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    आक्रामक नेहरू पर आदर्शवाद की काली छाया

    nehru14 नवम्बर के लिये विशेष

     

    प्रो. ब्रह्मदीप अलूने

    26 जनवरी 1930 को जब पूर्ण स्वराज की मांग के साथ भारत का पहला स्वाधीनता दिवस मनाया गया तब भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में पहली बार गांधी की नीतियों को चुनौति देते हुए किसी लोकप्रिय राजनेता ने अहिंसा की पथरीली राहों से अलग जाने का मानो उद्घोष किया एवं आक्रामकता के जरिए परिवर्तन की आवश्यकता को अंगीकार किया। गांधी के सबसे करीबी समझे जाने वाले नेहरू को गांधी के साधन मान्य नहीं थे। जहां गांधी अहिंसात्मक क्रांति के जरिए सब कुछ प्राप्त करने में भरोसा करते थे एवं राज्यविहीन लोकतन्त्र की परिकल्पना को साकार करने के पक्षधर थे। वहीं समाजवाद की प्रतिष्ठा के लिए राज्य शक्ति की अनिवार्यता से नेहरू संचेतनशील थे और अपने राष्ट्रीय संघर्ष के दिनों में उन्होने अनेक बार इस प्रश्न को उठाया था।

    नेहरू के मत में, हिंसा का कदापि प्रयोग न करने की शपथ ले लेने का अर्थ होता है नितान्त नकारात्मक दृष्टि को अपना लेना, और इस प्रकार जीवन से सम्पर्क विहीन हो जाना। हिंसा तो आधुनिक राज्यों एवं समाजो कें लिए प्राण तत्व है। वह उनकी धमनियों में रक्त की भांति प्रवाहित होती है। राज्य यदि दण्ड देने के लिए अस्त्रों से सज्जित न हो तो फिर न तो कर की वसूली ही सम्भव है और न जमींदार ही अपने लगान को प्राप्त कर सकते हैं और न निजी सम्पत्ति का अस्तित्व ही सम्भव हो सकता है। पुलिस तथा सैनिक बल के माध्यम से कानून व्यक्तियों को दूसरों की सम्पत्ति के उपयोग से रोकता है। इस प्रकार आक्रमण से रक्षा हेतु राष्ट्रों की स्वाधीनता हिंसा के बल पर अवलम्बित है। राज्यों का आधार हिंसा है, यह तथ्य विश्वविदित है। यह केवल शस्त्रों की हिंसा पर निर्भर नहीं है प्रत्युत अत्यन्त सूक्ष्म तथा भयंकर हिंसा पर आश्रित है अर्थात् गुप्तचरों, मुखबिरों, व्यक्तियों को उकसाने वाले एजेण्टों, प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा तथा समाचार पत्रों द्वारा मिथ्या प्रचार, धर्म तथा अर्थाभाव और अकाल तथा अन्य भय।

    नेहरू का मानना था कि राज्य अपने स्वातंत्र्य के रक्षार्थ हिंसा का प्रयोग कर सकता है। कोई हिंसात्मक तरीका अवांछनीय और अनुपयुक्त हो सकता है, लेकिन वह सर्वथा अनुचित और वर्जित नहीं हो सकता। भारत की एकता एवं अखण्डता की रक्षा के लिये नेहरू मुखर रहे और जमीदारों, ताल्लुकादारों, हैदराबाद और जुनागढ विवाद को सख्ती से दबा देने में नेहरू का सरदार पटेल को गहरा समर्थन प्राप्त था। स्वतन्त्र भारत के शुरूआती दौर में सर्वमान्य नेता नेहरू की कार्यशैली देश में तानाशाहों जैसी रही। वे महाशक्तियों के आगे भी नतमस्तक नहीं हुए, अमेरिका और सोवियत संघ को धता बताते हुए तीसरे मार्ग पर चलने का साहस करने वाले इस राजनेता के तेवर बेहद आक्रामक थे। विदेश नीति के मामले में उनकी आक्रामकता पर अत्यधिक आदर्शवादिता हावी रही। और इसीलिए नेहरू अपने सफल कार्यो से ज्यादा दूर्भाग्यपूर्ण परिणामों के लिए याद किये जाते है। 15 अगस्त 1947 को आजाद भारत नये सपने बूनने में लगा था वहीं दूसरी ओर कश्मीर पर पाकिस्तान हमले ने एक नयी चुनौती प्रस्तुत कर दी। नेहरू पाकिस्तान को दबा देना चाहते थे ओर शुरूआती दौर में ऐसा उन्होने किया भी, लेकिन वे माउंटबैटन की चाल में फंस गये। भारत और पाकिस्तान के बीच खुली जंग का खतरा मंडराता देख माउंटबेटन ने नेहरू को पत्र लिखकर उनसे ‘‘लड़ाई बंद करने, और जल्दी से जल्दी बंद करने’’ पर जोर दिया। नेहरू ने उन्हें जवाब दिया कि एकतरफा कोशिशों से शांति का रास्ता नहीं निकलेगा। कश्मीर में पाकिस्तान का बहुत कुछ दांव पर था, और जब तक भारत सैनिक कार्रवाई के दम पर उसे मजबूर न कर देता, पाकिस्तान बाज आने वाला नहीं था। इतना ही नहीं, भारत के लिए अपनी एक साख बनाना और उसे कायम रखना भी जरूरी था। ‘‘मुझे यकीन हो चुका है कि इस तरह की चढ़ाई करने पर अगर हमने घुटने टेक दिए तो आगे दूसरी जगहों पर आक्रमण होते रहेंगे।’’ और अगले दो दिनों में कश्मीर में फौजी हालात काबू में आ गए नौशेरा पर कब्जा हो गया, और उड़ी पर जो खतरा मंडरा रहा था, वह टल गया। इसी के साथ पाकिस्तान पर हमले की जो नौबत आ रही थी वह भी नहीं बची।

    ब्रिटिश हितों कि पूर्ति के लिए इस सारे मामले पर माउंटबेटन और जनरल बुचर ने कुटनीतिक खेल खेला और नेहरू के अतिविश्वास का फायदा उठाया। उन्होने जानबूझ कर यह ध्यान रखा की कश्मीर पर भारत के पूर्ण आधिपत्य की कोई योजना न तैयार की जाए, और इस तरह ‘‘नेहरू को भारतीय सेना को पाकिस्तान पर हमला बोलने के आदेश देने से रोक दिया।’’ ऐसा भी माना जाता है कि सैनिक मामलों की जानकारी न होने और फैसले लेने में कोताही की फितरत के चलते नेहरू भी कुछ तय नहीं कर पाए थे।

    कश्मीर के मामले पर नेहरू की एक ओर चिन्ता थी, स्वाधीन भारत का आगाज अनन्त अपेक्षाओं और चुनौतियों से हुआ था। ऐसे में नेहरू के विचार में जंग नई बनी सरकार को अस्थिर कर सकती है, सशस्त्र सेनाओं के भविष्य को खतरे में डाल सकती है जो कि अपने पुनर्गठन के दौर से गुजर रही है, दोनो देशो के अल्पसंख्यकों पर बयां से परे कहर टूटेगा, और भारत की एक हमलावर की छवि बन जाएगी। नवंबर 1947 में नेहरू ने एक समाचार पत्र में लिखा था कि ‘‘युद्ध एक खतरनाक चीज है जिससे हर हाल में बचना चाहिए। पाकिस्तान हार जाएगा, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि भारत बहुत बड़ी चोट झेलेगा। उन्हें विश्वास था इस बात पर कि ‘‘युद्ध से बचने के लिए जो कर सकते हैं वो हमें करना चाहिए, और यही हमारी स्पष्ट नीति है।’’

    आक्रामकता को पसन्द करने वाले नेहरू ने भारत की तत्कालीन परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए आदर्शवाद का रास्ता अपनाया। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के प्रणेता के रूप में महाशक्तियों के हाथों का खिलौना न बनने का निर्णय और स्वहित और स्वाभीमान से जागरूक देशो की सामूहिक शक्ति का परिचायक यह मंच वास्तव में नेहरू की आक्रामक कूट नीति को स्पष्ट करता है। चीन से सम्बन्धों को लेकर नेहरू सदैव सावधान रहें। वे इस साम्यवादी राष्ट्र से आशंकित रहते थे और तत्कालीन परिस्थितियों में राष्ट्र को युद्ध के खतरे से दूर रखना चाहते थे। लेकिन चीन के प्रति रूको और देखो की नीति भारत के लिये अत्यधिक घातक सिद्ध हुई। विश्व नेता के रूप में अपने पहचान बनाने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री उत्तर की सीमाओं की संवेदनशीलता को समझ नहीं सके। चीन के प्रति उनकी अत्यधिक सद्भावना और आदर्शवाद की नीति माओ की आक्रामकता के आगे कमजोर पड गयी और इस प्रकार 1962 के युद्ध में चीन से मिली करारी शिकस्त ने नेहरू की विजेता छवि को धूमिल कर दिया।

     

    ब्रह्मदीप अलुने
    ब्रह्मदीप अलुने
    .राजनीति विज्ञान एवं अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध , शा. माधव कला, वाणिज्य एवं विधि महा. उज्जैन

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