जन-जन को जगाता “सोशल मीडिया”

राष्ट्रीय उपलब्धियों,समस्याओं और अन्य समाचारों का प्रसार व प्रचार करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में समाचार पत्रों व टीवी न्यूज चैनलों का वर्षो से विशेष योगदान बना हुआ है। उसी कड़ी में बढ़ते संचार संसाधनों के कारण ट्विटर,फेसबुक व व्हाट्सऐप आदि की जन जन तक पहुँच होने से बढ़ते संवादों ने सोशल मीडिया को भी बहुत उपयोगी बना दिया है। यह सोशल मीडिया के जनसंवाद से उपजे जनमत का भी परिश्रम था कि एक सामान्य निर्धन परिवार से सम्बंधित श्री नरेंद्र मोदी को भारत जैसे महान राष्ट्र का नेतृत्व करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लोकतंत्र में ऐसे बड़े परिवर्तन उस लोकतांत्रिक देश के निवासियों की राष्ट्रीय वेदना और चेतना का परिचय कराती है। सन् 2014 में सत्ता परिवर्तन देशवासियों की वेदना का परिणाम था। उसी सामुहिक वेदना ने सन्  2019 में सम्भवतः सामुहिक चेतना का रूप ले कर मोदी जी को राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए पुनः चुना।
पिछले वर्ष अनेक राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के पश्चात उत्पन्न कठिन परिस्थितियों का धैर्यपूर्वक सामना करते हुए केंद्रीय नेतृत्व के आगे बढ़ने का अपार साहस राष्ट्रवादियों का भी उत्साहवर्धन करता रहा। राष्ट्रवादियों में यह विश्वास बना कि उनकी सामुहिक राष्ट्रीय व धार्मिक पीड़ाओं को धीरे-धीरे कम करने के सार्थक प्रयास होने लगे हैं। राजनीति व राजनेता को स्वस्थ दृष्टि से न देखने वालों में अब राजनीति के प्रति सकारात्मक भाव बनने से सामाजिक चेतना भी परिलक्षित हो रही है। इस चेतना का एक परिणाम यह भी है कि  26.11.2008 में हुए मुम्बई आतंकी हमलों की 12 वीं वर्षगांठ पर देश-विदेश से एक स्वर में इस्लामिक आतंकवाद के प्रति रोष और उस कांड में हुए समस्त बलिदानियों के प्रति श्रद्धा पूर्वक नमन के व्यापक समाचार आये हैं। यह सभ्य समाज की जागरूकता व आतंकवाद के प्रति आक्रोश का स्पष्ट प्रमाण है। इतना ही नहीं हमारे छोटे-बड़े राजनेताओं ने भी इस अवसर पर पाकिस्तान सहित इस्लामिक आतंकवाद की भरपूर निंदा करके राष्ट्रभक्तों को प्रभावित किया है।
यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वर्षों पूर्व लव जिहाद को नकारने वाले बड़े-बड़े राजनेता आज देशवासियों की निरंतर पीड़ाओं को संज्ञान में लेकर उसके विरुद्ध कठोर कानून बनाने की मांग को उचित ठहरा रहे हैं। इसके अंतर्गत अनेक प्रदेशों में लव जिहाद व धर्मांतरण सम्बंधित कठोर कानून बनाये जा रहे है।इसी प्रकार आतंकवाद को इस्लामिक कह कर परिभाषित करने में संकोच करने वाले अब खुल कर इस्लामिक आतंकवादियों का विरोध करने लगे हैं। 
यह भी जनमत की शक्ति का सुखद परिणाम है जिसने सोशल मीडिया का सदुपयोग करके जिहाद के लिए दशकों से बार-बार होने वाले इस्लामिक अत्याचारों और आतंकवादी घटनाओं की सच्चाई को जनसंवाद बना कर नित्य संचार करके चर्चा में बनाये रख कर राष्ट्रवाद को जगाये रखा है। क्या वर्तमान शासन से पूर्व कभी हमारी सरकार ने घुसपैठ करके हमारी धरती को लहूलुहान करने वाले आतंकियों के विरुद्ध कोई आक्रामक अभियान चलाया था? हमारे सुरक्षा बलों को बलिदान होता रहा और जिहाद फलता फूलता रहा परन्तु तत्कालीन शासन मौन रहा परिणामस्वरूप हमारी वेदनाओं का संज्ञान न लेने वालों को देशवासियों ने उनके ऐसे पापों के लिए सत्ता से बाहर करके दंडित किया ।
यह विचार करना भी आवश्यक होगा कि समाज व राष्ट्र को निरंतर क्षति पहुँचाने वाले दुर्जनों के अतिरिक्त उन सज्जनों का भी उस क्षति में अप्रत्यक्ष सहयोग रहा जो उदासीन व निष्क्रिय रहते हैं। क्या यह सोचना गलत होगा कि हमारे देश में विचारों की विभिन्नता होते हुए भी विचार शून्यता की समस्या अधिक व्यापक है? इसके लिए भी सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का एक सार्थक माध्यम बनता जा रहा है। राष्ट्रभक्ति जय-जय कार करने व झंडा लहराने के साथ-साथ और भी रचनात्मक कार्यो को करने से सार्थक होती है। यह अब सोशल मीडिया के द्वारा भी संचारित व अभिप्रेरित हो रही है। जिसका सुखद परिणाम यह है कि अनेक किन्तु-परन्तुओं के बाद सज्जन शक्ति सक्रिय हो गई है और देश में अच्छे व बुरे कार्यों को समझ कर उस पर अपने-अपने अनुसार प्रतिक्रिया करके संतुष्ट हो रही हैं। किसी ने ठीक ही कहा था कि “निरंतर चलती चींटी भी ऊंघते बैल से अधिक कार्य कर लेती है।”  तभी तो गलत को गलत कहने का साहस करने में सज्जनों की सोच बड़ा महत्व रखती है।हमारी संस्कृति विंध्वस करना नहीं निर्माण करने का मार्ग प्रशस्त करती है,परंतु विंध्वसकारियों को दंडित करने का भी आह्वान करती है।
ध्यान रहे कि यह देश हम सबका है इसलिये इसकी अखंडता व संप्रभुता की रक्षा का सर्वोच्च दायित्व भी हम राष्ट्रवादियों का ही है। यह मानना व कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया के जनसंवाद निरन्तर शासन-प्रशासन के कार्यों को विशेष प्रभावित करते है। शासकीय कार्यों की प्राथमिकता व सक्रियता का निश्चय करने में भी मीडिया जगत की भूमिका झलकती है। इस चेतना को बनाये रखने के लिए राष्ट्रीय जनमत को निरंतर सक्रिय रहना ही होगा। शासन व प्रशासन के मनोबल और उत्साह को बनाये रखकर ही राष्ट्रीय समस्याओं का निराकरण सम्भव हो सकेगा।
देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को सुरक्षित रखने के लिए “सामान नागरिक संहिता”, “जनसंख्या नियंत्रण कानून” एवं “अल्पसंख्यक आयोग” व “अल्पसंख्यक मन्त्रालय” जैसी  मुख्य समस्याएं अभी भी केंद्रीय शासन के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।अतः राष्ट्रवादियों को जन-जन को जगाने के लिए पत्रकारिता जगत के अतिरिक्त सोशल मीडिया के माध्यम से भी ऐसी विभिन्न समस्याओं को जनसंवाद द्वारा चर्चा का विषय बना कर राष्ट्रहित में निरन्तर अपनी प्रभावशाली भूमिका को बनाये रखना ही होगा।

विनोद कुमार सर्वोदय

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