लेखक परिचय

मिलन सिन्हा

मिलन सिन्हा

स्वतंत्र लेखन अब तक धर्मयुग, दिनमान, कादम्बिनी, नवनीत, कहानीकार, समग्रता, जीवन साहित्य, अवकाश, हिंदी एक्सप्रेस, राष्ट्रधर्म, सरिता, मुक्त, स्वतंत्र भारत सुमन, अक्षर पर्व, योजना, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, जागरण, आज, प्रदीप, राष्ट्रदूत, नंदन सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएँ प्रकाशित ।

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                                                                        petrolमिलन सिन्हा 

डीजल और पेट्रोल के कीमतें निरंतर बढ़ रहीं हैं। रुपये के  गिरते मूल्य के कारण खुदरा बाजार में बढ़ते कीमत को तेल कम्पनियां बिलकुल जायज बता रही है। कहना न होगा कि तेल के दाम में बढ़ोतरी का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव आम लोगों के उपयोग की हर चीजों एवं सेवाओं पर पड़ना लाजिमी है। लेकिन, किसे फ़िक्र है जनता को होनेवाली परेशानी का – न प्रधानमंत्री, न मुख्यमंत्री, न मंत्री, न अधिकारी और न ऐसे किसी प्राणी को जिसे जनता के पैसे से असीमित तेल खर्च करने की  आजादी इस  आजाद गणतंत्र में  सहज प्राप्त है।

दो दिन पूर्व एक चैनल में दिखाया जा रहा था कि किस – किस राज्य के मुख्यमंत्री के काफिले के साथ कितनी गाड़ियां तेल गटकते हुए दौड़ती रहती हैं। किसी के साथ सत्रह, तो किसे के साथ बारह।  सबसे कम छह गाड़ियों के साथ चलने वाले दो तीन मुख्यमंत्री हैं, बेशक त्रिपुरा के मुख्यमंत्री को छोड़ कर, जो सादगी का एक उदहारण हैं। सवाल है कि अगर कुछ मुख्यमंत्री छह गाड़ियों के साथ चल सकते हैं तो दूसरे  क्यों नहीं ? ( तेल के अलावे जो अन्य खर्च बचेंगे उसकी चर्चा नहीं हो रही है यहाँ, हालांकि उसपर भी खर्च बहुत होता है )  अब जब  मुख्यमंत्रियों का, जिनमे से कई अपने को लोहियावादी, प्रखर समाजवादी कहते नहीं थकते हैं और जो विकास के लिए पर्याप्त संसाधन न होने का रोना रोज रोते हैं, यह हाल है, तो उन प्रदेशों के अधिकारी व बाबू तेल खर्च करने में पीछे क्यों रहें ?

बड़े स्कूल, कॉलेज, मॉल, सिनेमा हॉल, सब्जी बाजार  आदि के पास अगर आपको यथासमय  रहने का मौका मिलने पर स्वत पता चल जाता है कि मंत्रियों, नेताओं, अधिकारिओं के द्वारा सरकारी वाहनों का कितना और कैसा दुरुपयोग शुद्ध निजी कार्यों के लिए किया जाता है, जिस पर हजारों करोड़ रूपया साल दर साल खर्च होता है।  एक मोटे अनुमान के मुताबिक केवल  केंद्र सरकार के मंत्रियों, अधिकारिओं आदि के वाहनों पर आनेवाला सालाना खर्च तीन हजार करोड़ रूपया से भी अधिक है।

सोचनेवाली बात है कि कर्ज लेकर इतना बड़ा खर्च का बोझ उठाने का क्या औचित्य है ? सभी जानते हैं कि देश के कुल तेल खपत का 80 % आयात से पूरा किया जाता है जिस पर पिछले वित्त वर्ष में 144 विलियन डालर चुकाना पड़ा था। देश में बढ़ते तेल खपत के कारण चालु वर्ष में तेल के आयात पर खर्च होनेवाली विदेशी मुद्रा हमारी अर्थ व्यवस्था को और भी चौपट कर देगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।

ऐसे में यह नितांत आवश्यक है कि तुरंत प्रभाव से सरकारी अमले द्वारा तेल के खपत को अत्यधिक कम करना पड़ेगा जिसकी शुरुआत केंद्र एवं राज्यों के मंत्रियों और अधिकारीयों द्वारा निजी कार्यों के लिए सरकारी वाहन का उपयोग बंद करने से हो। इससे एक सार्थक सन्देश  आम लोगों तक जाएगा । देश के प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्य मंत्रियों को अपने अपने काफिले में कम से कम गाड़ियों को शामिल करने का निर्णय स्वयं लेना चाहिए जिससे  खर्च  में कटौती तो हो ही, साथ ही  इस कठिन दौर में वे खुद जनता के वास्तविक प्रतिनिधि के रूप में खड़ा  पा  सकें। अन्य अनेक ज्ञात उपाय तेल के दुरुपयोग को रोकने और खपत को कम करने के दिशा में किये जाने के जरूरत तो है ही।

 

One Response to “अविलम्ब बंद हो तेल के दुरुपयोग का खेल”

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