आज मैं ऊपर, आसमां नीचे……

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demonstrations imageआजकल अपने मुहल्ले में हर दूसरा जीव प्रदर्शनकारी हो गया है। लगता है मुहल्ले वालों ने जैसे सारे काम छोड़ प्रदर्शन करने का  ठेका ले रखा हो। मेरे मुहल्ले का जीव देश के तमाम जीवों की तरह ऊपर से और किसी काम में पारंगत होकर आया हो या न, पर प्रदर्शन करने की कला और नारे लगाने के लिए सुहागे से धुला गला लेकर जरूर आया  है।

एक प्रदर्शन खत्म होने से पहले ही मेरे मुहल्ले के जुझारू बुद्धिजीवी  दूसरे प्रदर्शन को वैसे ही सुलगा लेते है जैसे कभी अपने बाबा एक बीड़ी खत्म होने से पहले ही उसी से दूसरी बीड़ी सुलगा लिया करते थे।  क्या मजाल जो हाथ की बीड़ी का धुंआ कम हो जाए आजकल के प्रदर्शनकारियों की तरह। ये दीगर बात है कि जिस तरह बाबा की बीड़ी से बीड़ी सुलगाने से सेहत खराब हुर्इ वैसा ही कुछ अपने  देश में भी हो रहा है।

अब अच्छा लगता है  कि प्रदर्शन विपक्ष की  खोली से बाहर आम लोगों तक आ पहुंचा है। अब प्रदर्शन केवल नेताओं की  बपौती नहीं रही ! अब प्रदर्षन पर नेताओं का ही खानदानी हक नहीं रहा।

सुबह कितनी ही कोशिश कर न जागने का  कितना ही कुप्रयास क्यों न करूं, फिर भी मुहल्ले वालों के बेसुरे नारे जागने के लिए विवश कर ही देते हैं। यार,  इतने साल हो गए नारे लगाते लगाते !  अबतो नारों में तनिक रस घोलो! लय सुर में नारा बोलो! माना, जिंदगी में कहीं सुर ताल नहीं, पर कम से कम नारों में तो सुर ताल लाओ!

अपने यहां कभी पानी के लिए सूखे  मटके सिर पर धरे  पानी वालों के खिलाफ  प्रदर्शन तो कभी बुझे बल्ब , बिजली के पंखे नचाते बंदों का बिजली वालों  के  खिलाफ  प्रदर्षन!  कभी सारा दिन पीपल की छांव में ताष खेलने वालों का  सरकार की रोजगार नीति के खिलाफ प्रदर्शन तो कभी  सरकारी राशन की दूकान  का राशन लाला की दूकान पर चोरी से जनता की आंख बचा कर  भाग आने पर प्रदर्शन! प्रदर्शनों की इस अनवरत पंरपरा को देख अब मैं दावे से कह सकता हूं कि मेरे देश में  आने वाले दिनों में कोर्इ परंपरा जीवित रहे या न, पर प्रदर्शन की परंपरा हल हाल में आने वाली सदियों तक जीवित रहेगी।

प्रदर्शन की परंपरा को जिंदा रखते हुए कल सुबह फिर अपने मुहल्ले में प्रदर्शन हुआ।  ध्यान से  देखा तो अपने मुहल्ले के आदरणीय सट्टेबाज  जुलूस में! सोचा नहीं था कि सट्टेबाज यों खुलकर सड़क पर आ धमकेंगे।  पर  फिर सोचा कि इस देश में सभी को सबकुछ खुलकर करने का हक जो है। पता नहीं क्यों  रहा नहीं गया तो गला साफ कर मैंने अपने सबसे करीबी सट्टेबाज से दबी जुबान में पूछा,’ भार्इ साहब ये क्या? आप भी  दर्शन से प्रदर्शन  पर उतर आए।  तो वे गला फाड़ कर बोले ,’ क्या करें! इस देश में जब तक  हम जैसे आदर्श  नागरिक सड़क पर न निकलें तो सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।  अरे सट्टेबाजी करते हैं तो करते हैं ! कोर्इ डाका तो नहीं डालते।  किसीके पेट पर लात तो नहीं मारते!  जिसका भी भरते हैं पेट ही  भरते हैं !  और ऐसा भरते हैं कि…

‘ वह तो ठीक है पर…

‘पर वर क्या! चूडि़यां तो हमने भी नहीं पहन रखी हैं! सरकार बनाने और चलाने की हिम्मत रखते हैं हम!

‘सो तो सब जानते है , फिर भी आप लोग चाहते क्या हो? सट्टे का दिया आपके पास भगवान की दया से सबकुछ तो है !

‘हम चाहते हैं कि सरकार सट्टेबाजी को  और बाजियों की तरह वैध घोषित करे ताकि हम इज्जत के साथ….’

‘अरे साहब! छोड़ो ये वैध, अवैध का चक्कर ! अपने समाज में क्या इज्जत क्या बेइज्जती! जो जितना नंगा वो उतना ही चंगा!  काम चल तो रहा है न! चलने दो!  वैध- अवैध के चक्कर में फंस क्यों अपना दिमाग खराब करते हो? इस देष में जो वैध है असल में वही अवैध है।  और जो अवैध है परोक्ष में वही वैध है।

‘तो?? पर हम तो  डीसी साहब को ज्ञापन देने जा रहे थे।

‘ अरे छोड़ो ये सब!  बेकार में  क्यों कागज और समय क्यों फोका करते हो! अगले मैच में सटटे की जुगत लडा़ओ! किसीसे  एक बाल पर दस रन दिलवाओ तो किसीकोे बिन गेंद के ही आउट करवाओे! ये प्रदर्षन वरदर्षन आप जैसे गणमान्यों को षोभा नही देता। ये तो निचले तबके वालों यार है।

पहली बार किसीने मेरा कहा माना! सच कहूं, आज मैं  ऊपर आसमां नीचे!

अशोक गौतम

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जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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