भारत में रेडियो के बढ़ते कदम

– अशोक बजाज

जन संपर्क के माध्यम से रेडियो का मत्वपूर्ण स्थान है। अतः प्रसारण दिवस मनाने का प्रचलन जोरों पर है। देश के लिए नई उपलब्धियों का तथा रेडियो श्रोताओं के लिए यह खुशी का दिन ही है। 83 वर्ष पूर्व 23 जुलाई, 1927 को भारत में रेडियो का पहला प्रसारण मुंबई से हुआ। दुनिया में रेडियो प्रसारण का इतिहास काफी पुराना नहीं है। सन 1900 में मारकोनी ने इंग्लैण्ड से अमेरिका बेतार संदेश भेजकर व्यक्तिगत रेडियो संदेश की शुरुआत की। इसके बाद कनाडा के वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फेंसडेन ने 24 दिसम्बर , 1906 को रेडियो प्रसारण की शुरुआत की। उन्होंने जब वायलिन बजाया तो अटलांटिक महासागर में विचरण कर रहे जहाजों के रेडियो आपरेटरों ने अपने-अपने रेडियो सेट में सुना। कल्पना कीजिये कितना सुखद क्षण रहा होगा, लोग झूम उठे होंगे। संचार युग में प्रवेश का यह प्रथम पड़ाव था। उसके बाद पिछले 104 वर्षों का इतिहास बड़ा रोचक है। विज्ञान ने खूब प्रगति की। संचार के क्षेत्र में दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है।

भारत में 23 जुलाई, 1927 को प्रायोगिक तौर पर प्रसारण शुरू किया गया। उस समय की भारत सरकार एवं इंडियन ब्राडकास्टिंग लिमिटेड के बीच समझौते के तहत रेडियो प्रसारण प्रारंभ हुआ। यह कंपनी 1930 में निस्तारण में चली गई तो इसका राष्ट्रीयकरण इंडियन ब्राड कास्टिंग कॉरपोरेशन रखा गया। आजादी के बाद 1956-57 में इसका नाम ऑल इंडिया रेडियो या आकाशवाणी रखा गया। जहां तक आकाशवाणी का सवाल है, आजादी के समय 1947 में इसका केवल 6 केन्द्रों एवं 18 ट्रांसमीटरों का केन्द्र था तथा उसकी पहुंच केवल 11 प्रतिशत लोगों तक थी। आज आकाशवाणी के 231 केन्द्र तथा 373 ट्रासमीटर है तथा इसकी पहुंच 99 प्रतिशत लोगों तक है। भारत जैसे बहु संस्कृति, बहुभाषी देश में आकाशवाणी से 24 भाषाओं में इसकी घरेलू सेवा में प्रसारण होता है। आकाशवाणी मिडियम वेव, शार्ट वेव एवं एफ.एम के माध्यम से प्रसारण सेवा प्रदान करती है।

तब और अब में आज कितना फर्क हो गया है। एक समय था जब रेडियो ही संचार का प्रमुख साधन था लेकिन आज जमाना बदल गया है। धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक बैठा व्यक्ति सतत् एक दूसरे के संपर्क में रहता है। दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी घटना हो पलभर में सभी जगह प्रसारित हो जाती है। तेज गति से चल रहे इस कॉलखण्ड में रेडियो की बात बड़ी असहज लगती होगी लेकिन यह सच है कि किसी जमाने में रेडियो की अपनी अलग ही शान थी। रेडियो रखना, रेडियो सुनना और रेडियो के कार्यक्रमों में भाग लेना गौरव की बात होती थी। टेलीविजन के आने के बाद रेडियो श्रोताओं में कमी आई है लेकिन एफ.एम के आने के बाद अब पुनः रेडियो के दिन लौट रहे हैं।

आजादी के बाद रेडियो का इतिहास सरकारी ही रहा है। भारत में रेडियो सरकारी नियंत्रण में ही रहा है। आम आदमी को रेडियो चलाने की अनुमति हेतु अनेक क्षेत्रों से दबाव आया। सन् 1995 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि रेडियो तरंगों पर सरकार का एकाधिकार नहीं है। सन् 2002 में एन.डी.ए. सरकार ने शिक्षण संस्थानों को कैंपस रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति दी। उसके बाद 2006 में शासन ने स्वयंसेवी संस्थाओं को रेडियो स्टेशन चलाने की अनुमति दी। परंतु इन रेडियो स्टेशनों से समाचार या सम-सामयिक विषयों पर चर्चा के प्रसारण पर पाबंदी है।

6 thoughts on “भारत में रेडियो के बढ़ते कदम

  1. रेडिओ संबधी विस्तृत बात लिखने के लिए बधाई .अशोक बजाज जी ने २००७ में रायपुर में श्रोता समेलन में जो बाते कही वह सच है.मई उस श्रोता समेलन में उपस्थित था .

  2. रेडिओ एक ऐसी उपलब्धी है जो इन्सान को स्वस्थ मनोरंजन के साथ साथ अच्छे विचार प्रदान करता है.रायपुर में स्रोत समेल्लन में अशोक बजाज साहब से मुलाकात हुई थी.

  3. रेडियो का इतिहास अपने आप में बहुत व्यापक है जहां तक हमारे देश की बात है रेडियो न जाने कितने उतार चढ़ाव देखते हुए आज भी अधिकांश लोगो के मंनोरजंन और ज्ञानपिपासा को शांत करने में महती भूमिका निभा रहा है , परंतु इस माध्यम में जब से निजी चैनलो ने सेंधमारी की है और मंनोरजंन के नाम फुहडता प्रसारित करने में लगे हुए है तो थोडा दुःख भी होता है

    1. आल इंडिया रेडियो ,विविध भारती एवं आकाशवाणी के कार्यक्रमों की गुणवत्ता एवं समयावधि में वृद्धि कर निजी चैनलों के प्रति आम श्रोताओ को अनाकर्षित किया जा सकता है .

  4. रेडियो सम्बन्धी एतिहासिक तकनीकी विकाश तथा उसके सभी महत्वपूर्ण आयाम
    प्रस्तुत करने की बधाई .

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