देहली वैली- हिन्दी फिल्म उद्योग और राजनीति पर तेज प्रहार

वीरेन्द्र जैन

किसी फिल्म पुरस्कार समारोह में आमिर खान ने बरसात फिल्म के गाने पर अभिनय करके राज कपूर को जीवंत कर दिया था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आमिर खान इस युग के राज कपूर हैं जो समकालीन विषयों पर यथार्थवादी, मनोरंजक, और राजनीतिक सामाजिक विसंगतियों पर तेज प्रहार करने वाली फिल्में बनाते हैं। इन फिल्मों में अंतर्निहित व्यंग्य बिना किसी मुखर नारे के समाजिक यथार्थ के ऐसे दृष्य बिम्ब सामने लाता है जो हमको समाज के प्रति बढती उदासीनता के कारण उपेक्षित होते जा रहे विषयों पर विचार करने के लिए विवश कर देते हैं। खेद है कि इस फिल्म में पात्रों द्वारा प्रयुक्त गालियों से विचलित अनेक समीक्षक फिल्म के मूल विषय, उसके सन्देश और प्रभाव की उपेक्षा कर गये।

फिल्म का नाम देहली वैली है। कश्मीर वैली[घाटी] शब्द हमारे समाचार माध्यमों में इतना अधिक आया है कि वैली शब्द से ही एक ऐसे क्षेत्र की ध्वनि निकलती है जहाँ पिछले कई दशकों से क्षेत्र के निवासियों का एक वर्ग अलगाववादी हिंसक आन्दोलन चला रहा है, जिसके प्रति पूरा देश चिंतित है। देहली वैली[घाटी] नहीं है, किंतु असामाजिक तत्वों के काम, उनकी स्वतंत्र सत्ता, उनके उत्पीड़न, आदि इसे एक ‘वैली’ ही बना देते हैं, जिसके प्रति एक दिशाहीन असंतोष मौजूद रहता है। देहली के राजधानी होने के कारण इसकी दशा पूरे देश की दशा का प्रतिनिधित्व करती है। फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उसे केवल देहली शहर की फिल्म बताता हो, इस के जैसे कोलकता, मुम्बई और दूसरे साठ बड़े शहर भी हो सकते हैं। पुराने शहर के वही पुराने जर्जर मकान, तथा वैसे ही मकान मालिक, झरते चूने की दीवारें, शौचालय जीने, और जिन्दा रहने के लिए दिन प्रतिदिन झूझते निम्न मध्यमवर्गीय किरायेदार, उनके घिसटते पुराने वाहन, भी सभी जगह हैं। कलाएं ऐसे प्रतीक चुनती हैं जिससे किसी एक चावल को परख कर पूरी हंड़िया का पता चल सके। संघर्ष के कई रूप होते हैं, जिनमें से जीवन संघर्ष भी एक है।

आम हिन्दी फिल्मों की करीने से सजी साफ सुथरी गरीबी से अलग आमिर की फिल्में शायद पहली बार सच्चे मध्यम वर्ग को केन्द्र में रख कर बनायी जा रही हैं, और उसमें यथार्थ जगत से ही चुनकर ऐसे रोचक प्रसंग जोड़े जाते हैं कि फिल्म व्यावसायिक स्तर पर भी दूसरी सफल फिल्मों को पीछे छोड़ देती है। दर्शक इन फिल्मों में अपना घर परिवेश और खुद को देख कर इसी तरह हँसता है जैसे होली खेल कर आने के बाद हम आप आइने में अपनी शक्ल देख कर हँसते रहे हैं। व्यंग्य का एक सजग पाठक और छोटा मोटा लेखक होने के कारण मैं जानता हूं कि व्यंग्य की धार तेज करने के लिए उसमें अतिरंजना डालना पड़ती है। वह अतिरंजना उस मूल प्रवृत्ति को बहुत साफ साफ रेखांकित कर देती है जिस पर व्यंग्य किया जा रहा हो। यह वैसा ही है जैसे हम अपने लेखन में कुछ पंक्तियों को बोल्ड कर देते हैं।

एक पत्रकार, एक प्रैस फोटोग्राफर, और एक व्यावसायिक कार्टूनिस्ट एक साथ रहते हैं, और हास्टल के छात्रों की तरह एक साथ रहने, खाने पीने, आलस करने व अपना काम एक दूसरे पर टालने, आपस में गाली गलौज करते करते साथ जीवन गुजार रहे हैं, क्योंकि उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। इस तरह के रहन सहन में वह बनावट नहीं होती, जिसे तथाकथित सभ्यता कहा जाता है। जिनसे आप अपनी सभ्यता की उम्मीद करते हैं, पहले उन्हें अपने जैसे संसाधन तो उपलब्ध कराइए। यह अ-सभ्यता जब रहन सहन में है तो भाषा और व्यवहार में होगी ही होगी। फिल्म में पात्रों द्वारा प्रयुक्त गालियां उनके रहन सहन के साथ इतनी एकाकार हैं कि उनके मुँह से अस्वाभाविक और यौनिक नहीं लगतीं। आमिर की फिल्मों से पहले बोलचाल की यह स्वाभाविकता तो बड़े बड़े नामी यथार्थवादी हिन्दी फिल्म निर्माता भी नहीं ला सके थे। परोक्ष में यह फिल्म व्यावसायिक फिल्म निर्माताओं पर वैसा ही कटाक्ष भी है जैसा कि पीपली लाइव में विजुअल मीडिया पर किया गया है। फिल्म की ग्लैमर केन्द्रित हीरोइन के नाज नखरे, फूहड़ स्वर में बेहूदे ढंग से गाने की कोशिश, अपने चित्रों को पत्रकारों को जबरदस्ती देना, नकली ढंग से शरमाते शरमाते अपनी मेक-अप करने वाली के इशारे पर गा कर दिखाना उस फिल्म जगत पर कटाक्ष है। समाज में अपसंस्कृति का फैलाव ऐसा हो गया है कि वही फूहड़ गाना एल्बम के रूप में सामने आकर एक महिला फिल्म पत्रकार की अच्छी कमाई करा देता है किंतु इस फिल्म के दर्शकों को संगीत के आनन्द की जगह हँसी आती है। दूसरी ओर परम्परागत संगीत की कक्षाएं ऐसे जर्जर भवन में चल रही हैं जहाँ नर्तकी के पाँव की धमक से फर्श नीचे चला जाता है व उसका पाँव शास्त्रीय कलाओं की तरह अधर में लटक जाता है जो न नीचे जा रहा होता है और न ऊपर आ रहा होता है।

फिल्म में बाजारू खाने की गन्दगी से उपजे पेट के रोगों, पानी की कमी और डिब्बा बन्द जूसों का आधिक्य आदि की दशा बताने के लिए इतनी बार शौचालय प्रसंग लाये गये हैं कि आम दर्शक घिना सकता है पर दूसरी ओर यही घृणास्पद स्थितियां एक बड़े समाज का यथार्थ भी हैं जिन्हें हम चाहे अनचाहे झेल रहे हैं। फिल्म में कानून व्यवस्था की खराब हालत, लोगों का पुलिस के पास जाने से बचना, अपराधियों का इस तरह व्यवहार करना जैसे कि उन्हें किसी से कोई भय ही नहीं है, असीमित समय तक बेबकूफ प्रबन्धक के नीचे काम करने वाले कार्टूनिस्ट की मजबूरी, फोटोग्राफर को मकान किराया चुकाने के लिए ब्लेकमेलिंग के लिए विवश होना तथा पत्रकार को बेहद निजी क्षणों में भी काम पर जाने की गुलामी को भी दर्शा कर असंगठित क्षेत्र में चल रहे शोषण की ओर संकेत किये गये हैं। कुल मिला कर यह चाशनी में मिला कर दी गयी कढुवी औषधि है। जो चाशनी के स्वाद में अटक कर रह गये हैं उन्हें भी इसमें छुपी दवा असर करेगी क्योंकि हम दूसरों पर हँसते समय यह तय कर लेते हैं कि हमें ऐसा कुछ नहीं करना है जिससे हम पर कोई हँस सके। जो लोग भी इसका विरोध कर रहे हैं वे दर्शकों का ध्यान खींच कर परोक्ष में निर्माता की व्यावसायिक मदद ही कर रहे हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि इस फिल्म के साथ रिलीज अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’ पीछे छूट गयी जबकि इसके विज्ञापन में अमिताभ को सबका बाप बताया जा रहा था

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