“श्रीकृष्ण और शाल्व का सौभनगर (अलवर) में हुए युद्ध का वर्णन”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

श्रीकृष्ण भारतीय संस्कृति के आदर्श पुरुषों में से एक हैं। महर्षि दयानन्द ने उन्हें आप्त पुरुष कहा है। महाभारत में
उनका प्रशंसनीय इतिहास वर्णित है। उनका समस्त जीवन संघर्षों से भरा रहा।
जन्म काल से ही उन्होंने ऐसे-ऐसे कार्य किये कि जिन्हें पढ़कर आश्चर्य होता है।
महाभारत युद्ध में पांडवों को विजय प्राप्त हुई। इस महायुद्ध में पांडव पक्ष को
प्राप्त हुई विजय में श्रीकृष्ण जी की ही प्रमुख भूमिका थी। आजकल स्वाध्याय व
पढ़ने की प्रवृत्ति कम हो गई है। हमारे पौराणिक भाईयों और आर्यसमाज के
अनुयायियों को भी श्रीकृष्ण जी के जीवन के बहुत से पक्षों का ज्ञान नहीं है। आर्य
हिन्दुओं को या तो कृष्ण उपदेश के रूप में गीता का ज्ञान है या समाज में
भागवत-कथा की चर्चा ही सुनते हैं। श्रीकृष्ण जी के जीवन के उज्जवल पक्ष
हमारी दृष्टि से ओझल रहते हैं। दूसरी ओर अन्य मतों के लोग अपनी साधारण बातों को बड़ी श्रद्धा व उत्साह से प्रचारित करते
हैं। हम यदि नियमित स्वाध्याय करें तो हमारे ज्ञान में वृद्धि हो सकती है और संस्कृति सुरक्षित रह सकती है। आगामी 03
सितम्बर, 2019 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व आ रहा है। अतः इस अवसर पर हम श्रीकृष्ण जी के प्रबल विरोधी शिशुपाल के
मित्र अलवर-नरेश श्री शाल्व के द्वारका व अलवर में कृष्णजी के पुत्र प्रद्युम्न एवं श्रीकृष्ण जी के साथ हुए युद्धों पर प्रकाश
डाल रहे हैं। हमने यह समस्त सामग्री आर्यसमाज के शीर्ष विद्वान पं0 चमूपति जी की पुस्तक ‘योगेश्वर कृष्ण’ से ली है।
उनका अत्यन्त आभार है। हमें अलवर के इस युद्ध विषयक सामग्री इस रूप में पूर्व पढ़े हुए किसी ग्रन्थ में देखने को नहीं
मिली। अतः हम आशा करते हैं कि इससे पाठकों को लाभ होगा।
श्रीकृष्ण जी का शिशुपाल के साथी शाल्व के साथ अलवर में युद्ध हंआ था। इस युद्ध का महाभारत में वर्णन उपलब्ध
है। प्रसिद्ध वैदिक विद्वान् ऋषिभक्त पं0. चमूपति जी बताते हैं कि युद्ध तो श्रीकृष्ण जी ने और भी अनेक किए थे परन्तु
विस्तृत वर्णन इसी सौभनगर (अलवर) के युद्ध का पाया जाता है। भीष्म जी ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर कहा
था कि वहां उपस्थित राजाओं में कोई ऐसा राजा नहीं है जिसे कृष्ण जी जीत न सकते हों। महाभारत के दिग्विजय प्रकरण से
यह सिद्ध है कि युधिष्ठिर के साम्राज्य में भारत के सारे राष्ट्र सम्मिलित थे। महाभारत के अनेक स्थ्लों मुख्यतः द्रोण पर्व के
दसवें अध्याय में उन राज्यों की गणना की गई है जिन्हें कृष्ण जी ने नीचा दिखाया था। पं0 चमूपति जी यह भी बताते हैं कि
श्रीकृष्ण की इन विजयों का महाभारत में विस्तार नहीं दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि भिन्न-भिन्न निमित्तों से, यथा
रुक्मिणी के हरण में, भारत के प्रायः सभी राजा कृष्ण जी के बल का लोहा मान चुके थे।
महाभारत इतिहास ग्रन्थ में वर्णित श्रीकृष्ण और शाल्व के बीच युद्ध का वर्णन इस प्रकार है। आजकल जहां अलवर
हैं, वहां पुराने समय में शाल्वपुर नाम का नगर था। उसके चारों ओर का राष्ट्र, जिसकी वह राजधानी था, मार्त्तिकावर्त या
मृत्तिकावर्त कहलाता था। मर्त्तिकावर्त के राजा का नाम शाल्व था। उसने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में शिशुपाल के वध का
समाचार सुना तो झट आपे से बाहर हो गया। अभी श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थ ही में थे कि शाल्व ने द्वारका पर चढ़ाई कर दी और
श्रीकृष्ण को युद्ध का आह्वान देने लगा। द्वारका को जरासन्ध के आक्रमणों को लक्ष्य में रखकर बनाया गया था। द्वारका
एक सुदृढ़ दुर्ग-सी थी। उसके चारों ओर द्वार थे। उन पर योद्धाओं की चौकियां थीं। यन्त्र रखे थे। सुरंगों की सुरक्षा का प्रबन्ध
था। सब ओर मोर्चे लगे हुए थे। अट्टालिकाओं पर गोले रखे रहते थे। लड़ाई का सामान स्थान-स्थान पर विद्यमान था। सब
ओर बुर्ज थे। बीच का बुर्ज ऊंचा था। वहां खड़े हुए पहरेदारों ने खबर दी की शत्रु आ रहा है। सारे राष्ट्र में आज्ञा हो गई कि सुरापान
निषिद्ध है। युद्ध के समय मद्यपान की मनाही का यह अत्यन्त प्राचीन उदाहरण है। पुल तोड़ दिए गए। नौकाओं का आना-

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जाना बन्द हो गया। परिखाओं में सीखें डाल दी गईं। कुओं आदि की भी यही अवस्था की गई। नगर के चारों ओर एक कोस की
दूरी तक भूमि पर कांटे डाल दिए गए और यह आशा निकाली गई कि बिना मुद्रा (पासपोर्ट) के कोई आ-जा न सकेगा।
सेना लड़ने के लिए तैयार थी। सबको वेतन मिल चुका था और वह भी खरे सोने के सिक्कों में। सब युद्ध के अनुभवी
थे। तात्कालिक भरती का यादवों में रिवाज न था। शस्त्रास्त्र से लैस होकर सब लड़ने को तैयार हो गए।
शाल्व का सबसे बड़ा बल एक उड़ता हुआ नगर था। श्मशानों और देवालयों को छोड़कर उसने द्वारका के बाहर डेरा
लगाया। अपने विमान के साथ वह नगरी के चारों ओर घूमा। (रामायण में पुष्पक विमान का वर्णन तो हम पढ़ते हैं परन्तु
महाभारत काल में अलवराधिपति शाल्व के पास अपना विमान था, इसका वर्णन शायद ही किसी को ज्ञात हो। महाभारत व
उससे पूर्व हमारे पूर्वज विमान बनाने व उसके उपयोग से अभिज्ञ थे, यह इस उदाहरण से स्पष्ट है। -मनमोहनआर्य)
यादव वीर उद्यत ही थे। सबसे पूर्व सांब की शाल्व के सेनापति क्षेमवृद्धि से लड़ाई हुई। सांब ने उसे रणक्षेत्र से ही भगा
दिया। वेगवान् ने उसका स्थान लिया, परन्तु वह मारा गया। विविन्ध्य चारुदेष्ण से भिड़ा, परन्तु प्रद्युम्न (श्री कृष्ण के पुत्र) के
बाण ने उसे पृथ्वी पर चित्त लिटा दिया। अब शाल्व ने स्वयं आक्रमण किया। प्रद्युम्न और शाल्व दोनों वीर थे। दोनों ने युद्ध-
विद्या के जौहर दिखाये। पहले शाल्व को और फिर प्रद्युम्न को मूर्छा हुई। प्रद्युम्न का सारथि दारुकि था। वह रथ को रणक्षेत्र
से निकाल एक ओर ले गया। इतने में प्रद्युम्न सचेत हुआ तो उसने दारुकि को झिड़का कि ‘‘यह क्या भीरुओं का कार्य किया?
वह वृष्णि-कुल में पैदा ही नहीं हुआ जो युद्ध में पीठ दिखाए, या गिरे हुए पर और ‘मैं तेरा हूं’ ऐसा कहने वाले पर वार करे। स्त्री,
बालक और वृद्ध पर आक्रमण करे, या भागे हुए अथवा जिस शत्रु का शस्त्र टूट गया हो, उस पर हमला करे।” दारुकि ने उसे
फिर रणक्षेत्र में पहुंचा दिया। इस बार का युद्ध और भी बल-पराक्रम-पूर्वक हुआ। शाल्व को अधिक चोटें आयीं और वह मूर्छित
हो गया। प्रद्युम्न उसका वध ही करने लगा था कि शाल्व ने घेरा उठा लिया और द्वारका से चला गया।
श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थ से लौटे तो द्वारका में युद्ध के अवशेष अभी विद्यमान थे। पूछने पर पता लगा कि यह शाल्व की
करतूत है। इन्होंने सेना लेकर मार्त्तिकावर्त पर धावा बोल दिया। वहां जाकर ज्ञात हुआ कि शाल्व अपने सौभ विमान के साथ
समुद्र गया हुआ है। कृष्ण जी को लड़ना उसी से ही था। इन्होंने सीधा समुद्र का रास्ता लिया। इन्हें घाटा यह था कि शाल्व
विमान पर था और श्रीकृष्ण नीचे धरती पर। पहले तो कृष्ण जी को अपने शस्त्र वहां तक पहुंचाने में कठिनाई हुई, परन्तु फिर
इन्होंने इसका प्रबन्ध कर ही लिया। इस युद्ध में दोनों ओर से माया-युद्ध की प्रदर्शिनी हुई। दिन को रात और रात को दिन कर
दिया जाता। स्वच्छ वातावरण मेघाच्छन्न हो जाता। सब ओर कोहरा छा जाता। पास खड़ा मनुष्य दिखाई न देता। इस माया
का निवारण प्रज्ञास्त्र से होता, उससे बादल छिन्न-भिन्न हो जाते। एक बार किसी ने ऐसे ही कोहरे में अपने आपको
द्वारकावासी बताकर श्रीकृष्ण को द्वारका-पति उग्रसेन का सन्देश दिया कि शाल्व ने वसुदेव को मार दिया है, आप लौट
आइए। कृष्णजी कुछ समय तो अत्यन्त खिन्न रहे। इन्होंने सोचा, बलराम, प्रद्युम्न, सांब आदि के रहते हुए वसुदेव का बाल
बांका न हो सकता था। संभव है, सभी मारे गए हों। यह सोचते-सोचते ये कुछ समय के लिए अचेत हो गए और इन्हें स्वप्न-सा
दिखाई दिया कि वस्तुतः वसुदेव परलोक पहुंच गए और उनका शरीर किसी टूटे तारे की तरह नीचे गिर रहा है। इस दशा ने इन्हें
और भी व्याकुल किया। परन्तु जब फिर सचेत हुए तो न वह द्वारकावासी था न वसुदेव का द्युलोक से गिरना। समझ गए कि
वह गुप्तचर शाल्व ही का होगा। दारुक ने समझाया, महाराज ! शत्रु तो सभी अस्त्रों का प्रयोग कर रहा है, परन्तु आप हैं कि
घातक शस्त्र नहीं चलाते। ऐसे शत्रु पर आग्नेय चक्र चलाना चाहिये। श्रीकृष्ण ने इस मन्त्रणा का औचित्य स्वीकार किया और
पहले ही वार में शाल्व का सौभ विमान तोड़ गिराया। दूसरी बार स्वयं शाल्व पर शस्त्र फेंका। इस प्रकार शत्रु को उसके वायव्य
दुर्ग-समेत नष्ट कर द्वारका लौटे।
इस प्रकार शाल्व के साथ युद्ध में श्रीकृष्ण की विजय हुई। हम आशा करते हैं कि हमारे पाठक मित्र इस ऐतिहासिक
जानकारी से लाभान्वित होंगे। वह जब-जब श्रीकृष्ण जी के जीवन पर दृष्टि डालेंगे तो इस घटना को भी अपने स्मरण करेंगे।

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ऐसे वर्णन पढ़कर हमारे भीतर उत्साह एवं शक्ति का संचार होता है। हम अपने गौरवमय अतीत से परिचय रहते हैं तो दूसरा
कोई विधर्मी हमारे महापुरुषों की आलोचना करने का साहस नहीं कर सकता। हम श्रीकृष्ण के गुणों व जीवन आदर्शों को अपने
जीवन में धारण करने का प्रयत्न करें। यही श्रीकृष्ण जी के जीवन को जानने का लाभ है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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