तो क्या ट्रायल कोर्ट सर्वोच्च न्यायालय से बड़ा है

वीरेन्द्र सिंह परिहार

2 जी स्पेक्ट्रम मामले में सी.बी.आई. की विशेष अदालत का फैसला जिसमे ए. राजा और काणिमोझी समेत अन्य आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया गया, एक बहुत ही आश्चर्यजनक फैसला है। इतना आश्चर्य जनक कि देश के बहुत से लोग इस फैसले को लेकर सन्न हैं। ऐसा इसलिये कि सर्वोच्च न्यायालय ने इसे एक घोटाला ही माना था। इसलिये सर्वोच्च न्याालय ने ए. राजा के समय आवंटित किये गये 122 लाइसेन्स निरस्त ही नहीं कर दिये थे बल्कि कई कंपनियों पर पांच-पांच करोड़ का जुर्माना भी लगाया था और इस प्रकरण को लेकर बहुत गंभीर टिप्पणियां की थी। अब भले ट्रायल कोर्ट के फैसले के चलते काग्रेस पार्टी और द्रमुक पार्टी के लोग कहे कि कोई घोटाला हुआ ही नहीं था । पर सर्वोच्च न्यायालय ने तो इसे घोटाला माना था, तभी तो ए.राजा और काणिमोझी को लम्बे समय तक जेल मे रहना पड़ा था। पर कांग्रेस पार्टी तो इस ट्रायल कोर्ट के फैसले की आड़ में जाने क्या नही कह रही है। जैसे इसी प्रकरण के झूंठे प्रचार के चलते भाजपा को केन्द्र में सत्ता मिल गई हो, और कांग्रेस को विपक्ष मे बैठना पड़ा हो। बात इतने तक ही नहीं रही, कांग्रेस पार्टी ने तो कुछ ऐसा हो हल्ला मचाया कि जैसे किसी षड़यंत्र के तहत निराधार इस प्रकरण को प्रचारित किया गया हो। यहां तक कि संवैधानिक संस्था कैग के तत्कालीन महालेखाकार विनोद राय को भाजपा का एजेन्ट घोषित कर दिया। मान लीजिये यदि ट्रायल कोर्ट इन्हें दोषसिद्व पाता तो कंाग्रेस और द्रमुक पार्टी कहते कि यह कोई अंतिम अदालत थोड़े ही है, अभी तो उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय हैं। लेकिन दोषमुक्त के निर्णय के बाद ये लोग कुछ ऐसा बोल रहे हैं कि जैसे ट्रायल कोर्ट ही सब कुछ हो और उन्होंनें महाभारत की लड़ाई जीत ली हो। शायद ये लोग यह भूल गये कि तमिलनाडु़ की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री जयललिता एवं शशिकला को उच्च न्यायालय ने आय से अधिक सम्पत्ति मामले में दोषमुक्त घोषित कर दिया था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें दोषी पाया, जिसके चलते जयललिता के बाद तामिलनाड़ु की सबसे ताकतवर महिला शशिकला जेल की सीखंचों में रहने को बाध्य हैं।

उल्लेखनीय बात यह कि ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में जांच एजेंसियों को कठघरे में खड़ा किया है। यह कहा है कि पूरा अभियोजन दिशाहीन था और सी0बी0आई0 को यही पता नहीं कि वह चाहती क्या है? ऐसा होना कुछ हद तक संभव है क्योंकि सी0बी0आई0 द्वारा वर्ष 2011 में जब यह चार्जशीट प्रस्तुत की गई थी तो यू.पी.ए. का शासन था और उस दौर में सर्वोच्च न्यायालय के ही अनुसार सी0बी0आई0 की हैसियत एक तोते की थी। पर बड़ी बात यह कि ट्रायल कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी लिखा है कि सी0बी0आई0 यह प्रमाणित करने में असफल रही कि जो दो सौ करोड़ रूपये कलगैनर टी.वी. में आये उनका कोई संबंध 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले से तथाकथित लाभ से है। वस्तुतः यहीं पर ट्रायल कोर्ट का सारा फैंसला संदिग्ध हो जाता है। क्योंकि एक तो ट्रायल कोर्ट यह मान रही है कि घोटाला हुआ, दूसरे लाभार्थी कंपनी द्वारा कलैगनर को 200 करोड़ रूपये स्थानान्तरण किये गये। निःसंदेह यह टी0बी0 चैनल द्रमुख प्रमुख की बेटी काणिमोझी का था और परिस्थिति जन साक्ष्य यह पूरी तरह साबित कर रहे हैं, कि यह रूपये नाजायज लाभ दिये जाने के चलते आये। कानून का एक प्रसिद्ध सिद्वान्त है, ‘‘जहां कुछ दिख जाता है तो बाकी का अनुमान कर लिया जाता है। वैसे भी ऐसी स्थिति में यह साबित करने का भार अभियुक्तों का था कि कलैगनर टी0वी0 में उनके हक में आई राषि का संबंध उनके द्वारा किसी कंपनी को नाजायज लाभ पहुंचाने से नहीं है। कहने का आशय यह कि यदि कोई जीती मक्खी निगल जाता है तो उसका उपचार ही क्या है? हकीकत यह है कि जीवन के दूसरे क्षेत्रों की तरह न्यायपालिका में भी भ्रष्ट जजों का अभाव नहीं है। इसलिये यह कहने में कोई झिझक नहीं कि इस मामले में इधर-उधर की बातें कर आरोपियों को बचाया गया। जहां तक आरोप सिद्व होने का सवाल है तो कितने भी पुष्ट साक्ष्य होने पर कोई अदालत जिसे न्याय नहीं करना है, कह देती है कि आरोप सिद्व नहीं है। जबकि इस प्रकरण में अधिकांश दस्तावेजी साक्ष्य थे। बेहतर होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में स्वतः संज्ञान ले और न्यायपालिका में मौजूद काली भेड़ों की पहचान कर उन्हें बाहर करें।

इधर लालू यादव को जब तक रांची की विशेष अदालत द्वारा सजा घोषित नहीं की गई थी, तब तक उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा था। पर 23 दिसम्बर को न्यायालय द्वारा उन्हें दोषी पाये जाने पर वह न्यायालय अवमानना के डर से न्यायपालिका के विरूद्ध प्रत्यक्ष में तो कुछ नहीं कह पाये, पर वह भाजपा के लिये गाली-गलौज की भाषा पर उतर आये। जबकि भाजपा का इस प्रकरण से कुछ खास लेना देना नहीं है क्योंकि यह सारा प्रकरण उच्च न्यायालय की देखरेख में चला था। पर घोटाला करते वक्त लालू यादव को लगा होगा कि इस देश मे सब चलता है, तभी तो बिहार के मुख्यमंत्री रहते चारा घोटाला के अलावा 2004 से 2009 के मध्य रेलमंत्री रहते हुये भी उन्होनें कई ऐसे कारनामे कर डाले कि पत्नी और बच्चे भी अन्ततः जेल जाने से बच नहीं पायेंगे। दर असल मोदी सरकार के दौर में जैसा कि प्रधानमंत्री कहते हैं कि कोई लुटेरा बचने वाला है नहीं। ऐसी स्थिति में देश को जिन्होनें जागीर समझकर लूटा उनके लिये भाजपा और मोदी ही सारी समस्या की जड़ हैं। लालू यादव के लिये इतना ही कहा जा सकता है कि ‘‘जो जस करहुं तो तस फल चाखा।’’ तो ए.राजा और काणिमोझी के लिये भी ट्रायल कोर्ट द्वारा मुक्त किया जाना ‘‘चार दिन की चांदनी’’ ही हो सकती है। सबसे बड़ी बात यह कि चाहे कांग्रेस पार्टी हो या लालू यादव या कोई और-ऐसे मामलों में उनका दुहरा मापदंण्ड कतई उचित नहीं कहा जा सकता। यानी यदि किसी स्तर पर या तकनीकी कारणों से छूट गये तो उनके सारे पाप धुल गये और यदि दोषी घोषित हो गये तो सांय – पटाय बकने लगंे।

1 thought on “तो क्या ट्रायल कोर्ट सर्वोच्च न्यायालय से बड़ा है

  1. सब में ज्यादा भ्रष्टाचार है जूडीशियल में जैसे फैसला आना हो बदल देते है जज या छुटियाँ लगा देते फर्जी बाडा बहुत है कुछ पूछ भी नही सकते।ऐसा होता है क्या न्यायालय जो एक पक्ष को छुट्टी दे दे कर बचाता रहे।

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