ताकि मासूम बचपन खुशहाली से भर उठे

आक्रमण के शिकार हुए मासूम बच्चों का अंतरराष्ट्रीय दिवस- 4 जून, 2021
-ललित गर्ग-
पूरे विश्व में 4 जून को आक्रमण के शिकार हुए मासूम बच्चों का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाते हुए देश एवं दुनिया के मासूम बच्चे जो शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और घरेलू शोषण का शिकार हुए हैं, उन्हें उनके कानूनों के प्रति जागरूक किया जाता है एवं उनकी खुशहाल जिन्दगी को सुनिश्चित किया जाता है। दुनिया में सभी जगहों पर बच्चों को देश के भविष्य की तरह देखते थे। लेकिन उनका यह बचपन रूपी भविष्य आज हिंसा, शोषण, यौन विकृतियों, अभाव, उपेक्षा, नशे एवं अपराध की दुनिया में धंसता चला जा रहा है। बचपन इतना उपेक्षित, प्रताड़ित, डरावना एवं भयावह हो जायेगा, किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। आखिर क्या कारण है कि बचपन बदहाल होता जा रहा है? बचपन इतना उपेक्षित क्यों हो रहा है? बचपन के प्रति न केवल अभिभावक, बल्कि समाज और सरकार इतनी बेपरवाह कैसे हो गयी है? ये प्रश्न आक्रमण के शिकार हुए मासूम बच्चों के दिवस को मनाते हुए हमें झकझोर रहे हैं।
यह दिवस बच्चों के अधिकारों एवं जीवन-सुरक्षा से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसकी स्थापना 19 अगस्त 1982 को हुई थी। इसकी आवश्यकता मूल रूप से 1982 लेबनान युद्ध के पीड़ित बच्चों पर केंद्रित है। बड़ी संख्या में निर्दोष लेबनानी और फिलिस्तीनी बच्चे इस्राइल द्वारा किए गए आक्रामक कृत्यों के शिकार हुए थे। हाल के वर्षों में, कई संघर्ष एवं युद्ध क्षेत्रों में, कोरोना महामारी के कारण बच्चों के खिलाफ उल्लंघन की संख्या में वृद्धि हुई है। संघर्ष, युद्ध, हिंसा एवं महामारियों से प्रभावित देशों और क्षेत्रों में रहने वाले 250 मिलियन बच्चों की सुरक्षा के लिए और अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। हिंसक अतिवादियों द्वारा बच्चों को निशाना बनाने से बचाने के लिए और अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार कानून को बढ़ावा देने के लिए और बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए और अधिक प्रयासों एवं संकल्पों की जरूरत है ताकि बच्चों के बेहतर भविष्य को सुरक्षित एवं सुनिश्चित किया जा सके। नए एजेंडे में पहली बार बच्चों के खिलाफ हिंसा के सभी रूपों को समाप्त करने के लिए एक विशिष्ट लक्ष्य शामिल था, और बच्चों के दुव्र्यवहार, उपेक्षा और शोषण को समाप्त करने के लिए कई अन्य हिंसा-संबंधी लक्ष्यों को मुख्यधारा में शामिल किया। विश्वस्तर पर बालकों के उन्नत जीवन के ऐसे आयोजनों के बावजूद आज भी बचपन उपेक्षित, प्रताड़ित एवं नारकीय बना हुआ है, आज बच्चों की इन बदहाल स्थिति की प्रमुख वजहें है, वे हैं-सरकारी योजनाओं का कागज तक ही सीमित रहना, बुद्धिजीवी वर्ग व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता, इनके प्रति समाज का संवेदनहीन होना एवं गरीबी, शिक्षा व जागरुकता का अभाव है।
जयपुर की चाइल्ड लाइन संस्था बच्चों को मुस्कान देने के प्रयास में जुटी है। उसके डायरेक्टर कमल किशोर के अनुसार भारत में 4 करोड़ बच्चे घरेलू हिंसा के शिकार हैं। यह तमाम बच्चे घरेलू हिंसा के कारण घरों से पलायन कर फुटपाथ या सड़क पर रहने को मजबूर हैं। घरेलू हिंसा से प्रताड़ित होकर मासूम बच्चे अपने घरों को छोड़ देते हैं और फिर इनकी जिंदगी नरक से कम नहीं होती है। देश एवं दुनिया का मासूम बचपन आज भी तरह-तरह से पीड़ित एवं प्रताड़ित है। हम किसी गली, चैराहे, बाजार, सड़क और हाईवे से गुजरते हैं और किसी दुकान, कारखाने, रैस्टोरेंट या ढाबे पर 4-5 से लेकर 12-14 साल के बच्चे को टायर में हवा भरते, पंक्चर लगाते, चिमनी में मुंह से या नली में हवा फूंकते, जूठे बर्तन साफ करते या खाना परोसते देखते हैं और जरा-सी भी कमी होने पर उसके मालिक से लेकर ग्राहक द्वारा गाली देने से लेकर, धकियाने, मारने-पीटने और दुव्र्यवहार होते देखते हैं। लेकिन कब तक हम बचपन को इस तरह बदहाल, प्रताड़ित एवं उपेक्षा का शिकार होने देंगे।
बच्चे बहुत अच्छे लगते हैं जब वे हँसते-मुस्कुराते हैं। बच्चे यदि तनावरहित रहते हैं तो चारों तरफ खुशी का माहौल बन जाता है। क्या आपने कभी सोचा है कि बच्चे भी पीड़ा महसूस करते हैं। यह पीड़ा शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक किसी भी तरह के शोषण से पैदा होती है। बच्चे खुश, स्वस्थ और सुरक्षित होने चाहिए। उन्हें जाने-अनजाने में भी कोई पीड़ा नहीं दी जानी चाहिए। बच्चों की खुशी में देश का उज्ज्वल भविष्य छुपा है। एक घर जहां पर मासूम बच्चा अपने माता-पिता के साथ रहता है, वह उसके लिए दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह मानी जाती है। लेकिन यदि उसी घर में उस मासूम को प्रताड़ना दी जाए और उसका शोषण किया जाए तो फिर वही घर उस मासूम के लिए किसी कैद से कम नहीं है।
घरेलू हिंसा के अनेक प्रकार हैं, जिसमें से सबसे प्रमुख प्रकार पिता की ओर से नशे में या फिर किसी अन्य कारण के चलते मासूम बच्चों और पत्नी के साथ मारपीट करना है। इसके साथ ही सौतेले पिता या सौतेली माता की ओर से बच्चों का शोषण करना या फिर उन्हें प्रताड़ना देना है। कोरोना महामारी में ऐसी घटनाएं बढ़ी है। इन प्रकरणों में परिवार का सदस्य ही गुनहगार होता है। मासूम बच्चियों और मासूम बच्चों के साथ होने वाले शारीरिक शोषण के प्रकरण में परिवार, रिश्तेदार या निकट संबंध का ही कोई व्यक्ति आरोपी होता है। ऐसे में लोकलाज के चलते परिवार के अन्य सदस्यों की ओर से मासूम बच्चों के साथ होने वाले शोषण को छिपाया जाता है।
एकल परिवार अनेक तरह के तनाव से ग्रसित होने पर मासूम बच्चों को अपना निशाना बनाते हैं। उन्हें विभिन्न तरह से प्रताड़ित करते हैं या फिर उनका शोषण करते हैं। बच्चों से लाड-प्यार व दुलार-पुचकार कर उनसे हंसी-खेल करके खुद क्षणिक रूप से बच्चों जैसा बन जाने से तो शायद हर किसी का मन भी आनंदित और तरोताजा हो जाता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के मन में एक बचपना छिपा होता है, जिससे बच्चों को प्यार करने से इसकी तृप्ति होती है। यह आनंद मनुष्य का स्वस्थ मानसिक भोजन होता। परन्तु आप को जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ लोग इस मानसिक भोजन के अस्वस्थ रूप से ही तृप्त व आनंदित होते हैं। ऐसे लोग बच्चों को प्यार दुलार कि बजाय उनका यौन शोषण व यातनाएं देकर संतुष्ट व आनंदित होते है और धीरे-धीरे यह मनोविकृति एक मादक-लत के रूप में हावी होकर ‘पीडोफिलिया’ नामक मनोरोग का रूप ले लेता है। इस मनोरोग से ग्रसित लोगों से मानव समाज को खतरा होने कि सम्भावना बनी रहती है तथा जिसका शिकार मुख्यतः मासूम बच्चे होते हैं। ‘पीडोफिलिया’ से ग्रसित व्यक्ति मासूम बच्चों को क्रूरतम मानसिक व शारीरिक यातनाएं देने में आनंद की प्राप्ति करता है तथा उसके लिए यह एक ऐसा नशा बन जाता है कि वह बच्चों को यातनाएं देने कि क्रूरतम विधियां इजाद करता जाता है जिसमें बच्चो के साथ सेक्स, शरीर को चोटिल करना-काटना, जलाना, यहाँ तक कि उनके टुकडे-टुकडे कर उनके मांस तक खाना शामिल है। कुछ देशों में बच्चांे को ऊंट की पीथ पर बान्धकर ऊटों को दौड़ाया जाता है जिससे बच्चे कि चीत्कार- चीख से वहां के लोग आनन्द की प्राप्ति करते हैं, यह भी पीडोफिलिया का ही एक उदाहरण है। इन क्रूर एवं अमानवीय स्थितियों का मासूम बच्चों पर भारी दुष्प्रभाव पड़ता है और इन कमजोर नींवों पर हम कैसे एक सशक्त दुनिया की कल्पना कर सकते हैं?
इस तरह एक स्वस्थ बाल मस्तिष्क विकृति की अंधेरी और संकरी गली में पहुँच जाता है और अपराधी की श्रेणी में उसकी गिनती शुरू हो जाती हैं। बच्चे अपराधी न बने, उन्हें उन्नत नागरिक बनाये जाये, इसके लिए आवश्यक है कि अभिभावकों और बच्चों के बीच बर्फ-सी जमी संवादहीनता एवं संवेदनशीलता को फिर से पिघलाया जाये। फिर से उनके बीच स्नेह, आत्मीयता और विश्वास का भरा-पूरा वातावरण पैदा किया जाए। ताकि इस बिगड़ते बचपन और भटकते राष्ट्र के नव पीढ़ी के कर्णधारों का भाग्य और भविष्य उज्ज्वल हो सकता है।

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