लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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आर्ष ओजस
गत संसदीय चुनाव के दौरान कांग्रेस और यू०पी०ए० नेताओं पर हमला करनेवाली पुस्तकों की फेहरिस्त में एक पुस्तक ऐसा अग्नि-वाण सिद्ध हुआ है, जिसके प्रकाश में आते ही न केवल उस चुनाव में पासा पलट गया, बल्कि उसके बाद से अब तक हुए सभी चुनावों में उसकी कहानी ही घटित होती रही है । इसे महज संयोग समझा जाए अथवा स्वतंत्र्योत्तर भारत की राजनीति को चित्रित करने की दूरदर्शितापूर्ण लेखकीय युक्ति ; लेखक ने जो लिखा है सो तो घटित हो ही गया, जैसे लिखा है , ठीक वैसे ही घटित हुआ है । और, अब देश का बौद्धिक-राजनीतिक महकमा जिन प्रश्नों को लेकर मीडिया में खास कर टी०वी०-चैनलों पर बहस-विमर्श करता दिख रहा है , उनके उत्तर भी कायदे से दिए जा चुके हैं इस उपन्यास में । अर्थात , धर्मनिरपेक्षता और भारतीय राष्ट्रीयता को परिभाषित करने वाले प्रश्न । हालांकि बहस-विमर्श करने वाले लोग इस किताब से शायद अनभिज्ञ ही हैं अब तक ।
यह उपन्यास किसी नौकरशाह ने अथवा किसी राजनेता ने नहीं , बल्कि एक पत्रकार-साहित्यकार – मनोज ज्वाला उपाख्य एम०के०पाण्डेय द्वारा लिखा गया है । इसमें किसी घोटाला-भ्रष्टाचार अथवा पूर्ववर्ती सरकार की किसी अक्षमता का खुलासा नहीं हुआ है, बल्कि सेक्युलरिज्म का आपरेशन कर सेक्युलर्टाइटिस नामक एक राजनीतिक बीमारी की पड्ताल करते हुए तमाम सेक्युलर नेताओं को इस बीमारी के संक्रामक जिवाणु-विषाणु के रुप में आपत्तिजनक तरीके से चित्रित-विश्लेषित किया गया है । मालूम हो कि वर्ष २००९ में प्रकाशित ‘महात्मा की बेटी और सियासत’ नामक धारावाहिक उपन्यास की अगली कडी में १६वें लोकसभा-चुनाव से ठीक पहले प्रकाशित इस उपन्यास की पूरी कहानी चुनाव-परिणामों के साथ अक्षरसः घटित हो चुकी है और उसके पश्चात विभिन्न राज्यों के विधान-सभा-चुनावों के साथ आगे भी घटित होती जा रही है ।
प्रायः सभी सेक्युलर-नेताओं को पात्र बना कर हास्य-व्यंग्य शैली में लिखे गये इस उपन्यास के आवरण पर महात्मा गांधी और नरेन्द्र मोदी को आम जनता के साथ राष्ट्रीय एकात्मता-यज्ञ करते हुए तथा सोनिया-राहुल-दिग्विजय-लालू-मुलायम-नीतीश-ममता-केजरीवाल आदि सेक्युलर नेताओं को उस यज्ञ की लपटों से जलते-भुनते-झुलसते हुए उडते-भागते-विषैले कीट-फतंगों-मच्छरों के रूप में चित्रित-अभिहित किया गया है । जाहिर है, इस उपन्यास के नायक नरेन्द्र मोदी हैं, जो सेक्युलर्टाइटिस नामक महामारी के विरुद्ध वैचारिक महात्मा द्वारा किए गए जनजागरण के परिणामस्वरुप तैयार हुए व्यापक जनमत से अब इस देश के प्रधानमंत्री बन कर उपन्यास के कथानक व कथ्य की प्रामाणिकता को प्रामाणित कर रहे हैं ।
धारा ३७० को आधार बना कर लिखे गये इस उपन्यास में धर्मनिरपेक्षता पर व्यापक विमर्श हुआ है और देश के तमाम धर्मनिरपेक्ष दलों की भिन्न-भिन्न धर्मनिरपेक्षी नीतियों-करतुतों को उजागर करते हुए उन्हें तरह-तरह की व्यंग्यात्मक संज्ञा देकर चूभनेवाले विशेषण प्रदान किये गये है । मसलन- कांगेस की जजिया, हजिया, सफेद, रंगीन, दुधारु, गोधरी, निर्माणकारी व तीन सौ सतरी धर्मनिरपेक्षता, तो जदयू के नीतीश की
आसमानी धर्मनिरपेक्षता एवं राजद के लालू की मलाईदार धर्मनिरपेक्षता ; तृणमूल कांग्रेसी ममता दिदी की मासिक धर्मनिरपेक्षता व समाजवादी मुलायम की कठोर-भीषण धर्मनिरपेक्षता, तो द्रमुक के करुणानिधि की जिहादी धर्मनिरपेक्षता और वामपंथियों की अंतर्राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्षता तो आम आदमी के अरविंद केजरीवाल की हाईटेक धर्मनिरपेक्षता । इस उपन्यास में दलों और नेताओं के नाम थोडे बदले हुए जरुर हैं, किंतु यह बदलाव भी एक तरह का व्यंग्य ही है । इसमें कांग्रेस को कामरेस लिखा गया है , तो सोनिया को विदेशी बहुरानी , राहुल को युवराज, दिग्विजय सिंह को धिग्गी बाबू , अहमद पटेल को आमहद टपेल, सलमान खुर्शिद को सलनाम खुर्दिश, चिदम्बरम को चिरम्बरम और समाजवादी पार्टी को मसाजवादी पार्टी और उसके नेता मुलायम को मुलायमुद्दिन, तो राजद को अराजद और लालू को गालू ; जदयू को जडयू व उसके नीतीश को अनीतीश तो तृणमूल कांग्रेस को त्रयमूल कांग्रेस व ममता बनर्जी को मोमताज बानो अर्जी …. आदि-आदि….। इसी तरह से भाजपा को हिजपा लिखा गया है और आडवाणी को आजमानी, तो नरेन्द्र मोदी को नीरेन्द्र मोदी ।
‘सेक्युलर्टाइटिस’ की कथा वास्तव में “महात्मा की बेटी और सियासत” नामक उपन्यास की उस कथा के विस्तार की परिणति है, जिसके अनुसार महात्माजी इस देश की समस्त जनता के बापू हैं , तो जनता उनकी बेटी है-पुत्री है; जबकि उनकी मानस-पुत्री का नाम मीरा है, तो जनता और मीरा
दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं । अर्थात, उनकी बेटी जो है मीरा , सो व्यक्ति भी है , व्यष्टि भी है और समष्टि भी है । उनकी वह मानस-पुत्री ऐतिहासिक मीरा बेन तब अविवाहित रह गयी थी, जो आजादी के बाद जम्मु-कशमीर
में पुनर्जीवन धारण कर अब दक्षिण भारत के किसी महात्मावादी से विवाह करना चाहती है , किंतु संविधान की धारा-३७० के कारण सफल नहीं हो पा रही है ।
महात्माजी की बेटी अर्थात वह युवती एक ओर अविवाहित है तो दूसरी ओर व्यष्टि के रूप में वह पीडित-प्रताडित और समष्टि के रूप में विस्थापित-आन्दोलित है । ऐसे में महात्माजी को मुक्ति कैसे मिलती , सो वे भी देह धारण कर अवतरित हो उठे हैं । वे चाहते हैं कि उनकी बेटी अर्थात व्यक्ति-मीरा का अब शीघ्र परिणयन हो, व्यष्टि-मीरा का जीवन सुन्दर-सुखद हो और समष्टि-मीरा का समग्र उन्नयन हो ; किंतु बाधक बना है अपने देश का सेक्युलरिज्म । सेक्युलरिज्म अर्थात- धर्मनिरपेक्षता, जो उनके जमाने की राजनीति में इस कदर हावी नहीं थी कि इसके कारण खतरे में पड जाए राष्ट्रीयता । अतएव, उन्होंने देश के तमाम धर्मनिरपेक्ष नेताओं की प्रदर्शनी लगवा कर ‘धर्मनिरपेक्षता’ को नजदीक से देखने-समझने की कोशिश की, तो पाया कि यह तो वास्तव में ‘छद्म-साम्प्रदायिकता’ है और देश की एकता-अखण्डता के लिये घातक है, जिसका निदान ‘राष्ट्रीय एकात्मता’ है । इसलिए वे चाहते हैं कि देश में ‘राष्ट्रीय एकात्मता’ और ‘हिन्द-स्वराज’ की व्यवस्था कायम हो । इस बावत वे पिछले कई वर्षों से देश भर में घूम-घूम कर विभिन्न रूपों में साम्प्रदायिकता के विरूद्ध जनजागरण करते रहे हैं । १५वीं लोकसभा के चुनाव में ही वे कांग्रेस को अपने प्रस्तावित ‘राष्ट्रीय एकात्मता यज्ञ’ के आयोजन का अभ्यावेदन दे चुके थे और चेता दिये थे कि “जिसके हाथ में है केन्दीय सता की कमान , उसे बनना ही होगा राष्ट्रीय एकात्मता यज्ञ का यजमान, अन्यथा जनता ‘हिजपा’ को सौंप देगी सत्ता की कमान, क्योंकि हिजपा तो शुरु से ही चाहती है कि देश में कानून हो एक समान” । किंतु कांग्रेस-नेतृत्व महात्मा की बातों को हल्के में लेता रहा । फलतः राष्ट्रीय विचारों में अवतरित महात्मा के जनजागरण का ऐसा हुआ परिणाम कि हिजपा के हाथों में आ गई केन्द्रीय सत्ता की कमान और मोदीजी बना दिये गये राष्ट्रीय एकात्मता यज्ञ के यजमान । अब आगे देखिये कि हिजपाई सत्ता से भी महात्मा की बेटी ( व्यक्ति-व्यष्टि-समष्टि ) का कल्याण होता है या महात्माजी को फिर चलाना पडेगा कोई जनजागरण अभियान ।
इस उपन्यास में धर्मनिरपेक्षता पर व्यापक विमर्श हुआ है और बताया गया है कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ तो हुआ ही नहीं जा सकता है । दिल्ली के लेखनी प्रकाशन से प्रकाशित लगभग ३०० पृष्ठों के इस उपन्यास में धर्मनिरपेक्षता के अर्थ, विलोमार्थ, समानार्थ, निहितार्थ व यथार्थ की विषद व्याख्या के साथ यह प्रामाणित किया गया है कि वास्तव में यह तो छद्म-साम्प्रदायिकता है, जो विभेदकारी व विभाजनकारी होने के कारण प्रत्यक्ष साम्प्रदायिकता से ज्यादा खतरनाक है, जबकि इसका निदान राष्ट्रीय एकात्मता है । किताब में जिस तर्क व अर्थ से धर्मनिरपेक्षता को छद्म-साम्प्रदायिकता घोषित-प्रमाणित किया गया है और उसके विरूद्ध जिस दमदार तरीके से राष्ट्रीय एकात्मता का पक्ष-पोषण करते हुए धारा ३७०सहित अन्य कई कानूनों को समाप्त करने की वकालत की गयी है, उससे देश के राजनीतिक फलक पर एक नया बहस जरूर खडा हो गया है कि क्या सचमुच ही धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता दोनों एक ही हैं ? और, क्या सचमुच ही धर्मनिरपेक्ष हुआ ही नहीं जा सकता ? इस उपन्यास के सभी पात्र प्रायः जीवित हैं, जो धर्मनिरपेक्षता के आर-पार विभिन्न राजनीतिक दलों, मीडिया प्रतिष्ठानों, एन०जी०ओ० संस्थानों से सम्बद्ध हैं । धर्मनिरपेक्षता पर लिखते-बोलते रहने वाले बौद्धिक-साहित्यिक विद्वानों और कलाकारों को भी लेखक ने इस बहस में शामिल किया हुआ है । इनमें से अनेक लोगों को लेखक द्वारा उन्हें अभिहित किया जाना आपत्तिजनक लग सकता है, किन्तु तथ्यों की प्रामाणिकता इतनी पुष्ट है कि वे तिलमिला कर चुप रहने के सिवाय और कुछ कर ही नहीं सकते ।
पुस्तक- ‘सेक्युलर्टाइटिस’- गुजरात से दिल्ली तक
लेखक- मनोज ज्वाला (एम०के०पाण्डेय)- ९४३१३०८३६२
मूल्य- ५००/- रुपये
प्रकाशक- लेखनी प्रकाशन, हिन्दुस्थान समाचार, नई दिल्ली
* आर्ष ओजस,
देव-संस्कृति विश्वविद्यालय,
हरिद्वार-

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