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    प्रायोजित विमर्श के खतरे और बहुलतावाद

    -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

    उत्तर-आधुनिक स्थिति में बहुसांस्कृतिकवाद की धारणा हठात् चर्चा के केन्द्र में आ गई है। इस धारणा का बौद्धिकों के द्वारा विमर्श के लिए बढ़ता आकर्षण इस बात का संकेत है कि इसके पीछे मंशाएं कुछ और हैं। ये लोग फैशनेबुल वस्त्रों की तरह धारणाएं बदल रहे हैं, धारणाओं के प्रति मनमाना व्यवहार कर रहे हैं।

    आज बौद्धिक विमर्श से क्या गायब किया जाय और किस पर चर्चा हो इसके सुनियोजित ढंग़ से फैसले लिए जा रहे हैं, पूरा का पूरा विमर्श नियोजित होकर रह गया है। सच यह है कि धारणाएं ऐतिहासिक प्रक्रिया में निर्मित होती हैं, जब तक धारणाओं को पैदा करने वाली परिस्थितियां बनी रहती हैं, उनकी जरुरत बनी रहती तब तक धारणाओं का प्रयोग भी होता रहता है। किन्तु उत्तर-आधुनिक अवस्था में तर्क की

    बजाय तर्कहीन ढ़ंग से, स्वाभाविक की बजाय नियोजित विमर्श पर जोर दिया जा रहा है। सब कुछ तात्कालिक एवं क्षणिक बना दिया गया है।

    आज विमर्श से समाजवाद गायब है और उसकी जगह बाजारवाद ने ले ली है। योजना की जगह उदारतावाद, राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता की जगह भूमंड़लीकरण,वर्ग की जगह सामाजिक समूह, क्रान्ति की जगह स्वैच्छिक संगठनों के आन्दोलनों, राज्य की जगह नागरिक समाज,इतरलिंगी कामुकता की जगह गे और लेस्बियन या समलैंगिक अधिकारों ,आधुनिकता की जगह उत्तर-आधुनिकता पर चर्चाएं प्रायोजित की जा रही हैं।

    इसी तरह समानता की जगह बहुलतावाद, विचार की राजनीति की जगह अस्मिता की राजनीति, राष्ट्र-राज्य की जगह उप-राष्ट्रीयता, सामान्यत्व की जगह भिन्नता एवं विविधता, जातीय संस्कृति की जगह संस्कृति, राष्ट्रीय एकता की जगह बहुसांस्कृतिकवाद एवं स्वीकृति की धारणाओं पर चर्चाएं हो रही हैं। आज सबसे ज्यादा संस्कृति, विविधता, बहुलतावाद, अस्मिता की राजनीति आदि पर विमर्श हो रहा है।

    सत्तर के दशक में सांस्कृतिक बहुलतावाद की शुरुआत सबसे पहले कनाड़ा और आस्ट्रेलिया में हुई। बाद में अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी में हुई। इन दिनों यह फ्रांस के राजनीतिक परिदृश्य का प्रमुख एजेण्डा है।

    प्रसिध्द चिंतक भिखु पारीख ने लिखा कि फ्रांस जैसे राष्ट्र-राज्य के मजबूत किले में प्रभुत्व जमाना काफी महत्व रखता है। उसने नागरिकों की जातीय, सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के रुपों को जनगणना के रिकॉर्ड तक में दर्ज नहीं किया है। चूंकि बहु सांस्कृतिकवाद का आंदोलन विश्व के अनेक राजनीतिक संदर्भों में अनियोजित ढ़ंग से शुरु हुआ और उसने अनेक सामाजिक समूहों को आकर्षित किया।

    अभी तक यह आंदोलन उसूलों के बारे में सुसंगत दार्शनिक दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति नहीं कर पाया है। वह अपनी पहचान और मुख्य बिंदुओं तक पर प्रकाश नहीं ड़ाल पाया है। अत: यह जानना जरुरी है कि इसका अर्थ क्या है और सरोकार क्या हैं? बहुसांस्कृतिकवाद को देखने का सबसे सही पैमाना न तो राजनीति है और इतिहास है बल्कि मानव जीवन को वह किस परिप्रेक्ष्य में देखता है,यही प्रधान बिंदु है।

    इस प्रसंग में पहली बात यह ध्यान रहे कि मनुष्य सांस्कृतिक निर्मिति है। वह सांस्कृतिक जगत में जीता है। वह इसी सांस्कृतिक जगत से अपनी जिन्दगी और सामाजिक संबंधों को अर्थवत्ता और प्रासंगिकता प्रदान करता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि संस्कृति से उसका निर्ध्रारणवादी रिश्ता है। बल्कि कहने मतलब यह है कि संस्कृति उसे निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। वह उसके कुछ प्रभावों को कम कर सकता है किन्तु पूरी तरह संस्कृति से मुक्त नहीं हो सकता।

    दूसरी बात यह कि भिन्न-भिन्न किस्म की संस्कृति में भिन्न -भिन्न किस्म की व्यवस्थाओं की अभिव्यक्ति होती है। संस्कृति जिन्दगी की बेहतरी के विज़न को व्यक्त करती है। साथ ही यह ध्यान रहे कि प्रत्येक संस्कृति मनुष्य की क्षमता एवं भावनाओं का बहुत छोटा हिस्सा ही व्यक्त करती है अत: मनुष्य को समग्रता में बेहतर ढंग से जानने के लिए अन्य संस्कृतियों की मदद लेनी पड़ती है। जिससे बेहतर ढ़ंग से विकास किया जा सके। इससे जहां एक ओर संस्कृति के शुद्धतावादी दृष्टिकोण से बचेंगे वहीं दूसरी ओर संस्कृति के कल्पना जगत का विस्तार भी कर पाएंगे। इसका यह अर्थ नहीं है कि व्यक्ति अपनी संस्कृति के तहत बेहतर जिन्दगी जी नहीं सकता। बल्कि इसका मतलब यह है कि यदि अन्य संस्कृति की मदद लेता है तो वह ज्यादा बेहतर ढ़ंग से जी सकता है।

    आधुनिक युग में एक ही संस्कृति में जीना असंभव है। क्योंकि यह गतिशील और स्वतंत्र जगत है। इसका यह भी अर्थ नहीं है कि सभी संस्कृतियां समृद्ध हैं, सभी को एक समान सम्मान मिलता है ,सभी अपने सदस्यों की खुशहाली के लिए तत्पर हैं, सभी समान हैं और उनकी आलोचना नहीं हो सकती।

    कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी संस्कृति पूरी तरह उपयोगी नहीं होती।कोई भी संस्कृति पूर्ण नहीं होती। किसी भी संस्कृति को अन्य पर आरोपित करने का हक नहीं है। तीसरी बात यह कि प्रत्येक संस्कृति आंतरिक रुप से बहुलतामूलक होती है और उसकी परंपराओं और विचारों में निरंतर परिवर्तन होता रहता है। परिवर्तन का मतलब यह नहीं है कि वह ‘कोहरेंस’ और पहचान को खो दे। बल्कि पहचान तो बहुलता ,तरलता और खुलेपन को समेटे होती है। संस्कृति सचेत और अचेत संपर्क के कारण विकास करती है। इन बातों के रचनात्मक संपर्क और अंत:संबंध से बहुसांस्कृतिकवाद का परिप्रेक्ष्य बनता है।

    ध्यान रहे प्रत्येक संस्कृति बहुलतामूलक और भिन्नता लिए होती है। जब संस्कृतियों को किसी एक स्रोत की उपज माना जाता है या किसी एक संस्कृति विशेष को आरोपित करने की कोशिश की जाती है तो बहुलतावाद की बुनियाद ही धराशायी हो जाती है।

    संस्कृति का उदय स्वयं के गर्भ से होता है। वह अन्य के गर्भ से पैदा नहीं होती। किन्तु वह अन्य से प्रभाव ग्रहण करती है ,अन्य के तत्वों को आत्मसात् करती है, बृहत्तर आर्थिक, राजनीतिक आदि कारणों से उसकी इमेज बनती है। यही वजह है कि वह किसी भी किस्म के केन्द्रीयतावाद को स्वीकार नहीं करती। क्योंकि केन्द्रीयतावाद उसके इतिहास एवं अन्य तत्वों की भूमिका को अस्वीकार करता है।

    बहुसांस्कृतिकवाद के परिप्रेक्ष्य के अनुसार कोई भी राजनीतिक सिद्धान्त या विचारधारा मानव जीवन के पूर्ण सत्य को व्यक्त नहीं करता। प्रत्येक- उदारतावाद, अनुदारवाद, राष्ट्रवाद, समाजवाद – बेहतर जीवन के लिए खास संस्कृति और विशिष्ट विजन को व्यक्त करता है। अत: वह अनिवार्यत: संकुचित और एकांगी होता है।

    बहुसांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के अनुसार समाज की बेहतरी के लिए विविधता और विभिन्न समूहों के बीच उनके नैतिक विजन को लेकर रचनात्मक संवाद बेहद जरुरी है। मसलन्, समाज के सदस्यों में एक दूसरे की संस्कृति का आदर करने के अधिकार के प्रति सम्मान का भाव हो साथ ही वे अपनी पसंद का विस्तार कर सकें, आत्मालोचना ,दृढता, कल्पनाशीलता, बौध्दिक और नैतिक सहानुभूति की क्षमता का विकास करे जिससे उसका विकास और भला हो। यह संभव है कि कुछ ग्रुप अन्य संस्कृति से संपर्क न रखना चाहें और अपने समूह के सीमित दायरे में जीना चाहें।हमें ऐसे समूहों की इस तरह की भावनाओं और जीवन शैली का सम्मान करना चाहिए।

    बहुसांस्कृतिक समाज को स्थिर बनाने के लिए जरुरी है कि इसके नागरिकों में एक -दूसरे के प्रति लगाव हो, किन्तु लगाव का आधार नस्ल, धर्म, एथनिक न हो अपितु बहुसांस्कृतिक समाज के उसूलों को आधार बनाया जाय। चूंकि बहुसांस्कृतिक समाज वैविध्यपूर्ण होता है अत: इसका आधार राजनीति को बनाया जाना चाहिए ,और साझा राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर राजनीतिक समूह के रुप में पहचान बनायी जाय। क्योंकि वे ऐतिहासिक तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हैं।

    इस प्रसंग में कुछ पदबंधों के उदार प्रयोगों के प्रति सावधान रहने की जरुरत है। मसलन्, ‘प्लूरल’, ‘डाइवर्स’, और ‘मल्टीकल्चरल’ पदबंधों का आमतौर पर ‘बहु’ के लिए उदारतापूर्वक प्रयोग किया जाता है। किन्तु इन तीनों में ‘बहु’ का भिन्न अर्थ है। इसके कारण इनका अर्थ, अवधारणा, आधार, संदर्भ बदल जाता है। ये एक दूसरे के पर्यायवाची नहीं हैं।

    जगदीश्‍वर चतुर्वेदी
    जगदीश्‍वर चतुर्वेदी
    वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

    1 COMMENT

    1. इस आलेख की कई परतों में चीर फाड़ की जा सकती है .किन्तु सांस्कृतिक बहुलता को एकसार उर्वर भूमि हासिल करने के लिए जिस बहु राजनेतिक सहअस्तित्व के उटोपिया का रेखांकन किया गया है वह वर्गीय विभाजन के चलते सम्भव नहीं है .

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