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    सिकन्दर

    शिबन कृष्ण रैणा

    रात के ग्यारह बजे और ऊपर से जाड़ों के दिन। मैं बड़े मज़े में रजाई ओढ़े निद्रा-देवी की शरण में चला गया था। अचानक मुझे लगा कि कोई मेरी रजाई खींचकर मुझे जगाने की चेष्टा कर रहा है। अब आप तो जानते ही हैं कि एक तो मीठी नींद और वह भी तीन किलो वजनी रजाई की गरमाहट में सिकी नींद, कितनी प्यारी, कितनी दिलकश और मजेदार होती है। मेरे मुँह से अनायास निकल पड़ा- ‘भई, क्या बात है ? यह कौन मेरी रजाई खींच रहा है ? बड़ी मीठी नींद आ रही है’ कहते-कहते मैंने जोर की जम्हाई ली- ’तुम लोग मेरी इस प्यारी रजाई के पीछे क्यों पड़े हो ? परसों भी इसे ले गए थे और आज भी ले जाना चाहते हो। देखो, मुझे बड़ी अच्छी नींद आ रही है, जाकर कोई दूसरी रजाई या कम्बल देख लो।’

    इस बीच कमरे की बत्ती जली और मैंने देखा कि मेरी श्रीमती जी सामने खड़ी है। उसके चेहरे से भय और बेचैनी के भाव साफ टपक रहे थे। श्रीमती जी का बदहवासी-भरा चेहरा देखकर मेरी नींद की सारी कैफियत जिसमें खूब मिश्री घुली हुई थी, उडऩ-छूं हो गई। मैंने छूटते ही पहला प्रश्न किया-

    ‘गोगी की माँ, बात क्या है? तुम इतनी नर्वस क्यों लग रही हो ? सब ठीक-ठीक तो है ना ?’

    ‘सब ठीक होता तो आपको जगाती ही क्यों भला?’

    ‘पर हुआ क्या है, कुछ बताओगी भी?’

    ‘अजी होना-जाना क्या है? आपके प्ररम मित्र मुंशीजी बाहर गेट पर खड़े हैं। साथ में कॉलोनी के दो-चार जने और हैं। घंटी पर घंटी बजाए जा रहे हैं और आवाज़ पर आवाज दे रहे है। हो ना हो कॉलोनी में ज़रूर कोई लफड़ा हुआ है।’

    मुंशीजी का नाम सुनते ही मैंने रजाई एक ओर सरका दी और जल्दी-जल्दी कपड़े बदलकर मैं बाहर आ गया। श्रीमती जी भी मेरे पीछे-पीछे चली आई। बरामदे की लाइट जलाकर मैं गेट पर पहुँचा। क्या देखता हूँ कि मुंशीजी कम्बल ओढ़े बगल में कुछ दबाए आशा-भरी नजरों से मेरे बाहर निकलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैंने पूछा-

    ‘क्या बात है मुंशीजी? इस कडक़ती ठंड में आप और इस वक्त। और यह-यह आप बगल में क्या दबाए हुए हैं ?’ इससे पहले कि मुंशी जी मेरी बात का जवाब देते, उनके संग आए एक दूसरे व्यक्ति ने उत्तर दिया- ‘भाई साहब, इनकी बगल में ‘सिकंदर’ है। इस के गले में हड्डी अटक गई है, बेचारा दो घंटे से तडफ़ रहा है।’

    मुझे समझते देर नहीं लगी। सिकन्दर का नाम सुनते ही मुझे उस सफेद-झबरे कुत् ते का ध्यान आया जिसे दो वर्ष पहले मुंशीजी कहीं से लाए थे और बड़े चाव से पालने लगे थे। इससे पहले कि मैं कुछ कहता, मुंशीजी भर्राई आवाज़ में बोले-

    ‘भाई साहब, कुछ करिए नहीं तो यह बेचारा छटपटा कर मर जाएगा। देखिए तो, बड़ी मुश्किल से सांस ले पा रहा है। ऊपर से आँखें भी फटने को आ गई हैं इसकी।’

    ‘पर मुंशीजी, मैं कोई डॉक्टर तो नहीं हूँ जो मैं इसको ठीक कर दूँ। इसे तो तुरन्त अस्पताल, मेरा मतलब है वेटरनरी अस्पताल ले जाना चाहिए, वही इसका इलाज हो सकता हैं, मैंने सहानुभूति दिखाते हुए कहा।

    ‘इसीलिए तो हम आपके पास आए हैं। आप अपनी गाड़ी निकालें तो इसे इसी दम अस्पताल ले चलें। इसकी हालत मुझ से देखी नहीं जा रही’ मुंशीजी ने यह बात कुछ ऐसे कहीं मानो उनका कोई सगा-सम्बन्धी उनसे बिछुडऩे वाला हो।

    प्रभु ने न जाने क्यों मुझे हद से ज्यादा संवेदनशील बनाया है। औरों के दु:ख में दुखी और उनके सुख में सुखी होना मैंने अपने दादाजी से सीखा है। मुंशी जी हमारे पड़ोस में ही रहते हैं। बड़े ही मन-मौजी और फक्कड़ किस्म के प्राणी हैं। खिन्नता या चिन्ता का भाव मैंने आज तक उनके चेहरे पर कभी नहीं देखा। मगर आज सिकन्दर के लिए वे जिस कद्र परेशान और अधीर लग रहे थे, उससे मेरा हृदय भी पसीज उठा और मैं यह सोचने पर विवश हो गया कि मानवीय रिश्तों की तरह पशु के साथ मनुष्य का रिश्ता कितना प्रगाढ़ और भावनापूर्ण होता है। मानवीय रिश्तों में, फिर भी, कपट या स्वार्थ की गंध आ सकती है, मगर पशु के साथ मानव का रिश्ता अनादिकाल से ही निच्छल, मैत्रीपूर्ण और बड़ा ही सहज रहा है।

    मैंने मुंशी जी से कहा-

    ‘आप चिंता न करें। मैं अभी गाड़ी निकालता हूँ। भगवान ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा।’

    सिकन्दर को लेकर हम सभी गाड़ी में बैठ गये। वेटरनरी अस्पताल लगभग पांच किलोमीटर दूर था। मैंने मुंशी जी से पूछा-

    ‘मुंशी जी, यह तो बताइए कि आपने अपने इस कुत्ते का नाम ‘सिकन्दर’ कैसे रख लिया ? लोग तो अपने कुत्तों का नाम ज्य़ादातर अंग्रेज़ी तर्ज़ पर टॉनी, स्वीटी, पोनी, कैटी आदि रखते हैं। सिकन्दर नाम तो मैं ने पहली बार सुना है।’

    मेरी बात का जवाब मुंशी जी ने बड़े गर्व-भरे लहजे में दिया-

    ‘भाई साहब, जब अंग्रेज यहाँ से चले गए तो हम अंग्रेजी नाम को क्यों अपनाएं? अंग्रेजी नाम रखने का मतलब है अंग्रेजियत यानी विदेशी संस्कृति को बढ़ावा देना। मेरी बड़ी बिटिया ने मुझे पाँच-चार नाम सुझााए थे-

    मोती, शेरू, भोला, हीरा, सिकन्दर आदि। मुझे सिकन्दर नाम अच्छा लगा और यही नाम इसको दिया।’

    अस्पताल नजदीक आ रहा था। इस बीच मैंने मुंशीजी से एक प्रश्न और किया-

    ‘अच्छा, यह बताइए कि यह हड्डी इस सिंकदर के गले में कैसे अटक गई ? आप तो एकदम शाकाहारी हैं।’

    इस बात का जवाब मुंशी जी ने कुछ इस तरह दिया मानो उन्हें मालूम था कि मैं यह प्रश्न उनसे जरूर पूछूंगा। वे बोले-

    ‘भाई साहब, अब आप से क्या छिपाऊँ? आप सुनेंगे तो न जाने क्या सोचेंगे! हुआ यह कि मेरी श्रीमतीजी ने आपकी श्रीमतीजी से यह कह रखा है कि जब भी कभी आपके घर में नानवेज बने तो बची-खुची हड्डियाँ आप फेंका न करें बल्कि हमें भिजवा दिया करें – हमारे सिकन्दर के लिए। आज आपके यहाँ दोपहर में नानवेज बना था न?’

    ‘हां बना था’ मैंने कहा।

    ‘बस, आपकी भिजवाई हड्डियों में से एक इस बेचारे के हलक में अटक गई।’ कहकर मुंशी जी ने बड़े प्यार से सिकन्दर की पीठ पर हाथ फेरा।

    मुंशी जी की बात सुनकर अपराध-बोध के मारे मेरी क्या हालत हुई होगी, इस बात का अन्दाज़ अच्छी तरह लगाया जा सकता है। कुछ ही मिनटों के बाद हम अस्पताल पहुँचे। सौभाग्य से डॉक्टर ड्यूटी पर मिल गया। उसने सिकन्दर को हम लोगों की मदद से ज़ोर से पकड़ लिया और उसके मुंह के अन्दर एक लम्बा चिमटानुमा कोई औजार डाला। अगले ही क्षण हड्ïडी बाहर निकल आई और सिकन्दर के साथ-साथ हम सभी ने राहत की सांस ली। अब तक रात के साढ़े बारह बज चुके थे।

    ‘घर पहुंचने पर श्रीमतीजी बोली- ‘क्योंजी, निकल गई हड्ïडी सिकन्दर की?’

    श्रीमती जी की बात सुनकर मुझे गुस्सा तो आया, मगर तभी अपने को संयत कर मैंने कहा-

    ‘कैसे नहीं निकलती, हड्ïडी गई भी तो अपने घर से ही थी।’

    मेरी बात समझते श्रीमती जी को देर नहीं लगी। वह शायद कुछ स्पष्ट करना चाहती थी, मगर मेरी थकान और बोझिल पलकों को देख चुप रही।

    दूसरे दिन अल-सुबह मुंशी जी सिकन्दर को लेकर मेरे घर आए ओर कल जो मैंने उनके लिए किया, उसके लिए मुझे धन्यवाद देने लगे।

    मैंने सहजभाव से कहा-

    ‘मुंशी जी, इसमें धन्यवाद की क्या बात है? कष्ट के समय एक पड़ौसी दूसरे पड़ौसी के काम नहीं आएगा, तो कौन आएगा ?’

    मेरी बात सुनकर शायद उनका हौसला कुछ बढ़-सा गया। कहने लगे-

    ‘आप बुरा न मानें तो एक कष्ट आपको और देना चाहता हूँ।’

    ‘कहिए’ मैंने धीमे-से कहा।

    ‘वो-वोह- ऐसा है कि।’

    ‘मुंशी जी, संकोच बिल्कुल मत करिए। साफ-साफ बताइए कि क्या बात है?’

    ‘ऐसा है भाई साहब, मैं और मेरी श्रीमतीजी एक महीने के लिए तीर्थयात्रा पर जा रहे हैं। हम ने सोचा कि क्यों न सिकन्दर को आपके यहाँ छोड़ चलें। आपका मन भी लगेगा, चौकसी भी होगी और सिकन्दर को खाने को भी अच्छा मिलेगा।’ मुंशीजी ने अपनी बात कुछ इस तरह रखी मानो उन्हें पक्का विश्वास हो कि मैं तुरन्त हाँ कह दूंगा।

    मुंशी जी मेरा जवाब सुनने के लिए मुझे आशा-भरी नजऱों से ताकने लगे। इस बीच उन्होंने दो-एक बार सिकन्दर की पीठ पर हाथ भी फेरा जो मुझे देख बराबर गुर्राए जा रहा था। मैंने तनिक गम्भीर होकर उन्हें समझाया-

    ‘देखिए, मुंशी जी, आप तो जानते ही हैं कि हम दोनों पति-पत्नी नौकरी करते हैं। बच्चे भी बाहर ही रहते हैं। यहाँ सिकन्दर को रखेगा कौन? औेर फिर बात एक-दो दिन की नहीं पूरे एक महीने की है। आप शायद नहीं जानते कि पशु विशेषकर कुत्ता बड़ा भावुक होता है – वेरी सेंटीमेंटल। मालिक की जुदाई का गम उससे बर्दाश्त नहीं होता। आप का एक महीने का वियोग शायद यह निरीह प्राणी सहन न कर पाए और, और भगवान न करे कि…।

    ‘नहीं, नहीं -ऐसा मत कहिए। सिकन्दर से हम दोनों पति-पत्नी बेहद प्यार करते हैं। वह तो हमारे जीवन का एक अंग-सा बन गया है। उसके लिए हम तीर्थयात्रा का विचार छोड़ सकते हैं।’ मुंशीजी ने ये शब्द भाव-विभोर होकर कहे।

    ‘तब फिर आप ऐसा ही करें। तीर्थ यात्रा का आइडिया छोड़ दें और सिकन्दर की सेवा में जुट जाएँ। मैंने बात को समेटते हुए कहा।

    मेरी बात सुनकर वे उठ खड़े हुए। सिकन्दर को एक बार फिर पुचकारकर जाते-जाते मुझ से कहने लगे-

    ‘भाई साहब, जब भी आपके घर में नानवेज खाना बने तो वो-वोह बची-खुची हड्डियाँ आप जरूर हमें भिजवा दिया करें।’

    ‘पर मुंशीजी, हड्डी फिर सिकन्दर के गले में अटक गई, तो? ’

    ‘उस बात की आप फिक्र न करें- इस बार आपको नींद से नहीं जगाएँगे, किसी और पड़ौसी को कष्ट देंगे’ कहते हुए मुंशीजी सिकन्दर की चेन को थामे लम्बे-लबे डगे भरते हुए अपने घर की ओर चल दिए।

    डॉ० शिबन कृष्ण रैणा
    डॉ० शिबन कृष्ण रैणा
    जन्म 22 अप्रैल,१९४२ को श्रीनगर. डॉ० रैणा संस्कृति मंत्रालय,भारत सरकार के सीनियर फेलो (हिंदी) रहे हैं। हिंदी के प्रति इनके योगदान को देखकर इन्हें भारत सरकार ने २०१५ में विधि और न्याय मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति का गैर-सरकारी सदस्य मनोनीत किया है। कश्मीरी रामायण “रामावतारचरित” का सानुवाद देवनागरी में लिप्यंतर करने का श्रेय डॉ० रैणा को है।इस श्रमसाध्य कार्य के लिए बिहार राजभाषा विभाग ने इन्हें ताम्रपत्र से विभूषित किया है।

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