“राजा महेन्द्र प्रताप के देश की आजादी में बलिदान के कुछ विस्मृत प्रसंग”

मनमोहन कुमार आर्य

देश को आजाद कराने में अनेक देशभक्त वीरों ने अपना जीवन बलिदान किया है। इन बलिदानी वीरों के परिवारों ने भी किसी से कोई कम बलिदान नहीं किये हैं। उनकी ओर प्रायः किसी का ध्यान ही नहीं जाता। प्रस्तुत लेख में राजा महेन्द्र प्रताप जी व उनकी धर्मपत्नी के बीच संवाद से उसका कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। देश की आजादी के बाद देश के कर्णधारों ने जनता को यह बताया कि देश अहिंसा से आजाद हुआ है। बहुत से विवेकशील लोग इसे सत्य नहीं मानते। हमने आज ही एक अधिकारी व्यक्ति जनरल बख्शी के श्रीमुख से सुना कि नेता जी की आजाद हिन्द फौज के 70 हजार सिपाहियों में से 26 हजार को अपनी शहादत देनी पड़ी थी। सन् 1857 के प्रथम स्वातन्त्र्य आन्दोलन में भी हजारों व लाखों लोगों का बलिदान हुआ था। आजादी के आन्दोलन में पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा व नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सहित वीर सावरकर, लाला लाजपतराय, लाला हरदयाल, राम प्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, मदन लाल ढ़ीगरा, ऊधम सिंह आदि देशभक्तों व शहीदों के बलिदानों को भुलाया नहीं जा सकता। कुछ विवेकशील विद्वान यह मानते हैं कि देश को आजादी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के कार्यों से मिली थी। यदि यह क्रान्तिकारी अंग्रेजों को चुनौती न देते और उन्हें इनसे जानमाल का डर न होता तो वह भारत को कभी आजाद न करते। आर्यसमाज के विद्वान प्रा. अनूप सिंह जी भी अपने प्रवचनों में कहा करते थे कि देश को आजादी हिंसा से नहीं खून देकर मिली थी। क्रान्तिकारी बलिदानियों की परम्परा मे एक बलिदानी थे राजा महेन्द्र प्रताप। इनके जीवन की घटनाओं का विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है। हमें ऋषि दयानन्द भक्त आचार्य सत्यप्रिय शास्त्री जी की पुस्तक भारतीय स्वातन्त्र्य संग्राम में आर्यसमाज का योगदान से जो संक्षिप्त विवरण मिला है, उसे हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

देश की स्वाधीनता के आन्दोलन में पदार्पण कर उसके लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले देशभक्त आर्यवीरों में राजा महेन्द्र प्रताप का नाम आता है। राजा जी को अपना राजनैतिक तथा स्वाधीनता प्राप्ति का मार्ग निर्धारण करने में आर्यसमाज का वातावरण तथा विचारधारा ही सहायक रही है। आर्यसमाज जब अपने आरम्भिक काल में राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं की स्थापना में संलग्न था तब राजा महेन्द्र प्रताप जी ने वृन्दावन में स्थित अपनी भूमि का एक बड़ा हिस्सा बगीचे सहित आर्यसमाज को दान में दिया था। आज उसी भूमि पर गुरुकुल विश्वविद्यालय वृन्दावन जैसी विशाल संस्था खड़ी है। आर्यसमाज के राजनैतिक सन्त स्वामी सोमदेव जी महाराज देश की आजादी के प्रमुख बलिदानी पं. रामप्रसाद बिस्मिल के गुरु प्रेरक थे।

 

आगरा की आर्य मित्र सभा के वार्षिकोत्सव पर स्वामी सोमदेव जी के व्याख्यानों को श्रवण कर राजा महेन्द्र प्रताप जी बड़े मुग्ध हुये। राजा साहब ने आपके पैर छूए और आपको अपनी कोठी पर लिवा ले गये। उस समय से राजा साहब बहुधा आपके उपदेश सुना करते थे और आपको अपना गुरु मानते थे। (अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की आत्म कथा)।

 

आर्यसमाज के इन अलमस्त फकीरों के चरणों में बैठकर ही राजा महेद्र प्रताप जी ने भारत की स्वाधीनता के तराने सीखे थे। इसी स्वाधीनता की मस्ती के कारण आपको अपनी रियासत तथा अन्य सभी भौतिक सम्पत्ति से भी हाथ धोने पड़े थे। एक दिन रात के बारह बजे ही अचानक आपने देश छोड़ने की तैयारी कर ली। सामने ही नव विवाहिता पत्नी खड़ी थी। राजा साहब उसे समझा रहे थे कि देवी! यह जवानी विषय भोगों में गंवाने की चीज नहीं है। आज बन्धन में पड़ी भारत माता देश की जवानियों की ओर अधीरता भरी नजरों से देख रही है। अतः यदि आज यह मेरी जवानी देश की स्वाधीनता के काम जावे तो इसमें जहां मेरा जन्म सफल है वहां उससे भी अधिक बढ़कर तुम्हारा जन्म धन्य होगा और आने वाली कल की पीढ़ियां तुम्हारे इस योगदान के यश का गुणगान करेंगी। देवी ने पूछा कि वहां से कब लौटोगे? उत्तर में कहा कि देवी कह नहीं सकता कि कब लौटूं? और जीवित लौट भी पाता हूं कि नहीं? इतना कह चल दिये और रूपोश होकर भारत से बाहर जा पहुंचे जहां विदेशों विशेषकर सीमा प्रान्त पर आप लगातार 31 वर्ष तक भारत की आजादी की अलख जगाते रहे। उस काल में आप कहांकहां पर गये, किसकिस से भेंट की, किसकिस से आजादी के लिये सहयोग की भिक्षा मांगी, कितने जंगल, पर्वत गुफायें छान मारी, कभी भूखे प्यासे, कभी सर्दीगर्मी में नंगे बदन, कभी कांटों से भरे जंगलों में बिना जूतों के ही मारे मारे फिरे। वह इतिहास तो भारत का एक मूल्य किन्तु अलभ्य और प्रेरणास्पद अध्याय है जो कि उन्हीं के साथ परलोक चला गया है। विदेशों में आप एक आर्य सेना निर्मित कर भारत पर आक्रमण करके देश को विदेशी अंग्रेजों के पंजे से मुक्त कराने की योजना को भी क्रियान्वित करना चाहते थे। परन्तु उपयुक्त तथा विश्वस्त सहयोगियों, सहकर्मियों तथा साथियों के अभाव में यह आपका सपना सपना ही रह गया। अंग्रेजों ने आपकी जो सम्पत्ति जब्त की थी वह देश के स्वतन्त्र होने पर भी आपको जीते जी कभी वापिस न मिल सकी। यह है स्वतन्त्र भारत में स्वदेश भक्ति, स्वदेश निष्ठा, देश की आजादी के लिए किये जाने वाले तप, त्याग, साधना बलिदान का पुरस्कार तथा मूल्य? इससे अधिक इन शहीदों के प्रति हमारी और क्या कृतघ्नता होगी? पाठक राजा महेन्द्र प्रताप जी के बलिदान और इस देश के नेताओं की कृतघ्नता पर भी विचार करें। यह भी तथ्य है कि जब राजा महेन्द्र प्रताप जी देश से बाहर निकले थे, उनके साथ स्वामी श्रद्धानन्द जी के पुत्र हरिश्चन्द्र भी गये थे। बताते हैं कि ब्रह्मचारी हरिश जी जिमनास्टिक में प्रवीण थे। अनुमान है कि उन्होंने भी गुप्त रूप से देश की आजादी के लिये कार्य किया। विदेश में उनके साथ क्या हुआ, वह गुमनामी में चले गये और उनके आजादी के लिये किये गये कार्यों, जीवन व मृत्यु का किसी को पता नहीं चल सका। स्वामी श्रद्धानन्द जी और उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री इन्द्र जी को भी श्री हरिश्चन्द्र जी का पता नहीं चला। सम्भवतः इसी कारण वह भी उनके विषय में कभी कुछ लिख नहीं सके।राजा महेन्द्र प्रताप जी के विषय में हमने उपर्युक्त शब्दों को इस लिये लिखा है कि इनके विषय में देश की वर्तमान पीढ़ी व विद्वानों को ज्ञान हो सके। हम यह पंक्तियां सुधी पाठकों समर्पित करते हैं।

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