों में से ही एक अहम नाम है संत बलबीर सिंह सीचेवाल का. दिल्ली से तकरीबन 450 किलोमीटर की दूरी पर पंजाब के कपूरथला जिले के सीचेवाल गांव से जो काम उन्होंने 21 साल पहले शुरू किया था उसकी धमक पंजाब से होते हुए पूरे देश में और तो पूरी दुनिया में पहुंच रही है. कई देशों के लोग संत सीचेवाल के प्रयोगों को देखने आ रहे हैं तो कई देशों में उन्हें अपने प्रयोगों की कहानी बताने के लिए बुलाया जा चुका है. धर्म और आध्यात्म के जरिए पर्यावरण के लिए उन्होंने जो काम किया है उसकी वजह से लोग उन्हें आजकल पर्यावरण बाबा के नाम से बुलाते हैं.

सामाजिक क्षेत्र में बलबीर सिंह सीचेवाल का सफर 1991 में शुरू हुआ. उन दिनों वे जालंधर जिले के नकोदर के डीएवी कॉलेज से स्नात्तक कर रहे थे. उन्हीं दिनों वे संत अवतार सिंह के संपर्क में आए जिनकी संगत ने उन्हें ‘जीवन क्यों’ जैसे सवालों से जूझने को प्रेरित किया. बलबीर सिंह ने तय किया कि अब तो पूरा जीवन समाज के कल्याण में लगाना है. वे खुद कहते हैं कि मैंने अपने लिए बहुत बड़ा लक्ष्य तय किया कि धरती को ही स्वर्ग बनाना है. अब मुश्‍किल यह थी आखिर समाज के लिए काम की शुरुआत कहां से हो. सीचेवाल गांव में 2 फरवरी, 1962 को जन्मे बलबीर सिंह ने अपने स्कूल के दिनों में यह अनुभव किया था कि रास्ता नहीं होने की वजह से उनके गांव और आस-पड़ोस के गांवों को बुनियादी सुविधाएं मयस्सर नहीं हो पाती हैं. उन्होंने तय किया कि काम की शुरुआत रास्ते को ठीक करने से करनी है.

बलबीर सिंह ने काम की शुरुआत के लिए अपने गांव को इसलिए चुना क्योंकि वहां के सारे लोग बचपन से उन्हें जानते थे और वहां से काम शुरू करना उनके लिए अपेक्षाकृत आसान था. इसके बाद उन्होंने खुद ही फावड़ा उठाकर उबड़-खाबड़ रास्ते का समतल बनाने की शुरुआत की. देखते-देखते उनके साथ काम करने वाले लोगों की फौज बढ़ती गई. फिर बलबीर सिंह सीचेवाल की अगुवाई को उन रास्तों को मुक्त कराने का अभियान चला जिन पर रसूखदार लोग दशकों से कब्जा जमाए बैठे थे. संत सीचेवाल को कई तरह की धमकियां भी मिलीं लेकिन उन्हें इलाके के आम जन का समर्थन हासिल था. इस समर्थन के आगे रसूखदार लोगों की धमकियां टिक नहीं पाईं और देखते-देखते ही इलाके के गांव आपस में तो एक-दूसरे से ठीक ढंग से जुड़े ही साथ में शहरों से भी इनकी दूरी घट गई. ऐसा होने इलाके में उपजाए जाने वाले आलू, गाजर और खरबूज समय पर बाजार में पहुंचने लगे और किसानों की आमदनी बढ़ने लगी. बाजार मिलने से मांग बढ़ी और फिर उत्पादन भी. इससे इलाके में रोजगारों का भी सृजन हुआ. रास्ता ठीक होने से छात्रों के लिए स्कूल जाना आसान हो गया.

दस साल तक इस इलाके में रास्ता ठीक करने का काम करने से संत सीचेवाल का इलाके में ठीक-ठाक नाम हो गया था. बात 2000 की है. उस साल जालंधर में एक सभा हुई और उसमें काली बेई नदी की बदहाली पर कई लोगों ने चिंता जताई. इस नदी का सिख धर्म के लिए खास महत्व है. इसी नदी के तट पर सिखों के पहले गुरू नानक देव जी ने 14 साल 9 महीने और 13 दिन गुजारे थे और यहीं पर उन्होंने सिख धर्म के मूल मंत्र ‘एक ओंकार सतनाम’ का सृजन किया था. 160 किलोमीटर लंबी इस नदी के किनारों पर 50,000 एकड़ से अधिक जमीन पर खेती होती है. इसलिए नदी के सूखने से इसके आसपास के इलाके की खेती के लिए संकट पैदा हो गया था. यह संकट बड़ा इसलिए भी था क्योंकि इलाके के लोगों के लिए रोजगार का मुख्य जरिया खेती ही थी. जालंधर की उस सभा में जब सब लोग इन तथ्यों का उल्लेख कर चिंता जता रहे थे तो संत सीचेवाल ने कहा कि सिर्फ चिंता करने से कुछ नहीं होगा और अगर सब लोग चाहते हैं कि इस मरती हुई नदी को जिंदा करना है तो सुबह से ही काम पर लगते हैं.

सभा में मौजूद लोगों ने सोचा भी नहीं होगा कि यह बात कहने वाला बाबा सचमुच सुबह से ही काम पर लग जाएगा. लेकिन धुन के पक्के संत सीचेवाल अगली सुबह फावड़ा और ट्रैक्टर लेकर अपने सहयोगियों के साथ काली बेई के तट पर पहुंच गए और सफाई का काम शुरू कर दिया. सरकार जिस काम को असंभव घोषित कर चुकी थी उसे एक अंजाम तक पहुंचाना आसान काम नहीं था. लेकिन बलबीर सिंह सीचेवाल ने जब नदी में उतरकर खुद ही हाथसिंघ उखाड़ना और जमी गंदगी को फावड़े से हटाना शुरू किया तो उनका हाथ बंटाने वाले लोगों की संख्या हर दिन के साथ बढ़ती गई. उन्होंने नदी में औद्योगिक इकाइयों द्वारा डाली जा रही गंदगी का रास्ता रोक दिया. जब प्रशासन ने दखल दिया तो उन्होंने पंजाब सरकार के 1976 के उस कानून का हवाला दिया जिसके तहत नदी को प्रदूषित करने को अपराध घोषित किया गया है. औद्योगिक इकाइयों के साथ कई गांवों से नदी में आ रही गंदगी का रास्ता रोकने का काम भी उन्होंने किया. अब समस्या यह थी कि इस गंदे पानी का आखिर क्या किया जाए. इसके लिए उन्होंने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने का आह्वान किया. इसके बाद कई गांवों में ऐसे प्लांट लग गए और गंदे पानी को साफ करके उसका इस्तेमाल दोबारा खेती में होने लगा.

बलबीर सिंह सीचेवाल और उनके साथ काम करने वाले लोगों के अथक परिश्रम का नतीजा यह है कि यह नदी एक बार फिर से निर्मल हो गई है. फिर से यहां लोग धार्मिक मौकों पर डुबकी लगाने लगी है. जिस नदी में बच्चे हॉकी खेलने लगते थे उसमें अब पूरे साल पानी बहती है. नदी में जलचर वापस आ गए हैं. और तो और इस नदी का पानी इलाके के हैंडपंप के पानी से अधिक शुद्ध हो गया है. पानी की शुद्धता मापने की इकाई है टीडीएस. यह स्तर जितना कम होता है वह पानी उतना ही शुद्ध होता है. 19 दिसंबर, 2011 को इलाके के हैंडपंप के पानी का टीडीएस 201 था वहीं काली बेई के पानी का टीडीएस 114 था. नदी के दोबारा जिंदा होने से इलाके में तेजी से गिरता जलस्तर सुधरने लगा है. इस वजह से खेती में सुविधा हो गई है और उत्पादन भी बढ़ गया है. जो खेती सिंचाई सुविधाओं के अभाव में घाटे का काम बनती जा रही थी वही एक बार फिर मुनाफे के काम में तब्दील हो गई है. नदी के किनारों पर हरियाली तो बढ़ी ही है साथ में जलस्तर सुधरने से पूरे इलाके की हरियाली को भी जीवनदान मिला है.

काली बेई की तट पर ही उन्होंने एक ऐसा स्कूल बनाया है जिसमें इलाके के छात्रों को निशुल्क शिक्षा मिलती है. एक ऐसा संस्‍थान बनाया है जहां इलाके के बेरोजगार युवकों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वे रोजगार हासिल कर सके. इन दोनों संस्‍थानों का उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति रहे एपीजे अब्दुल कलाम ने 2004 में किया था. 2008 में दुनिया की चर्चित पत्रिका ‘टाइम’ ने पर्यावरण के लिए लड़ रहे नायकों में शुमार किया था. 2009 में जलवायु परिवर्तन पर कोपनहेगन में हुए दुनिया के सभी प्रमुख देशों के सम्मलेन को संबोधित करने के लिए बलबीर सिंह सीचेवाल को बुलाया गया था.

इतना करने के बावजूद बलबीर सिंह सीचेवाल का धरती को स्वर्ग बनाने का सपना अभी पूरा नहीं हुआ है. अब वे पंजाब की दूसरी नदियों के सफाई का काम अपने हाथ में ले रहे हैं. उन्होंने जालंधर से निकलने वाले काला संघिया ड्रेन को ठीक करने की मुहिम शुरू कर दी है. उन्होंने प्रशासन से कह दिया है कि जल्द से जल्द इसमें गिरने वाले औद्योगिक कचरे का रास्ता रोका जाए नहीं तो फिर वे खुद ऐसा करेंगे. उनका कहना है कि इस जहरीले पानी की वजह से आसपास के गांवों के हैंडपंप से जहरीला पानी निकल रहा है जिसे पीने से लोग बीमार हो रहे हैं. आगे यही ड्रेन सतलज में जाकर मिलती है और फिर वहां से राजस्‍था और मालवा में इसकी आपूर्ति पीने वाले पानी के तौर पर होती है जो कई बीमारियों की जड़ है.

पंजाब में हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में संत सीचेवाल ने कई उम्मीदवारों से यह लिखित आश्वासन लिया कि चुनाव जीतने के बाद वे पर्यावरण से संबंधित मुद्दों को तरजीह देंगे और परिणामकारी कदम उठाएंगे. उन्होंने मतदाताओं से भी यह अपील की कि वे उन्हीं उम्मीदवारों को वोट दें जो पर्यावरण के मुद्दे पर गंभीर हों और कुछ करने का वादा करें. बलबीर सिंह सीचेवाल कहते हैं कि गुरू ग्रंथ साहिब में गुरू नानक देव ने कहा है कि पवन गुरू, पानी पिता, माता धरत महत्‍त. इसका मतलब यह हुआ कि अगर समाज हवा को गुरू मानकर, पानी को पिता मानकर और धरती को माता मानकर अपना हर काम करे तो पर्यावरण और मानव जीवन से संबंधित सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा.

One Response to “बलबीर सिंह सीचेवालः जिन्होंने नदी को नई जिंदगी दी”

  1. datta Yadav

    बलबीर सिंह सीचेवालः AAP JAINSE BHARAT MATA KE SAPUT HAIN ESI KARAN MERE BHARAT MAHAN HAIN. AAUR EK AANNA JI MIL GAYE . SHAT SHAHA PRANAM !!!!!!

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