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    कभी पेट में चिकोटी तो कभी कान उमेठते मास्साब, आप हैं तभी हम हैं

    मनोज कुमार

    कहते हैं कि संकट में ही व्यक्ति की पहचान होती है और आप इस बात पर यकीन करते हैं तो आपको इस बात पर भी यकिन करना होगा कि हर बुरे समय में, हर बुरे दौर में शिक्षक ही समाज को रोशनी देने वाला होता है. भारतीय समाज में आज भी शिक्षक का अर्थ मास्साब, गुरूजी से लगाया जाता है. ये वो शिल्पकार हैं जो अगढ़ मिट्टी को आकार देते हैं. उन्हें उसका महत्व बताते हैं और छोटे-छोटे सबक से उनका जीवन संवारते हैं. मास्साब कहें, गुरूजी या कहें शिक्षक तो ये वो शिल्पकार हैं जो स्कूल में अपना कर्तव्य पूरा करते हैं. शिक्षा की सारी धुरी इन्हीं के आसपास घूमती है. शिक्षक की क्या भूमिका होती है, यह कोरोना के महासंकट के दौर में देखने को मिला. एकाध मिसाल तो इसका उल्लेख किया जाए. यहां तो असंख्य मिसाल है जिसका उल्लेख किसी छोटे से लेख में करना संभव नहीं होगा. अखबारों में छप रही खबरों से पता चलता है कि कोरोना की बीमारी की चिंता किए बिना कहीं शिक्षक मोहल्ले में कक्षा लगाकर पढ़ा रहे हैं तो कहीं रेडियो के माध्यम से बच्चों को अक्षर ज्ञान करा रहे हैं. शिक्षा से बच्चे वंचित ना रह जाए, यह शिक्षकों का मिशन है और वे इस बात से तसल्ली पा रहे हैं कि जो कुछ संभव हो रहा है, वह करने की कोशिश कर रहे हैं. आज शिक्षक दिवस के अवसर पर डॉ. सर्वपल्लीराधाकृष्णन का स्मरण करना हमारा दायित्व है तो जो लोग डॉ. राधाकृष्णन के रास्ते पर चलकर समाज में शिक्षा का उजियारा फैला रहे हैं, उन्हें याद करना भी जरूरी हो जाता है. मैं-आप सब कभी अपने छोटे बच्चे की तरह स्कूल जाया करते थे. आज हम किसी बच्चे के पालक हैं तब कोई हमारा पालक हुआ करते थे. तब और अब में फर्क इतना है कि मास्साब, गुरूजी के हाथों में अनुशासन का डंडा हुआ करता था और आज कानून का डंडा है जो अनुशासन पर भारी पड़ रहा है. सबक याद ना रख पाने के कारण आप और हमारे पेट में मास्साब जो चिकोटी काटते थे, उसका दर्द आज भी कहीं उठ जाता है. इस दर्द में तकलीफ नहीं, मिठास है कि मास्साब यह सजा नहीं देते तो हम सबक याद भी नहीं कर पाते. कोई डॉक्टर बन गया, कोई ऑफिसर बन गया, कोई पत्रकार लेखक बना तो किसी ने राजनीति की राह पकड़ी और कामयाब हुए तो मास्साब की वजह से. ये वो मनीषी लोग थे जिन्हें परिवार चलाने लायक तब पेटभर वेतन भी नसीब नहीं हुआ करता था. घर बदहाली में होता था लेकिन माथे पर कभी शिकन नहीं दिखी. समय के पाबंद मास्साब स्कूल में आते थे और जाने के भी पाबंद थे. समय नहीं, अपने काम के. बच्चे शिक्षित हों, होशियार बनें, भाषा की तमीज हो, आदि-इत्यादि उनकी चिंता होती थी. सबसे बड़ी चिंता बच्चों में नैतिक व्यवहार का विस्तार हो. मास्साब यह साहस इसलिए कर पाते थे कि बच्चों के माता-पिता यह मानकर चलते थे कि उनके बच्चे की कुटाई हुई है तो जरूर बच्चे ने गलती की होगी. बच्चे ने गलती से मास्साब की शिकायत की तो पिता शिकायत सुनने के बजाय उल्टे जूते से उसका समाधान करते थे. यही नहीं, पालकों को पता होता था कि मामूली तनख्वाह मेें मास्साब के परिवार का बसर नहीं होता है तो हर कोई अपने सामथ्र्य के अनुरूप साग-भागी, राशन दे आते थे. यह रिश्वत नहीं होता था बल्कि गुरु ऋण से उऋण होने का एक छोटा सी दान परम्परा थी. आज जब हम शिक्षक दिवस मनाने जा रहे हैं तो यह सबकुछ औपचारिक सा लगता है. शिक्षा और शिक्षक दोनों बदल गए हैं. हालांकि यह अधूरा सच है लेकिन सच तो है. सुरसा के मुंह की तरह निजी स्कूलों ने शिक्षा का घोर व्यवसायिकरण किया है. कोरोना काल में बच्चों से फीस लेने के लिए अदालत में मामले चल रहे हैं. यह एक जीवंत उदाहरण है. वहीं सरकारी स्कूल की हालत भी वैसी ही है लेकिन वहां कोई शोरगुल नहीं है. जो शिक्षक कोरोना में भी अपने विद्यार्थियों की चिंता में नवाचार करने में जुटे हुए हैं, उनमें ज्यादतर सरकारी स्कूल के मास्साब हैं. सर और मैडम तो ऑनलाईन क्लास में बिजी हैं. नवाचार का वक्त उनका स्कूल प्रबंधन देता ही नहीं है. इन हालात में शिक्षक दिवस महज औपचारिक लगता है. अखबारों में खबरें हैं कि सरकारी स्कूल के शिक्षकों को तीन-तीन महीने से तनख्वाह नहीं बट पायी है और हैरान परेशान शिक्षक जान देने में पर उतारू हैं. एक-दो ऐसी दुखद घटना की खबर भी पढऩे को मिली है. समाज को शिक्षा से रौशन करने वाले मास्साब के सामने आत्महत्या का विकल्प शेष हो तो शिक्षक दिवस औपचारिक सा ही हो जाता है. निजी स्कूलों में भी बहुतेरे शिक्षक ऐसे हैं जो नवाचार करना चाहते हैं और कुछेक कर भी रहे हैं लेकिन कानून का डंडा उन्हें रोकता है. स्टूडेंट को सजा नहीं दे सकते हैं क्योंकि शिकायत मिलने पर शिक्षक की नौकरी जा सकती है और कहीं तो सजा भी हो सकती है. स्कूल प्रबंधन झमेला नहीं चाहता है इसलिए वह पाठ्यक्रम पूरा करने पर जोर देता है और इससे आगे बढक़र वह स्टूडेंट को सेलिब्रेटी बनाने में आमादा रहता है. साल भर निजी स्कूलों में पढ़ाई से ज्यादा प्रोग्राम का आयोजन होता है. नाच-गाने से लेकर फैशन और जाने क्या-क्या. इसे स्टूडेंट की प्रतिभा संवारने की बात कही जाती है जबकि सरकारी स्कूल के मास्साब कहते हैं हम तो ठोंक-पीटकर छोड़ देते हैं, फिर वह कलेक्टर बने, या एसपी. लेकिन बनेगा जरूर. यह विश्वास मास्साब की पूंजी है. हाल में देश के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद अपने गुरु का सार्वजनिक रूप से चरणवंदन करते हुए दिखते हैं तो भरोसा हो जाता है कि अभी शिक्षा में पूरी तरह अंधियारा नहीं आया है. अभी शेष है बहुत कुछ. अभी उम्मीद बाकी है. एक राधाकृष्णन जैसी राष्ट्रपति के स्मरण में शिक्षक दिवस की परम्परा की नींव रखी गई तो एक दूसरे राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद शिक्षकों के लिए मिसाल हैं और चरितार्थ करते हैं जब कहा जाता है-‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पायं’। यह बात हम सब जानते हैं कि गोविंद से बड़े गुरु होते हैं और इस परम्परा को राष्ट्रपति महोदय निभाते हैं और लोगों को संदेश देते हैं. ये वो उदाहरण है जिससे हमारी भारतीय संस्कृति की श्रीवृद्धि होती है. हम अपने आपको दुनिया में इसलिए श्रेष्ठ नहीं कहते हैं कि हमने तरक्की कर ली बल्कि हम इसलिए श्रेष्ठ कहते हैं कि परम्परा को सहेजा है. संजोया है, उसे आगे बढ़ाया है. एक शिक्षक से ज्यादा सहिष्णु इस संसार में कोई नहीं होता है. उसका विद्यार्थी जब पाठ पढक़र श्रेष्ठ और समर्थ लोगों की पंक्ति में जब खड़ा होता है तो सबसे ज्यादा खुश, सबसे ज्यादा गौरवांवित एक शिक्षक होता है. जब राष्ट्रपति महोदय अपने शिक्षक के चरण-स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं तो शिक्षक के चेहरे पर जो सुकून और संतोष का भाव दिखता है, वही उस शिक्षक की कामयाबी है. शिक्षा का जिस तरह से निजीकरण और व्यवसायिक चरित्र सामने आ रहा है, वह दुखद है लेकिन उल्लेखित प्रसंग इस बात की आश्वस्ति हैं कि यह रोशनी मंद हो सकती है लेकिन बुझेगी नहीं, और जब समाज को जरूरत होगी तब पूरे ताब के साथ शिक्षाजगत रोशन हो जाएगा. सभी शिक्षकगणों को इस महिमा दिवस अर्थात शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं. आप हैं तो हम हैं.    

    मनोज कुमार
    मनोज कुमार
    सन् उन्नीस सौ पैंसठ के अक्टूबर माह की सात तारीख को छत्तीसगढ़ के रायपुर में जन्म। शिक्षा रायपुर में। वर्ष 1981 में पत्रकारिता का आरंभ देशबन्धु से जहां वर्ष 1994 तक बने रहे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समवेत शिखर मंे सहायक संपादक 1996 तक। इसके बाद स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य। वर्ष 2005-06 में मध्यप्रदेश शासन के वन्या प्रकाशन में बच्चों की मासिक पत्रिका समझ झरोखा में मानसेवी संपादक, यहीं देश के पहले जनजातीय समुदाय पर एकाग्र पाक्षिक आलेख सेवा वन्या संदर्भ का संयोजन। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी पत्रकारिता विवि वर्धा के साथ ही अनेक स्थानों पर लगातार अतिथि व्याख्यान। पत्रकारिता में साक्षात्कार विधा पर साक्षात्कार शीर्षक से पहली किताब मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा वर्ष 1995 में पहला संस्करण एवं 2006 में द्वितीय संस्करण। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से हिन्दी पत्रकारिता शोध परियोजना के अन्तर्गत फेलोशिप और बाद मे पुस्तकाकार में प्रकाशन। हॉल ही में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा संचालित आठ सामुदायिक रेडियो के राज्य समन्यक पद से मुक्त.

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