संसद के मानसून सत्र के पहले केंद्र में मंत्रीमण्डल विस्तार की अटकलें

(लिमटी खरे)
संसद का मानसून सत्र जुलाई के दूसरे सप्ताह में आरंभ होने की उम्मीद है। इसी के साथ नरेंद्र मोदी कैबनेट के विस्तार की अटकलें भी तेजी से चल पड़ी हैं। मीडिया में चल रही चर्चाओं पर अगर यकीन किया जाए तो संसद के मानसून सत्र का आगाज 19 जुलाई से हो सकता है। इस विस्तार में राज्य सभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित मध्य प्रदेश से एक और संसद सदस्य का मंत्रीमण्डल में प्रवेश तय ही माना जा रहा है।
भाजपा के अंदरखाने से छन छन कर बाहर आ रही खबरों के अनुसार पूर्व में मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान की रूखसती की खबरों को जमकर हवा दी गई थी। कैलाश विजयवर्गीय सहित भाजपा के अनेक नेताओं के द्वारा टी पालिटिक्स (चाय पर चर्चा) की खबरें सोशल मीडिया पर चर्चित होने के बाद यही माना जा रहा था कि 15 जून तक ही शिवराज सिंह चौहान की बिदाई तय है।
चर्चाओं के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की नजरें इस समय उत्तर प्रदेश चुनाव पर ही केंद्रित हैं। पश्चिम बंगाल में जिस तरह हार का स्वाद भाजपा ने चखा है उसके बाद दोनों ही आला नेता किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहते हैं। इस बार अगर उत्तर प्रदेश में भी भाजपा को मुंह की खानी पड़ी तो नरेंद्र मोदी और अमित शाही की जुगल जोड़ी पर संघ की भकुटियां तन सकती हैं।
वैसे भाजपा के केंद्रीय मुख्यालय में कांग्रेस का निर्विवाद चेहरा रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया और असम के पूर्व मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल को केंद्रीय मंत्रीमण्डल में एडजस्ट किया जाना तय है। इन दोनों को मलाईदार विभाग भी मिलेंगे। इसका कारण यह है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के द्वारा देश के हृदय प्रदेश में कांग्रेस की कमल नाथ के नेतृत्व वाली सरकार को धाराशायी किया तो दूसरी ओर सर्वानंद सोनोवाल ने हिमंत बिस्वा के लिए न केवल रास्ता छोड़ा वरन उनको सहयोग भी किया।
मध्य प्रदेश में सत्ता और संगठन के बीच सामंजस्य बनाने की कवायद भी जारी दिख रही है। संगठन में जिस तरह से सिंधिया गुट के लोगों को एडजस्ट किया जा रहा है। राजनैतिक पंडितों की मानें तो राजा दिग्विजय सिंह के द्वारा जिस तरह के पांसे फेंके उससे ग्वालियर के महाराजा बच नहीं पाए और उन्होंने कांग्रेस को अलविदा कहने में ही भलाई समझी। आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि कांग्रेस का आलाकमान महाराजा की बिदाई को आसानी से कैसे पचा गया!
10 मार्च 2020 को कांग्रेस का दामन छोड़ने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्य सभा के रास्ते संसद में प्रवेश मिल गया। उनके उन सिपाहसलारों जो उप चुनाव में विजयश्री का वरण कर गए, को मंत्रीपद से नवाज दिया गया, किन्तु जो चुनाव हार गए उनका राजनैतिक पुर्नवास अब तक नहीं हो पाया है। उन नेताओं के मन में मलाल अवश्य ही होगा कि महाराजा के लिए उन्होंने अपनी विधायकी त्यागी पर बाद में उप चुनावों में जनता ने उन्हें सत्ता के गलियारे से बाहर फेंक दिया, अब उनका सियासी भविष्य क्या बचा!
विषय से विषयांतर करते हुए यह बताना भी लाजिमी होगा कि हाल ही में जम्मू और काश्मीर के मसले पर सर्वदलीय बैठक के उपरांत सियासी बियावान में जो चर्चा चल रही है उसके अनुसार जल्द ही नरेंद्र मोदी सरकार का विस्तार हो सकता है। इसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, सर्वानंद सोनोवाल, सुशील मोदी, भूपेंद्र यादव, नारायण राणे सहित लगभग ढाई दर्जन सांसदों को स्थान दिया जा सकता है।
वैसे प्रस्तावित इस विस्तार में कुछ मंत्रियों को बाहर का रास्ता भी दिखाया जा सकता है या उनके पर कतरे भी जा सकते हैं। मध्य प्रदेश से फग्गन सिंह कुलस्ते के परफार्मेंस से नरेंद्र मोदी बहुत ज्यादा खुश नहीं दिख रहे हैं। इसके साथ ही साथ मध्य प्रदेश कोटे से ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा सतना के सांसद गणेश सिंह का नाम भी संघ की पहली पसंद बताई जा रही है। इसके पहले जबलपुर के संसद सदस्य राकेश सिंह के नाम पर चर्चा चल रही थी, किन्तु महाकौशल अंचल के मूल निवासी और दमोह के सांसद प्रहलाद सिंह पटेल के केंद्र में मंत्री होने के कारण उनके बजाए विन्ध्य को प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से गणेश सिंह के नाम पर मुहर लग सकती है। इसके पीछे एक वजह यह भी निकलकर सामने आ रही है कि सतना के सांसद गणेश सिंह को मंत्री बनाकर रीवा सतना क्षेत्र से लगी उत्तर प्रदेश की विधान सभा सीटों पर इसका लाभ लिया जा सके। जो भी होना है संसद के मानूसन सत्र के पहले ही होने की बात कही जा रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा इस बार मध्य प्रदेश के किस सांसद की लाटरी लगती है यह बात भविष्य के गर्भ में ही है।

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