लेखक परिचय

अतुल तारे

अतुल तारे

सहज-सरल स्वभाव व्यक्तित्व रखने वाले अतुल तारे 24 वर्षो से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। आपके राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और समसामायिक विषयों पर अभी भी 1000 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से अनुप्रमाणित श्री तारे की पत्रकारिता का प्रारंभ दैनिक स्वदेश, ग्वालियर से सन् 1988 में हुई। वर्तमान मे आप स्वदेश ग्वालियर समूह के समूह संपादक हैं। आपके द्वारा लिखित पुस्तक "विमर्श" प्रकाशित हो चुकी है। हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी व मराठी भाषा पर समान अधिकार, जर्नालिस्ट यूनियन ऑफ मध्यप्रदेश के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष, महाराजा मानसिंह तोमर संगीत महाविद्यालय के पूर्व कार्यकारी परिषद् सदस्य रहे श्री तारे को गत वर्ष मध्यप्रदेश शासन ने प्रदेशस्तरीय पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित किया है। इसी तरह श्री तारे के पत्रकारिता क्षेत्र में योगदान को देखते हुए उत्तरप्रदेश के राज्यपाल ने भी सम्मानित किया है।

Posted On by &filed under परिचर्चा.


-अतुल तारे-
smriti

यह वास्तव में देश का दुर्भाग्य ही है और इसीलिए संभवत: भारत ही विश्व के उन अपवाद स्वरूप देशों में से एक है, जहां देश की शिक्षा प्रणाली क्या हो, हमें पढ़ाना क्या है, यही आज तक नहीं हो पाया है। शिक्षा के प्रति इस घोर उदासीनता एवं पश्चिमी नजरिए से भारत को देखने का ही परिणाम है कि आज स्वाधीनता के पश्चात आई तीन पीढ़ी क्रमश: राष्ट्र के प्रति स्वाभिमान का भाव खोती जा रही हैं। प्रशंसा करनी होगी मानव संसाधन मंत्री समृति ईरानी की जिन्होंने कामकाज संभालते ही देश की रुग्ण शिक्षा पद्धति की नस पर हाथ रख कर निर्देश दे दिए हैं कि भारतीय शिक्षा प्रणाली वेदों के आधार पर किस प्रकार विकसित की जा सकती है इस संभावना पर विचार किया जाए। हम जानते हैं कि पश्चिम की चिंतन धारा प्लेटो एवं अरस्तू से प्रभावित है, कारण उसका उद्गम ही इनका दर्शन है। ठीक इसी प्रकार भारतीय चिंतन की गंगोत्री वेद है।

साहित्य, विज्ञान, कला, संस्कृति, अर्थ, लोकाचार, राजनीति सहित जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जिसका समावेश वेदों में न हो। परन्तु लॉर्ड मैकाले के मानस पुत्रों ने आजादी के बाद देश की शिक्षा पद्धति की रचना ही ऐसी की कि हम कालिदास का अभिज्ञान शकुंतलम तो भूल गए, पर शेक्सपियर का ‘मर्चेन्ट ऑफ वेनिसÓ याद रहा। कौटिल्य का अर्थशा हमारे लिए पोथी हो गया और जार्ज बर्नाड शा में हम विकास के सूत्र तलाशने लगे। आयुर्वेद के जनक धनवंतरी हमारे लिए अप्रासंगिक हो गए और उसका स्थान आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने ले लिया, जिसने रोग का इलाज तो किया पर शरीर को दवा पर अवलम्बित कर दिया। तात्पर्य यह कदापि नहीं कि पश्चिमी शिक्षा पद्धति अनुचित है। उसमें सभी त्याज्य है। परन्तु वह अपूर्ण है, एकांगी है, यह पश्चिम भी मानने लगा है। अत: वह भी संस्कृत में दर्शन के ज्ञान, के सूत्र तलाश रहा है। निश्चित रूप से इस परिप्रेक्ष्य में श्रीमती स्मृति ईरानी की पहल सराहनीय है। उन पर शिक्षा के भगवाकरण के आरोप लगेंगे पर केन्द्र में आज सरकार है उसमें आरोपों का सामना कर परिणाम देने का साहस है अत: इस पहल के सकारात्मक परिणामों की प्रतीक्षा करनी होगी।

परन्तु इस बीच स्मृति ईरानी की शैक्षणिक योग्यता पर उठा सवाल अज्ञानतावश है, हताशावश है या इसके पीछे कोई षड्यंत्र यह भी समझना होगा। कारण स्वयं स्मृति ईरानी ने संकेत दिए हैं कि यह मूल काम से मुझे भटकाने का प्रयास है। मानव संसाधन मंत्री ही नहीं जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में शिक्षित होना आवश्यक है। कबीर किस विश्व विद्यालय से पीएचडी थे, तुलसीदास क्या हार्वर्ड रिटर्न थे, पर आज वे जो रच गए हैं उस पर विद्वान मंथन कर रहे हैं। आशय स्मृति ईरानी की इनसे तुलना करने का नहीं है कारण वे व्यक्तित्व तो अतुलनीय हैं। कहने का आशय यह कि पढ़ाना क्या है, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह भी होता है कि पढ़ाते किस तरह हैं, इसलिए शिक्षा में स्नातक (बी.एड.) या स्नातकोत्तर (एम.एड.) की आवश्यकता हुई। यह समय आरोप-प्रत्यारोप या सतही राजनीति का नहीं है। मानव संसाधन यह शब्द ही अपने आप में व्यापक है अपार संभावनाएं लिए हुए है। यह मंत्रालय मनुष्य के सर्वांगीण विकास के रास्ते तलाशता है और मनुष्य का सर्वांगीण विकास सिर्फ अक्षर ज्ञान या बड़ी-बड़ी डिग्री लेने से नहीं होता। अत: स्मृति ईरानी की योग्यता की कसौटी उनके काम का प्रदर्शन होगा। एक राज्यसभा सांसद के नाते, भाजपा की वरिष्ठ नेत्री के नाते वे स्वयं को प्रमाणित कर चुकी हैं। आज इस युवा नेत्री को एक असाधारण जवाबदारी मिली है, तो यह समय है कि उनके निर्णयों की प्रतीक्षा की जाए न कि अनावश्यक विवाद खड़ा करके स्वयं के शिक्षित (?) होने का प्रदर्शन करने की।

5 Responses to “अभिनंदन स्मृति ईरानी का”

  1. pawan kumar

    अंग्रेजों से पहले भारत की शिक्षा व्यवस्था व नीति
    1. 20 octuber 1931 गांधीजी ने रॉयल इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल अफेयर्स – ब्रिटेन में कहा था कि – मैं बगैर किसी भय के कहता हूँ कि आज की तुलना में भारत पचास या सौ साल पहले अधिक साक्षर था. भारत में आने के बाद अंग्रेज प्रशासकों ने यहाँ की चीजों को यथावत स्वीकार करने के बदले उन्हें उखाड़ना शुरू किया. उन्होंने मिटटी खोद कर जड़ें बहार निकाल कर देखीं और उन्हें वैसा ही खुला छोड़ दिया और इस तरह वह सुंदर वृक्ष नष्ट हो गया.
    2. प्लासी की लड़ाई (1757) के बाद अंग्रेजों ने बंगाल में लूट की शुरुआत की. इस लूट के कारन ब्रिटेन के पिछड़े हुए उद्योग-धन्धों को उन्नति करने का अवसर मिला. प्लासी की लड़ाई से लेकर वाटरलू तक, यानि 1757 से 1815 के बीच, तकरीवन एक हजार मिलियन पौंड भारत से इंग्लैंड पहुँचा. माना जाता हैं कि बंगाल से लुटे गए धन की बदौलत ही इंग्लैंड में मशीनों का निर्माण हो सका.
    3. A.E. dobbs अपनी किताब एजुकेशन एंड सोशल मूवमेंट्स 1700-1850 में लिखते है- 16वीं सदी के मध्य में इंग्लैंड में यह कानून बनाया गया कि किसी भी गिरजाघर में अंग्रेजी में बाइबिल नहीं पढी जाय. किसान का बेटा खेती ही करेगा, व्यापारी का बेटा व्यापर ही करेगा, उस वक्त यही प्रचलन था. dobbs के अनुसार खेत में हमें हल चलाने वाले की उतनी ही जरुरत हैं, जितनी कि किसी और देश को होगी, इसलिए हर तरह के बच्चों को स्कूल जाने जरूरत नहीं हैं.
    4. गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक ने 1804 में बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल के अध्यक्ष को पत्र में लिखा था कि हमने इस देश पर बहूत कठोरता से शासन किया है जिसका परिणाम घोर गरीबी के रूप में सामने आया है.
    5. भारत में धार्मिक और नैतिक सुधार के नाम पर अंग्रेजो की शिक्षा प्रणाली थोपने की कवायद शुरू की गयी. 1813 में इंग्लैंड की पार्लियामेंट में इस विषय पर लम्बी बहस हुई और भारत में शिक्षा किस-किस तरह की है? क्या-क्या पढाया जाता हैं? किस पद्धति से पढायाजाता हैं? —-– वगैरह के बारे मैं में विस्तार से जानकारी जुटाने का फेसला लिया गया.
    6. 1828 में हिंदुस्तान के गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक द्वारा लन्दन में अपनी सरकार को लिखे पत्र में कहता है कि 1824 में कलकत्ता के पास बैरकपुर में छावनी में सैनिक विद्रोह से अब घबराने की कोई बात नहीं, क्योकि अब यहा का पढा-लिखा वर्ग अपने तौर-तरीके छोड़ कर साधुओं, फकीरों को दान-दक्षिणा देना बंद कर, उस बचे हुए पैसे को हमारी नक़ल करने में और हमें प्रसन्न करने में लगाता हैं.
    7. विलियम एडम ने अपनी पहली रपट में लीखा था, “1830 के दशक में बिहार और बंगाल प्रेसिडेंसी में लगभग एक लाख स्कूल थे. बम्बई प्रेसिडेंसी में नये शामिल किये गये इलाकों के बारे में वरिष्ट अधिकारी जी. एल. प्रेंडरगास्ट का कहना हैं, “पुरे क्षेत्र में छोटा या बड़ा येसा कोई गाँव नहीं हैं जहाँ कम-से-कम एक स्कूल न हो.बड़े गांवों में तो एक से ज्यादा स्कूल भी हैं.”
    8. बेलारी जिले का कलेक्टर ए. डी. कैम्पबेल 17 अगस्त 1823 को राजस्व विभाग को जिले की शिक्षा का ब्यौरा पेश करते हुए लिखता है : “ मुझे यह कहने में संकोच हो रहा हैं कि जिले की कुल 533 शिक्षण संस्थाओं में से एक को भी सरकारी सहायता नहीं मिलती हैं.” आगे वह लिखता हैं की इन संस्थाओं को पहले के राजा धन और भूमि दान देकर सहायता करते थे. शिक्षकों को भूमि दान दी जाती थी और उन्हें समाज का सम्मानित व्यक्ति माना जाता था, इसलिए उनसे किसी प्रकार का कर आदि नहीं लिया जाता था.”
    9. मिनिट्स वाय टी. बी. मैकाले , 2 feburary 1835 — हम अपने सीमित संसाधनों के बल पर सभी लोगों को शिक्षित नहीं कर सकते हैं. ऐसे वर्ग का निर्माण करना होगा जो मध्यस्थ की तरह हमारी बात उन लाखों लोगों तक पहुचाय जिन पर हम शासन कर रहें है. ऐसा वर्ग जिसका खून और रंग तो हिन्दुस्तानी होगा, मगर जिसकी रुचियाँ, नैतिक मूल्य और बुध्दि अंग्रेजी होगी.
    10. पंजाब की शिक्षा के विषय में डा. जी. डब्लू. लीटनर ने 1882 में एक रिपोर्ट तेयार की थी. उसमे वह लिखता हैं की भारत में हमेशा से ही ज्ञान के प्रति सम्मान का भाव रहा हैं, पंजाब भी उससे अछूता नहीं हैं. बाहरी आक्रमणों और आंतरिक युद्ध से त्रस्त रहने के बावजूद यहाँ शिक्षा का संरक्षण और विकाश किया गया हैं. कितना ही अधिक अनैतिक मुखिया हो, लोभी साहूकार, कोई लुटेरा या छोटा जमींदार हो, वह शिक्षितों का सम्मान करता हैं और विद्यालय की स्थापना करके शांति का अनुभव करता हैं.
    11. मैकाले की की रिपोर्ट के आधार पर गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक ने 7 मार्च 1835 को एक आज्ञा जारी की जिसमे कहा गया कि शिक्षा के लिए मंजूर किया गया पूरा धन केवल अंग्रेजी शिक्षा पर ही खर्च किया जाये. इस आदेश के नतीजे का बयान करते हुई प्रसिद्ध इतिहास लेख H. H. vilson ने इंग्लैंड की पार्लियामेंट सिलेक्ट कमेटी के सामने 5 जुलाई 1853 को कहा, “वास्तव में हमने अंग्रेजी पढ़ें – लिखे लोगो की अलग जाती बना दी हैं, जिन्हें अपने देशवासियों के साथ या तो सहानुभूति है ही नहीं और यदि है तो बिलकूल कम.
    12. 1857 के विद्रोह के कारणों के विषय में एक सेन्य अधिकारी ने गवर्नर जनरल लार्ड कंनिंग को लिखा कि भारत में हमने बन्दूक की नोक पर राजस्व की उगाही की है और विद्रोह का एक महत्वपूर्ण कारन हैं. सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि अंग्रेजी शिक्षा का ही प्रसार हो, और वह भी उच्च वर्ग के बच्चो में ही. ऐसे नियम बनाये गये जिनसे गरीब तबकों में शिक्षा नहीं पहुचें.
    13. कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा 5 सितम्बर 1927 को लिखे एक अन्य पत्र में भारत के गवर्नर जनरल को कहा गया है की वह इस धन को उच्च और माध्यम श्रेणी के उन भारतवासियों पर खर्च करे जिनसे उसे शासन करने के लिए सबसे अधिक योग्य देशी एजेंट मिल सहें और जिनका अपने देस्स्वसियों पर सबसे ज्यादा प्रभाव है.

    Reply
  2. Dr.Dhanakar Thakur

    अनुप्रमाणित nahee Anupranit apne parchay me shiddha karen.

    Ek patrakarko nispaksh hona chahiye , kisee paksh kaa chatukar nahee.
    Tulna apne kabeer aadi se kar hee dee hai.
    Rajysabhaa me janaa kisee kee yogytaa ka mapak nahee hai.
    Inkee yogyataa sanskritik matralay ke ethee aur vah bhee any mantriyon ke umra aadi dekhte huwe Rajymatree kee- katai Manav sansadhan mantree kee nahee.
    yah saty bolne kee himmat jutaiye.

    Reply
  3. Arun Kumar Upadhyay

    अंग्रेजी शासन के बाद कोई भी ऐसा इतिहासकार नहीं हुआ जिसे भारतीय पंचांग देखना आता हो। किसी ने विक्रम सम्वत् का नाम भी नहीं सुना है जिसके अनुसार सभी पर्व मनाये जाते हैं। तथाकथित विद्वानों द्वारा चलाया गया राष्ट्रीय शक अभी तक सरकारी काम में भी शुरु नहीं हो पाया है। वामपन्थी इतिहासकार बड़े गर्व से कहते हैं कि उन्होंने रामायण या महाभारत आदि कोई भी भारतीय पुस्तक नहीं पढ़ी है। अपनी अशिक्षा पर उन्हें गर्व है पर दूसरों को पढ़ाने के लिये बेचैन रहते हैं। अपने अज्ञान को छिपाने के लिये जितने भी राजाओं ने शक या सम्वत् आरम्भ किये उनको अंग्रेजी आदेश के अनुसार काल्पनिक दिखाना जरूरी है। पूरी फौज ही अशिक्षितों की है, वे किस बात का हल्ला कर रहे हैं। राजनीति पढ़ कर कोई राजनीतिज्ञ नहीं बन रहा है। उन पुस्तकों का वास्तविक राजनीति से कोई सम्बन्ध भी नहीं है। अंग्रेजी में लिखकर संस्कृत एम.ए. की परीक्षा पास कर लोग प्राध्यापक बनते हैं और एक दूसरे को पीएच डी की डिग्री बांटते रहते हैं। पर स्वयं कोई भी पुस्तक पढ़ने में भी असमर्थ हैं, अर्थ समझना बहुत दूर की बात है। अपना ही थीसिस पढ़ सकने वाले विरले ही हैं। प्राच्य विद्या सम्मेलनों में मैंने इसीलिये जाना बन्द कर दिया क्योंकि ७०% व्यक्ति केवल सरकारी खर्च पर घूमने जाते हैं, अपने लेख के विषय और सारांश के बारे में उन्हें कुछ पता नहीं रहता। भौतिक विज्ञान, गणित आदि में भी शोध पत्रों की भरमार है पर +२ की पाठ्यपुस्तकें अमेरिका से आयात होती हैं। यदि कोई शिक्षित अपनी शिक्षा का उपयोग करना चाहता है तो उसे देश छोड़ कर भागना पड़ता है। भारत में वही रह सकते हैं जो अपने को पिछड़ा बना सकें या उसका प्रमाण पत्र ले सकें।

    Reply
    • Rekha Singh

      उपाध्याय जी आपके विचारों से सहमत हूँ

      Reply
    • protima

      उपाध्याय जी ,मै भी आपके विचारों से सहमत हूँ |

      Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *