लेखक परिचय

विपुल समाजदार

विपुल समाजदार

राम लाल आनंद कॉलेज, दिल्ली विश्व विद्यालय के हिन्दी पत्रकारिता के छात्र।

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photoसनातन धर्म की रक्षा व प्रसार-प्रचार का दायित्व संतों, धर्मगुरुओं, ब्राह्मणों का था और है भी। इन्होंने अपने दायित्व का निर्वाह क्यों नहीं किया?

आज हिन्दू धर्म (डाकू, चोर आदि) धर्म भारतीय कागजों में घुस गया। सनातन धर्म को खदेड़ कर जन-जन में प्रवेश कर रहा है। क्यों ? क्यों?? आखिर क्यों??? जबकि सनातन धर्म एक विशाल महाशास्त्र, महावृक्ष है, समस्त प्राणियों की रक्षा का धर्म है सनातन धर्म का प्रवर्तक , ओंम है। हिन्दू धर्म का कोई प्रवर्तक नहीं है। सरकारी तन्त्र एवं बौद्धिक तन्त्र, साहित्यकारों, देश के कर्णधारों, नेताओं ने स्वतन्त्रता के 65 वर्ष बाद भी गुलामी के शब्दों को क्यों फलीभूत होने दिया इसका जिम्मेदार कौन है? कौन है?? कौन है??? जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं। इतने बड़े षड़यन्त्र का रहस्य क्या है? सर्वोच्च सत्ता, न्याय शक्ति इसकी जांच करें। यह सर्वविदित है कि सभी धर्मो का कोई न कोई प्रवर्तक है फिर भी पिता हीन, प्रवर्तक हीन, हिन्दू धर्म को भारतीय पन्नों में क्यों घुसने दिया, इसके जिम्मेदार कौन है? कौन है?? कौन है??? जनता (आर्यन) जवाब मांग रही है। अतः हिन्द, हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान, हिन्दू धर्म को भारतीय पन्नों से तुरन्त प्रभाव से हटाया जाए। ऐसा करने से सही रूप में स्वतन्त्रता का आभास होगा और असीम शान्ति मिलेगी। करके देखो !

ब्रह्माण्डीय पर्यावरण सन्तुलन तो नितांत आवश्यक है सामाजिक सन्तुलन भी आवश्यक है।

‘‘व्यवस्था सोच-परिवर्तन चेतना महायज्ञ’’ का ‘‘जनजागृति अभियान’’

स्वतन्त्रता के 64 वर्ष बाद भी! गुलामी के शब्द! क्यों? क्यों?? क्यों??? जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं!

सेवामें, ………………………………….हे मनीषी, महामानव आज सनातन धर्म खतरे में है। सनातन धर्म को विलुप्त करने का बहुत बड़ा षड़यन्त्र चल रहा है। हमें सनातन धर्म की रक्षा करनी है। अतः कृपया आप अपने पद की गरीमा को ध्यान में रखते हुए मौन का परित्याग कर हमारी रणनीति में सहयोग करने की कृपा करें ताकि सनातन धर्म को विलुप्त करने के षड़यंत्र को विफल कर सके। सनातन धर्म की पूजा एक साथ करने का समय भी निश्चित कर सकें।

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्थान – ये सब फारसी नाम !!!

‘हिन्दू’ शब्द को विदेशी मुसलमान, लूटेरांे, आक्रमणकारियों ने भारत के आर्यों पर सदियांे की गुलामी के समय जबरदस्ती थोपा था। हिन्दू का फारसी भाषा में अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरा, गुलाम, राहजन आदि यह ऐतिहासिक सत्य है।

‘हिन्द’- यानि गुलाम – जयहिन्द, ये गुलामी के पूर्व तक तो ‘जय गुलाम’ सही था। अब कैसा जय गुलाम। अब जय भारत बोलें। हिन्द ‘हिन्द भूमि’ यानि ‘गुलाम भूमि’ गुलामी तक तो सही थी अब ‘भारत भूमि’ आर्य भूमि आदि ही बोलें !

‘हिन्दी’- यानि संस्कृत की एक सरल भाषा परन्तु इसका नाम ‘हिन्दी’ फारसी शब्द है अतः इसका नाम होना चाहिए ‘आर्ष भाषा’ या देवनागरी भाषा !!

‘हिन्दू’- यानि चोर, डाकू, लूटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि आदि जो कि सदियो की गुलामी में तो ठीक था अब हमें अपने मूल रूप ‘आर्य’ में आना चाहिए। आओ हम आर्य बनें, एक बनें , श्रेष्ठ बनें !!!

‘हिन्दुस्थान’- यानि ‘गुलामस्थान’ को बदलकर आर्य स्थान बोलें । विश्व हिन्दू परिषद् की जगह विश्व आर्य परिषद् या विश्व सनातन परिषद् या विश्व भारत परिषद् आदि नवीन नामकरण संस्कार से असीम शांति मिलेगी। करके देखो !!!

इस प्रकार उपरोक्त सभी नामों को जिस प्रकार बम्बई से मुम्बई, मद्रास से चैन्नई, कलकत्ता से कोलकाता आदि कई जगहों के नाम को बदलकर मूल रूप में रखने से शांति मिली है वैसे ही इन हिन्द, हिन्दू आदि नामों को आर्य रूप में संसोधन से भी असीम शांति मिलेगी, करके देखो।

‘हिन्दू’ शब्द का फारसी भाषा में मूल अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि। यह ऐतिहासिक सत्य है।

प्रश्न: हिन्दू शब्द का अर्थ क्या है?

उत्तर: हिन्दू का अर्थ है-लाला लाजपत राय ने अपने परिचय में – महर्षि दयानन्द के लाहौर 1898 के परिचय के बारे में कहा: लेखक के अनुसार कुछ लोग कहते है कि हिन्दू है जो कि सिन्धु का बिगड़ा हुआ नाम है लेकिन यह गलत है। परन्तु सिन्धु एक नदी का नाम है। किसी समुदाय का नाम नहीं है । यह सही है कि यह नाम असली आर्यन जाति को दिया गया है जो कि इस क्षेत्र में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा अपमानित करने के लिए इस नाम से पुकारी जाती थी। फारस में लेखक हमारे लेखक कहते है इस शब्द का तात्पर्य ‘दास’ है और इस्लाम के अनुसार वो सारे लोग जिन्होंने इस्लाम को नहीं अपनाया था उनको दास बना दिया गया।

आगे ‘काला’ और ‘दास’ संकलन में फारसी और उर्दू भाषा के शब्द कोष यह वर्णन करते है कि यह अर्थहीन और घ्रणित ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है- फारसी भाषा का शब्दकोष – ल्युजत-ए-किशवारी, लखनऊ 1964, चोर, डाकू, राहजन, गुलाम, दास। उर्दू फिरोजउल लजत-प्रथम भाग पृ. 615, तुर्की चोर, राहजन, लूटेरा: फारसी गुलाम, दास, बारदा (आज्ञाकारी नौकर), शियाकाम (काला) पेज 376 भार्गव शब्द कोष बारवां संकलन 1965 भी देखे)

परसियन – पंजाबी (डिक्सनरी) शब्द कोश (पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला) भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी, डाकू, राहजन, चोर, दास, काला, आलसी।

(हिन्दुकुश – यानि भ्पदकन ज्ञपससमतए ैसंनहीजंतद्ध यहाँ असंख्य मौतें, मार-काट, हत्याएं हुई।

अब हमें चोर, डाकू, लूटेरे, गुलाम, राहजन नहीं रहना है। हमें श्रेष्ठ बनना है। हमें आर्य बनना है। आओ हम आर्य बनें।

राम और कृष्ण आर्य थे। गुरुनानक देव राम के वंशज है।

हस्तिनापुर के वंशज अन्तिम सम्राट श्री पृथ्वीराज चैहान तक हमारी पहचान आर्य थी। बाद में विदेशियों के अधीन हो गये। आर्यन पहचान ही खत्म हो गई। अब आर्य समाज की संस्थाएं है।

सिकन्दर ने भी हिन्दू शब्द को बोला था परन्तु प्रचलित 1000 ई. के बाद ही हुआ है। महमूद गजनवी ने 997 ई. से भारत में 27 डाके डाले। मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चैहान से कई लड़ाईयां लड़ी दोनों का अन्त हो गया। बाबर आक्रमणकारी था। फिर यहीं रहने का मन बनाया था आदि-आदि आक्रान्ताओं के साथ ही ‘हिन्दू’ शब्द आया।

विदेशी, लूटेरों, आक्रमणकारियों के अत्याचार से आर्य हिन्दू-मुस्लिम में बंट गये।

आओ हम आर्य बने, श्रेष्ठ बने, एक बने – हे श्रेष्ठ जनों, हे आर्यों, विदेशी इस्लामिक लूटेरों, आक्रमणकारियों ने भारतवर्ष में शान्तिमय जीवन यापन करने वाले त्यागी, तपस्वी, हमारे पूर्वजों को घोर यातनाएं देकर हिन्दू और मुस्लमान बना दिये।

अब आप स्वतन्त्र हो, आईये हम श्रेष्ठ बने! आर्य बने!! एक बने!!!

‘हिन्दू’ धर्म का कोई प्रवर्तक नहीं है यानि ‘हिन्दू धर्म’ नहीं है। यह झूठ प्रपंच का मनगढन्त नाम है।

आप मनीषी भी यह पढ़कर स्वयं ही प्रश्न पैदा करे या स्वयं ही उत्तर खोजे या देश में धर्म और सत्य सनातन के नाम के भ्रम का नाश कर अपने स्व कर्तव्य का पालन कर राष्ट्रभक्ति जागृत करें।

– हिन्दू धर्म के दस प्रश्न –

1. हिन्दू धर्म के प्रवर्तक कौन है? 2. हिन्दूधर्म के धर्म ग्रंथ कौन-से है? 3. हिन्दू धर्म का ईश्वर कौन है? 4. हिन्दू धर्म के उपास्य देव कौन-कौन से हैं? 5. हिन्दू धर्म किस समय से चला है समयावधि बताये? 6. हिन्दू धर्मानुसार सृष्टि कब वा कैसे बनी? 7. हिन्दू धर्मानुसार यह सृष्टि एकत्ववाद, द्वैतवाद या त्रैतवाद है?

8. हिन्दू धर्म की पूजा पद्धति क्या है? 9. हिन्दू धर्मानुयायी की जीवन व सामाजिक पद्धति क्या है? 10. हिन्दू शब्द किस भाषा की देन है?

सनातन धर्म के दस उत्तर

1. सनातन धर्म के प्रवर्तक परमपिता परमेश्वर है। जिसका मुख्य नाम ओ3म् है।

2. सनातन धर्म के धर्मग्रंथ चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद) है तथा वेद प्रणीत चार उपवेद छः दर्शन शास्त्र, 11 उपनिषद व चार ब्राह्मण ग्रंथ व मनुस्मृति आदि भी मान्य ग्रंथ है।

3. सनातन धर्म के ईश्वर एक ओ3म् ही है जो सच्चिदानंद स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वअन्तरयामी, अजर, अमर, अभय, नित्य पवित्र और सृष्टिकर्मा है।

4. सनातन धर्म के 33 कोटि जड़ देवता 5 चेतन देव या इन सब देवों का महादेव परमपिता परमेश्वर है। जड़ में 8 वसु अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा एवं नक्षत्र 11 रुद्र पांच प्राण पांच उपप्राण दस वा ग्यारहवीं आत्मा 12 आदित्य वर्ष के बारह महीने जो हमारी आयु को लेता है। एक इन्द्र (ऐश्वर्यदाता) प्रजापति (यज्ञ), चेतनदेव माता, पिता, आचार्य, गुरु एवं पति के पत्नी और पत्नी के लिए पति देवता है।

5.सनातन धर्म सृष्टि के प्रारम्भ काल से ही चल रहा है जिसको 1960853112 वर्षों से चल रहा है। यह वर्तमान प्रचलन ब्रह्माण्ड गणित के आधार पर है।

6.सनातन धर्मानुसार परमपिता परमेश्वर अपने स्व शक्तिमान होने से प्रलय रूपी रात्री का फिर पल मास वर्ष आदि रचकर पूर्व कल्पनुसार सूर्य चन्द्रमा नक्षत्र आदि कि छः चतुर्युगी अमैथुनी सृष्टि और 994 चतुर्युगी मैथुनी सृष्टि चलती है कुल 1000 चतुर्युगी यानी 4,32,00,00,000 वर्षों तक रहती है व इतने समय ही सृष्टि प्रलय (सूक्ष्म रूप) में रहती है।

7. सनातन धर्मानुसार यह सृष्टि त्रेतवाद है (ईश्वर, जीव, प्रकृति)

(1) ईश्वर पूरे ब्रह्माण्ड का एक ही हैं। सच्चिदानन्दस्वरूप, कर्मफल प्रदाता सृष्टि का रचयिता पालनकर्ता एवं प्रलयकर्ता है।

(2) जीव- जो अनंत व सतचित्त हैं, अल्पज्ञ कर्मफलानुसार जन्म मरण के चक्र में पड़ते हुए श्रेष्ठ योनी मानव द्वारा मोक्ष की भी प्राप्त कर सकते हैं।

(3) प्रकृति – जो सत् है तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से युक्त पंच तत्व स्वरूप में है।

8. सनातन धर्म, मानव धर्म, प्राणी धर्म के पंच महायज्ञ द्वारा चैतन्य एवं जड़ देवों की पूजा (यथायोग्य सत्कार एवं उपयोग) की जाती है।

(1) ब्रह्मयज्ञ – ईश्वर का ध्यान व वैदिक सत्य शास्त्रों का स्वाध्याय।

(2) देवयज्ञ – जड़ देवों का मुख अग्नि है सो गौ घृत एवं सुगन्धित, मिष्ठीकारक पुष्टिकारक वनस्पतियों द्वारा हवन करना। वायु को शुद्ध कर स्वास्थ्यवर्धक बनाना।

(3) पितृयज्ञ – जीवत माता, पिता, दादा, दादी, सास, ससुर आदि बड़ों को प्रातः स्नानकर नमस्ते कर उनकी इच्छानुसार भोजन आदि व्यवस्था करना उनकी आज्ञा का पालन करना एवं संतान को सुसंस्कारी बनाना।

(4) बलीवैश्व देव यज्ञ – गाय, कुत्ता, चींटी, पक्षी, विकलांग, विधवा आदि गृह पर आश्रितों की यथा शक्ति सेवा करना।

(5) अतिथियज्ञ – कोई वेदों के विद्वान् संन्यासी घर आये तो उनका हृदय से अभिवादन कर उनसे अपनी शंका का समाधान करना एवं उनकी आवश्यकतानुसार भोजन आदि देकर सेवा करना।

9. सनातन धर्मानुसार व्यक्ति चार वर्ण का चार आश्रमों का पालन करते हुए सोलह संस्कारों द्वारा आत्मोन्नत कर अष्टांग योग द्वारा धर्म अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करना।

छुआछूत रहित कर्मानुसार वर्णव्यवस्था, मृत्यु भोज, बाल विवाह, बहुविवाह आदि। वर्तमान सामाजिक कुरीतियों से रहित आदर्श, जीने दो और जीओ के आधार पर सामाजिक संरचना करना ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ की कामना करना।

10. सनातन धर्मानुसार हम आर्यावर्त के निवासी होने के कारण आदिकाल से आर्य थे परन्तु 997 ईश्वी से विदेशी लूटेरों, आक्रमणकारियों ने हिन्दू शब्द जो फारसी भाषा में मुसलमानों द्वारा दिया गया हमारा अपमान जनित नाम है। जिसका अर्थ काला, चोर, डाकू, लूटेरा, गुलाम आदि बताया है। महाभारत काल तक हमारे महाराजे आर्य पुत्र, ऋषि, महर्षि संतान कहलाती थी परन्तु महाभारत के बाद भी किसी भी धर्मशास्त्र पुराणों में भी किसी महापुरुष या संत आदि को हिन्दू पुत्र नाम से सम्बोधन नहीं आया है तो हम इस अपनी संस्कृति आर्यावर्त देश की परम्परा के श्रेष्ठ नाम आर्य को छोड़ हिन्दू क्यों बोलने लगे या बोल रहे है, गाली ले रहे है। शब्द ब्रह्माण्ड का सार है। शब्द से संस्कार बनते है और इसी हिन्दू शब्द के गूढ़ अर्थ यानि चोर, डाकू, लुटेरा, राहजन आदि को न समझने के कारण त्याग, तपस्वी भारत भूमि के त्यागी तपस्वी संतगणों, विद्वानों ने भी हिन्दू पथ पर चलना शुरू कर दिया है। यहाँ तक कि किसान व मजदूर वर्ग भी संतों, विद्वानों व राज में उच्च पदासीनों को हिन्दू यानि चोर, डाकू, राहजन की ओर अग्रसर होते देख क्षुब्ध है और वे भी मौके की तलाश में है। यहाँ तक अध्यापकगण यानि गुरुजन भी ऐसी भयावनी स्थिति में है का गम्भीरता से चिंतन-मनन करें ।

इसका विचार कर ‘हिन्द’, ‘हिन्दी’, ‘हिन्दू’ और ‘हिन्दुस्तान’ शब्दों का परित्याग करें और इसकी जगह ‘हिन्द’ यानि भारत, ‘हिन्दी’ यानि आर्ष भाषा, देवनागरी, ‘हिन्दू’ यानि आर्य, ‘हिन्दुस्तान’ यानि आर्यस्थान बोलने का प्रचलन शुरू करें । सत्य को ग्रहण करे यही ईश्वर की कामना है।

इनके अलावा हमारी शोध के आधार पर निम्नलिखित 11 प्रश्न और है जो हमने अन्यों से पत्र-प्रेषित करके पूछे थे जिनका उत्तर आज तक नहीं आया। इन सभी का हम ही उत्तर दे सकते है फिर भी आप मनीषी भी इस पर चिंतन-मनन अवश्य करें। उत्तर देने का कष्ट करें।

1. सनातन धर्म प्राचीन होते हुवे भी सिमट कर रह गया क्यों? जबकि दूसरे धर्मों का विश्व में राज चलता है। 2. सभी धर्मों में शान्ति का उल्लेख है फिर आतंकवाद क्यों बढ़ रहा है? 3. आतंकवाद रूपी राक्षस की उत्पत्ति कैसे हुई? 4. सन्तों के प्रवचनों का असर क्यों नहीं पड़ रहा है जबकि करोड़ो रुपये सन्तों के प्रवचनों में खर्च होते है। देखने में ओर सुनने में आया है कि जो सन्तों के पास ज्यादा रहते है उनमें से अधिकांश घोटाला-घपलों में क्यों लिप्त है? 5. आज मनुष्य की गरिमा उसके चरित्र से न आंककर धन से आंककर धन के महत्त्व को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है? 6. अधिकांश की येन-केन प्रकरेण अनीति से धन संचय करने की प्रवृति क्यों बढ़ रही है? 7. वर्तमान में वाहन दुर्घटनाएं क्यों बढ़ रही है? (वाशिंगटन, कैलिफोर्निया, यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण, संगीत से वाहन दुर्घटनाएं आदि होते हैं। (28 जून-2011 के दैनिक अखबार में प्रकाशित) जबकि खेजड़ा एक्सप्रेस के प्रजापति ने शोध करके पाँच वर्ष पहले पता कर लिया था कि ध्वनि प्रदूषण, गीतों से वाहन दुर्घटनाएं, बहरापन आदि होती है जो कि 24 अप्रैल 2008 के अंक में प्रकाशित, 20 अप्रैल को प्रकृति शक्तिपीठ खेजड़ा के कार्यालय में प्रजापति ने शोध पत्र पढ़ा था जिसमें ध्वनि प्रदूषण से वाहन दुर्घटनाएं व अर्द्ध विक्षुप्ता, बहरापन आदि विस्तार से बताया है तथा दुर्घटनाओं के बारे में ओर भी गूढ़ जानकारी की है। सरकार को भी पत्र लिखें। न ही सरकार ने ध्यान दिया और न ही मीडिया ने, जबकि अब अमेरिका केे मनोवैज्ञानिकों की शोध को प्रचारित-प्रसारित कर रहे है।) 8. बच्चों व युवाओं में भी नशे की प्रवृति क्यों बढ़ रही है?

9. अनेक सन्त दुष्आचरण में लिप्त क्यों होते जा रहे हैं? 10. अकाल क्यों पड़ते हैं? एवं 11. कमजोर मानसून में अच्छी वर्षा कैसे ली जा सकती है? आदि आदि अनेकानेक शोध जिसमें विशेष तुलसी, यज्ञ, योग, वनौषधियों से रोगों का उपचार आदि। अकाल पर शोध में लगभग 30 वर्ष लगे है।

हमारा धर्म ‘सनातन धर्म’ है जिसका प्रवर्तक ?, ओ3म्, ओं है। आईये इस ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ के जनजागृति अभियान में शामिल होईये और अनेकानेक गूढ जानकारियों के साथ भारत को विश्व की अग्रणी शक्ति बनाने में अपना योगदान दीजिये।

ओं-शान्ति-शान्ति-शान्ति।

अतः जो भारतीय हैं, आर्य है और ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ में विश्वास रखने वाले है सभी मुख्य कार्यालय ‘पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस, प्रकृति शक्ति पीठ, बीकानेर -4 से सम्पर्क करें और अधिक जानकारी के लिए खेजड़ा एक्सप्रेस पढ़े।

 

नोट: विदेशी महमूद गजनवी ने भारत को 27 डाकों से लूटा, लूट के माल से गजनी को सजाया। गौरी आक्रमण कारियों ने गजनी को जलाकर राख कर दिया। आज भारत को अपने ही लूट कर विदेशों में धन जमा कर रहे है। जब ये लूटेरे मरेंगे तो इनका विदेशों में धन भी जलकर राख हो जायेगा।

 

यह पत्र आपके उज्ज्वल भविष्य की ईश्वर से प्रार्थना करता है। प्राणियों का कल्याण हो। एक बात ओर- हे महामानव आप आर्य है, आप श्रेष्ठ है।

 

7 Responses to “सनातम धर्म और हमारी शोध”

  1. sugyan

    अपने अपने धर्म को सभी सनातन एवं सही मानते हैं| जबकि सत्य ये है कि हिंदू मुस्लिम,ईसाई बौद्ध या जैन ये सभी धर्मों के नाम है| इनका सनातन होना कोई सिद्ध नहीं कर सकता , इश्वर का होना कोई सिद्ध नहीं कर सकता , होना अगर मान भी लें तो उसका ब्रह्माण्ड के किसी भी कार्य या क्रिया में लिप्त होना मानना उसके इश्वर होने में संदेह पैदा करता है| इसलिए अवधारणा ऐसी होनी चाहिये जो सर्व मान्य व प्रामाणिक हो सके| जैसे महावीर के दिए हुए सिद्धांत जो कि प्रामाणिक भी है और उनका किसी व्यक्ति, इश्वर, देश, काल , धर्म के आधार पर उचित भी प्रतीत होता है|लेकिन उसे समझाने कि जरुरत है| हम धर्म विशेष से हट कर महावीर को समझेंगे तो महावीर कि वाणी सर्वमान्य एवं प्रामाणिक प्रतीत होगी|

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  2. ampeemehta

    भारत का सर्वप्रमुख धर्म हिन्दू धर्म है, जिसे इसकी प्राचीनता एवं विशालता के कारण ‘सनातन धर्म’ भी कहा जाता है। ईसाई, इस्लाम, बौद्ध, जैन आदि धर्मों के समान हिन्दू धर्म किसी पैगम्बर या व्यक्ति विशेष द्वारा स्थापित धर्म नहीं है, बल्कि यह प्राचीन काल से चले आ रहे विभिन्न धर्मों, मतमतांतरों, आस्थाओं एवं विश्वासों का समुच्चय है। एक विकासशील धर्म होने के कारण विभिन्न कालों में इसमें नये-नये आयाम जुड़ते गये। वास्तव में हिन्दू धर्म इतने विशाल परिदृश्य वाला धर्म है कि उसमें आदिम ग्राम देवताओं, भूत-पिशाची, स्थानीय देवी-देवताओं, झाड़-फूँक, तंत्र-मत्र से लेकर त्रिदेव एवं अन्य देवताओं तथा निराकार ब्रह्म और अत्यंत गूढ़ दर्शन तक- सभी बिना किसी अन्तर्विरोध के समाहित हैं और स्थान एवं व्यक्ति विशेष के अनुसार सभी की आराधना होती है।हिन्दू धर्म की परम्पराओं का अध्ययन करने हेतु हज़ारों वर्ष पीछे वैदिक काल पर दृष्टिपात करना होगा। हिन्दू धर्म की परम्पराओं का मूल वेद ही हैं। वैदिक धर्म प्रकृति-पूजक, बहुदेववादी तथा अनुष्ठानपरक धर्म था। हिन्दू धर्म की प्रमुख अवधारणाएं निम्नलिखित हैं-ब्रह्म- ब्रह्म को सर्वव्यापी, एकमात्र सत्ता, निर्गुण तथा सर्वशक्तिमान माना गया है। वास्तव में यह एकेश्वरवाद के ‘एकोऽहं, द्वितीयो नास्ति’ (अर्थात् एक ही है, दूसरा कोई नहीं) के ‘परब्रह्म’ हैं, जो अजर, अमर, अनन्त और इस जगत का जन्मदाता, पालनहारा व कल्याणकर्ता है। आत्मा- ब्रह्म को सर्वव्यापी माना गया है अत: जीवों में भी उसका अंश विद्यमान है। जीवों में विद्यमान ब्रह्म का यह अशं ही आत्मा कहलाती है, जो जीव की मृत्यु के बावजूद समाप्त नहीं होती और किसी नवीन देह को धारण कर लेती है। अंतत: मोक्ष प्राप्ति के पश्चात् वह ब्रह्म में लीन हो जाती है।पुनर्जन्म- आत्मा के अमरत्व की अवधारणा से ही पुनर्जन्म की भी अवधारणा पुष्ट होती है। एक जीव की मृत्यु के पश्चात् उसकी आत्मा नयी देह धारण करती है अर्थात् उसका पुनर्जन्म होता है। इस प्रकार देह आत्मा का माध्यम मात्र है। योनि- आत्मा के प्रत्येक जन्म द्वारा प्राप्त जीव रूप को योनि कहते हैं। ऐसी 84 करोड़ योनियों की कल्पना की गई है, जिसमें कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, वृक्ष और मानव आदि सभी शामिल हैं। योनि को आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में जैव प्रजातियाँ कह सकते हैं। कर्मफल- प्रत्येक जन्म के दौरान जीवन भर किये गये कृत्यों का फल आत्मा को अगले जन्म में भुगतना पड़ता है। अच्छे कर्मों के फलस्वरूप अच्छी योनि में जन्म होता है। इस दृष्टि से मनुष्य सर्वश्रेष्ठ योनि है। परन्तु कर्मफल का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति अर्थात् आत्मा का ब्रह्मलीन हो जाना ही है। स्वर्ग-नरक- ये कर्मफल से सम्बंधित दो लोक हैं। स्वर्ग में देवी-देवता अत्यंत ऐशो-आराम की ज़िन्दगी व्यतीत करते हैं, जबकि नरक अत्यंत कष्टदायक, अंधकारमय और निकृष्ट है। अच्छे कर्म करने वाला प्राणी मृत्युपरांत स्वर्ग में और बुरे कर्म करने वाला नरक में स्थान पाता है। मोक्ष- मोक्ष का तात्पर्य है- आत्मा का जीवन-मरण के दुष्चक्र से मुक्त हो जाना अर्थात् परमब्रह्म में लीन हो जाना। इसके लिए निर्विकार भाव से सत्कर्म करना और ईश्वर की आराधना आवश्यक है। चार युग- हिन्दू धर्म में काल (समय) को चक्रीय माना गया है। इस प्रकार एक कालचक्र में चार युग-कृत (सत्य), सत त्रेता, द्वापर तथा कलि-माने गये हैं। इन चारों युगों में कृत सर्वश्रेष्ठ और कलि निकृष्टतम माना गया है। इन चारों युगों में मनुष्य की शारीरिक और नैतिक शक्ति क्रमश: क्षीण होती जाती है। चारों युगों को मिलाकर एक महायुग बनता है, जिसकी अवधि 43,20,000 वर्ष होती है, जिसके अंत में पृथ्वी पर महाप्रलय होता है। तत्पश्चात् सृष्टि की नवीन रचना शुरू होती है। चार वर्ण- हिन्दू समाज चार वर्णों में विभाजित है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। ये चार वर्ण प्रारम्भ में कर्म के आधार पर विभाजित थे। ब्राह्मण का कर्तव्य विद्यार्जन, शिक्षण, पूजन, कर्मकांड सम्पादन आदि है, क्षत्रिय का धर्मानुसार शासन करना तथा देश व धर्म की रक्षा हेतु युद्ध करना, वैश्यों का कृषि एवं व्यापार द्वारा समाज की आर्थिक आवश्यकताएँ पूर्ण करना तथा शूद्रों का अन्य तीन वर्णों की सेवा करना एवं अन्य ज़रूरतें पूरी करना। कालांतर में वर्ण व्यवस्था जटिल होती गई और यह वंशानुगत तथा शोषणपरक हो गई। शूद्रों को अछूत माना जाने लगा। बाद में विभिन्न वर्णों के बीच दैहिक सम्बन्धों से अन्य मध्यवर्ती जातियों का जन्म हुआ। वर्तमान में जाति व्यवस्था अत्यंत विकृत रूप में दृष्टिगोचर होती है। चार आश्रम- प्राचीन हिन्दू संहिताएँ मानव जीवन को 100 वर्ष की आयु वाला मानते हुए उसे चार चरणों अर्थात् आश्रमों में विभाजित करती हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। प्रत्येक की संभावित अवधि 25 वर्ष मानी गई। ब्रह्मचर्य आश्रम में व्यक्ति गुरु आश्रम में जाकर विद्याध्ययन करता है, गृहस्थ आश्रम में विवाह, संतानोत्पत्ति, अर्थोपार्जन, दान तथा अन्य भोग विलास करता है, वानप्रस्थ में व्यक्ति धीरे-धीरे संसारिक उत्तरदायित्व अपने पुत्रों को सौंप कर उनसे विरक्त होता जाता है और अन्तत: संन्यास आश्रम में गृह त्यागकर निर्विकार होकर ईश्वर की उपासना में लीन हो जाता है। चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- ये चार पुरुषार्थ ही जीवन के वांछित उद्देश्य हैं उपयुक्त आचार-व्यवहार और कर्तव्य परायणता ही धर्म है, अपनी बौद्धिक एवं शरीरिक क्षमतानुसार परिश्रम द्वारा धन कमाना और उनका उचित तरीके से उपभोग करना अर्थ है, शारीरिक आनन्द भोग ही काम है तथा धर्मानुसार आचरण करके जीवन-मरण से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही मोक्ष है। धर्म व्यक्ति का जीवन भर मार्गदर्शक होता है, जबकि अर्थ और काम गृहस्थाश्रम के दो मुख्य कार्य हैं और मोक्ष सम्पूर्ण जीवन का अंति लक्ष्य। चार योग- ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग तथा राजयोग- ये चार योग हैं, जो आत्मा को ब्रह्म से जोड़ने के मार्ग हैं। जहाँ ज्ञान योग दार्शनिक एवं तार्किक विधि का अनुसरण करता है, वहीं भक्तियोग आत्मसमर्पण और सेवा भाव का, कर्मयोग समाज के दीन दुखियों की सेवा का तथा राजयोग शारीरिक एवं मानसिक साधना का अनुसरण करता है। ये चारों परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि सहायक और पूरक हैं। चार धाम- उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम- चारों दिशाओं में स्थित चार हिन्दू धाम क्रमश: बद्रीनाथ, रामेश्वरम्, जगन्नाथपुरी और द्वारका हैं, जहाँ की यात्रा प्रत्येक हिन्दू का पुनीत कर्तव्य है। प्रमुख धर्मग्रन्थ- हिन्दू धर्म के प्रमुख ग्रंथ हैं- चार वेद (ॠग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद) तेरह उपनिषद, अठारह पुराण, रामायण, महाभारत, गीता, रामचरितमानस आदि। इसके अलावा अनेक कथाएँ, अनुष्ठान ग्रंथ आदि भी हैं। सोलह संस्कार मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक सोलह अथवा सत्रह पवित्र संस्कार सम्पन्न किये जाते हैं- इस प्रकार हिन्दू धर्म की विविधता, जटिलता एवं बहु आयामी प्रवृत्ति स्पष्ट है। इसमें अनेक दार्शनिकों ने अलग-अलग प्रकार से ईश्वर एवं सत्य को समझने का प्रयास किया, फलस्वरूप अनेक दार्शनिक मतों का प्रादुर्भाव हुआ।हिन्दू धर्म (संस्कृत: सनातन धर्म) विश्व के सभी धर्मों में सबसे पुराना धर्म है। ये वेदों पर आधारित धर्म है, जो अपने अन्दर कई अलग अलग उपासना पद्धतियाँ, मत, सम्प्रदाय, और दर्शन समेटे हुए है। अनुयायियों की संख्या के आधार पर ये विश्व का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है, संख्या के आधार पर इसके अधिकतर उपासक भारत में हैं और प्रतिशत के आधार पर नेपाल में है। हालाँकि इसमें कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन वास्तव में यह एकेश्वरवादी धर्म है। हिन्दी में इस धर्म को सनातन धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहते हैं। इण्डोनेशिया में इस धर्म का औपचारिक नाम “हिन्दु आगम” है। हिन्दू केवल एक धर्म या सम्प्रदाय ही नही है अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है ” हिंसायाम दूयते या सा हिन्दु “[ अर्थात् जो अपने मन, वचन, कर्म से हिंसा से दूर रहे वह हिन्दू है और जो कर्म अपने हितों के लिए दूसरों को कष्ट दे वह हिंसा है। नेपाल विश्व का एक मात्र आधुनिक हिन्दू राष्ट्र था (नेपाल के लोकतान्त्रिक आंदोलन के पश्चात् के अंतरिम संविधान में किसी भी धर्म को राष्ट्र धर्म घोषित नहीं किया गया है। नेपाल के हिन्दू राष्ट्र होने या ना होने का अंतिम फैसला संविधान सभा के चुनाव से निर्वाचित विधायक करेंगे)। हिन्दू धर्म का १९६०८५३११० साल का इतिहास हैं। भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र) की सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म के कई चिह्न मिलते हैं। इनमें एक अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, लिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं। इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के अनुसार इस सभ्यता के अन्त के दौरान मध्य एशिया से एक अन्य जाति का आगमन हुआ, जो स्वयं को आर्य कहते थे, और संस्कृत नाम की एक हिन्द यूरोपीय भाषा बोलते थे। एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं ही आर्य थे और उनका मूलस्थान भारत ही था। आर्यों की सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहते हैं। पहले दृष्टिकोण के अनुसार लगभग १७०० ईसा पूर्व में आर्य अफ़्ग़ानिस्तान, कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में बस गये। तभी से वो लोग (उनके विद्वान ऋषि) अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिये वैदिक संस्कृत में मन्त्र रचने लगे। पहले चार वेद रचे गये, जिनमें ऋग्वेद प्रथम था। उसके बाद उपनिषद जैसे ग्रन्थ आये। हिन्दू मान्यता के अनुसार वेद, उपनिषद आदि ग्रन्थ अनादि, नित्य हैं, ईश्वर की कृपा से अलग-अलग मन्त्रद्रष्टा ऋषियों को अलग-अलग ग्रन्थों का ज्ञान प्राप्त हुआ जिन्होंने फिर उन्हें लिपिबद्ध किया। बौद्ध और धर्मों के अलग हो जाने के बाद वैदिक धर्म मे काफ़ी परिवर्तन आया। नये देवता और नये दर्शन उभरे। इस तरह आधुनिक हिन्दू धर्म का जन्म हुआ। दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार हिन्दू धर्म का मूल कदाचित सिन्धु सरस्वती परम्परा (जिसका स्रोत मेहरगढ़ की ६५०० ईपू संस्कृति में मिलता है) से भी पहले की भारतीय परम्परा में है।हिन्दू धर्म में कोई एक अकेले सिद्धान्तों का समूह नहीं है जिसे सभी हिन्दुओं को मानना ज़रूरी है। ये तो धर्म से ज़्यादा एक जीवन का मार्ग है। हिन्दुओं का कोई केन्द्रीय चर्च या धर्मसंगठन नहीं है, और न ही कोई “पोप”। इसके अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं, और सभी को बराबर श्रद्धा दी जाती है। धर्मग्रन्थ भी कई हैं। फ़िर भी, वो मुख्य सिद्धान्त, जो ज़्यादातर हिन्दू मानते हैं, हैं इन सब में विश्वास : धर्म (वैश्विक क़ानून), कर्म (और उसके फल), पुनर्जन्म का सांसारिक चक्र, मोक्ष (सांसारिक बन्धनों से मुक्ति–जिसके कई रास्ते हो सकते हैं), और बेशक, ईश्वर। हिन्दू धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थायी मानता है। हिन्दू धर्म के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में आत्मा होती है। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है, और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। हिन्दू धर्म में चार मुख्य सम्प्रदाय हैं : वैष्णव (जो विष्णु को परमेश्वर मानते हैं), शैव (जो शिव को परमेश्वर मानते हैं), शाक्त (जो देवी को परमशक्ति मानते हैं) और स्मार्त (जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं)। लेकिन ज्यादातर हिन्दू स्वयं को किसी भी सम्प्रदाय में वर्गीकृत नहीं करते हैं। प्राचीनकाल और मध्यकाल में शैव, शाक्त और वैष्णव आपस में लड़ते रहते थे. जिन्हें मध्यकाल के संतों ने समन्वित करने की सफल कोशिश की और सभी संप्रदायों को परस्पर आश्रित बताया. संक्षेप में, हिन्‍दुत्‍व के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं-हिन्दू-धर्म हिन्दू-कौन?– गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवे च दृढ़ा मतिः। पुनर्जन्मनि विश्वासः स वै हिन्दुरिति स्मृतः।। अर्थात– गोमाता में जिसकी भक्ति हो, प्रणव जिसका पूज्य मन्त्र हो, पुनर्जन्म में जिसका विश्वास हो–वही हिन्दू है। मेरुतन्त्र ३३ प्रकरण के अनुसार ‘ हीनं दूषयति स हिन्दु ‘ अर्थात जो हीन ( हीनता या नीचता ) को दूषित समझता है (उसका त्याग करता है) वह हिन्दु है। लोकमान्य तिलक के अनुसार- असिन्धोः सिन्धुपर्यन्तायस्य,भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।। अर्थात्- सिन्धु नदी के उद्गम-स्थान से लेकर सिन्धु (हिन्द महासागर) तक सम्पूर्ण भारत भूमि जिसकी पितृभू (अथवा मातृ भूमि) तथा पुण्यभू ( पवित्र भूमि) है, ( और उसका धर्म हिन्दुत्व है ) वह हिन्दु कहलाता है। हिन्दु शब्द मूलतः फा़रसी है इसका अर्थ उन भारतीयों से है जो भारतवर्ष के प्राचीन ग्रन्थों, वेदों, पुराणों में वर्णित भारतवर्ष की सीमा के मूल एवं पैदायसी प्राचीन निवासी हैं। कालिका पुराण, मेदनी कोष आदि के आधार पर वर्तमान हिन्दू ला के मूलभूत आधारों के अनुसार वेदप्रतिपादित रीति से वैदिक धर्म में विश्वास रखने वाला हिन्दू है। यद्यपि कुछ लोग कई संस्कृति के मिश्रित रूप को ही भारतीय संस्कृति मानते है, जबकि ऐसा नही है। जिस संस्कृति या धर्म की उत्पत्ती एवं विकास भारत भूमि पर नहीं हुआ है, वह धर्म या संस्कृति भारतीय ( हिन्दू ) कैसे हो सकती है। 1. ईश्वर एक नाम अनेक 2. ब्रह्म या परम तत्त्व सर्वव्यापी है 3. ईश्वर से डरें नहीं, प्रेम करें और प्रेरणा लें 4. हिन्दुत्व का लक्ष्य स्वर्ग-नरक से ऊपर 5. हिन्दुओं में कोई एक पैगम्बर नहीं है, 6. धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर बार-बार पैदा होते हैं 7. परोपकार पुण्य है दूसरों के कष्ट देना पाप है. 8. जीवमात्र की सेवा ही परमात्मा की सेवा है 9. स्त्री आदरणीय है 10. सती का अर्थ पति के प्रति सत्यनिष्ठा है 11. हिन्दुत्व का वास हिन्दू के मन, संस्कार और परम्पराओं में 12. पर्यावरण की रक्षा को उच्च प्राथमिकता13. हिन्दू दृष्टि समतावादी एवं समन्वयवादी 14. आत्मा अजर-अमर है15. सबसे बड़ा मंत्र गायत्री मंत्र 16. हिन्दुओं के पर्व और त्योहार खुशियों से जुड़े हैं 17. हिन्दुत्व का लक्ष्य पुरुषार्थ है और मध्य मार्ग को सर्वोत्तम माना गया है 18. हिन्दुत्व एकत्व का दर्शन है

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      आप केवल एक बात का उत्तर दें. क्या इस लेख में हिंदू और हिंदुत्व का जो अर्थ दिया गया है वह ग़लत है?

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    • सुज्ञान

      नमस्कार,
      कृपया बताएं , इश्वर है या नहीं? इश्वर का संसार में हस्तक्षेप होता है या नहीं? और अगर होता है तो किस आधार पर? हमारे जीवन में इश्वर महत्तवपूर्ण या कर्म?
      धन्यवाद

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  3. बीनू भटनागर

    संसकृतियों का आपस मे समन्वय ,भाषा मे विभिन्न भाषाओं के शब्दों का विलय होता रहा है, होता रहेगा। उर्दू के कई शब्द हमारी भाषा का हिस्सा बन चुके है, बहुत सालों से प्रचिलित चीज़ो को हटाने की जगह देश की समस्याओं और निराकरण पर ध्यान देना ज़्यादा ज़रूरी है।

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  4. gulzar markam

    इस लेख से पता चलता है की आर्य ही इस देश के मूलनिवासी है बाकि सब विदेशी रहे है आर्यावर्त का छोटा सा राज्य बनाकर आर्य सरे देश के मूलनिवासियो को आर्य बनाने में लगे है जो गलत है अर्यो के आगमन के पहले यहाँ मूलनिवासियो का सनातन प्रक्रति धर्म रहा है वर्ण व्यवस्था विहीन समाज जो किसी ब्राह्मण को नहीं जनता था इस देश की मूल द्रविनियन भाषा समूह में इस शब्द का उल्लेख नहीं है !तथा आज भी मूलनिवासी समाज अपनी धर्म संस्क्रती को जंगलो में बचा कर रखा है ब्राह्मण व्यवस्था के लिए वहा कोई जगह नहीं ! तब आपका यह लेख कुछ अधुरा लगता है या जानबूझ कर प्रक्रति धर्म की व्याख्या नहीं की गई ये किसका धर्म है इसे कोण लोग मानते है !

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  5. आर. सिंह

    आर.सिंह

    हिंदू और हिंदुत्व के बारे में गहन विचार करने वालों से इस आलेख में उठाए प्रश्नो के उत्तर की अपेक्षा है.

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