सोचो मत ऐसा कुछ भी नहीं !

सोचो मत ऐसा कुछ भी नहीं
अपनी दृष्टि का फेर सभी;
पाषाण औ पौधे पूर्ण सुधी,
ना हीन भाव उर धारो जी !

तुम ब्रह्म बृहत सृष्टि देखो,
कर्मों को कर जीवन झाँको;
अपनापन जग पा जाओगे,
जब ऊर्द्ध्व भाव रम जाओगे !

क्यों जाति पाँति में बँधकर तुम,
श्रँखला सँजोये स्वयं रहे;
अपनी आस्था से हेय हुए,
हरि का तुम कब हो ध्यान किये !

केवल पद वैभव को लपके,
कैवल्य कहाँ तुम चख पाए;
अपनी द्योति दुर्बल समझे,
झिझके सहमे हो जग धाये !

तुम ही मालिक तारक जगती,
यह समझ कहाँ तुमको आई;
हर ‘मधु’ मानस की आत्मा मिल,
देखो तुम प्रभु की परछाईं !

गोपाल बघेल ‘मधु’

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