लेखक परिचय

प्रभांशु ओझा

प्रभांशु ओझा

प्रभांशु ओझा ,योजना ,कुरुक्षेत्र ,जैसे विभिन्न पत्र पत्रिकाओं तथा भारत के विभिन्न समाचार पत्रों में विभिन्न पर्यावरणीय और अन्य प्रासंगिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं और राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न वाद विवाद प्रतियोगिताएं में 600 से अधिक पुरस्कार जीत चुके हैं .पर्यावरण पर मुंबई में आई डी एफ सी संस्था द्वरा आयोजित वाद विवाद प्रतियोगिता जिसमे की 2 लाख से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया प्रथम स्थान प्राप्त कर चुके हैं

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ajay-jiप्रभांशु ओझा

मजरूह सुल्तानपुरी का बड़ा प्रसिद्ध शेर है कि –मै तो अकेला ही चला था ज़निबे मंजिल मगर ,लोग मिलते गए और कारवां बनता गया. सच ही है की अगर किसी कार्य का दिल से जूनून और जज्बा हो आपके मन में तो उसकी शुरुवात बिना किसी का इंतजार किये अकेले भी की जा सकती है .ऐसी ही एक मिसाल हैं आज हमारे बीच श्री अजय कुमार जी ,जिनका सपना है की स्वास्थ्य हर नागरिक का मौलिक अधिकार बने .स्वास्थ्य जो कि हमारे अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा है ,कहा भी जाता है की अच्छे तन में ही अच्छे मन का निवास होता है लेकिन यह विडम्बना ही है कि आज तक उपेक्षित ही रहा है.यह हर्ष का विषय की अजय जी की इस मुहिम का समर्थन पक्ष –विपक्ष के लगभग 28 सांसद गण और कुछ केन्द्रीय मंत्रियों द्वारा पत्र जारी करके किया जा चुका है.अजय कुमार बिहार में पटना जिले के सुदूर गाँव भगवानपुर के रहने वाले हैं और वर्तमान में केन्द्रीय सरकार कर्मचारी कल्याण परिषद् के संयुक्त सचिव हैं और दो बार अध्यक्ष भी रह चुके हैं और स्वास्थ्य मौलिक अधिकार बने इस दिशा में अनवरत प्रयासरत हैं. .स्वास्थ्य मौलिक अधिकार बन जाएगा तो आम जन को इससे क्या लाभ होगा ? इस अभियान के उद्देश्य क्या हैं ? तथा स्वास्थ्य के अन्य पहलुओं पर एक विस्तृत बातचीत स्वतंत्र पत्रकार प्रभांशु ओझा ने की .प्रस्तुत है अजय कुमार से बातचीत के प्रमुख अंश-

-स्वास्थ्य मौलिक अधिकार बने ,यह बात आपके मन में कब और कैसे आई?

अजय-स्वास्थ्य को लेकर मेरी चिंताएं मेरे स्कूली दिनों से ही रही हैं .वहां मैंने दूरदराज के गावों में तमाम लोगों को अकाल मृत्यु प्राप्त करते देखा है.प्रसव के लिए चारपाई के साथ दूर के अस्पताल में ले जाई जा रही महिलाओं को मैंने दम तोड़ते देखा है ,उचित समय पर इलाज़ न हो पाने के आभाव में मैंने तमाम युवाओं और बच्चों को दम तोड़ते देखा है और इन परिस्थितियों ने मुझे झकझोर कर रख दिया .केंद्र सरकार में नौकरी के बाद मैंने यह प्रयास केन्द्रीय सरकार कर्मचारी कल्याण परिषद के माध्यम से व्यापक रूप से शुरू किया .एक केन्द्रीय कर्मचारी के रूप में तो मुझे स्वास्थ्य से लेकर ज्यादातर सुविधाएँ उपलब्ध हैं लेकिन आम जन की चिंता मुझे हर पल सताती रहती है.जिस घटना ने मुझे

झकझोर कर रख दिया वह ये थी की एक महिला जो दिल की गंभीर बीमारी से पीड़ित थी जब एम्स में वह इलाज के लिए गयी तो उसे 6 वर्ष बाद का समय दिया गया और आश्चर्य की बात यह है की ऐसा उस स्थिति में हुआ जबकि उसके पास तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री का पत्र भी था.

-स्वास्थ्य अगर मौलिक अधिकार बनता है तो इससे आम जन को क्या विशेष लाभ होंगे ?

अजय-इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा की कोई भी अस्पताल उसके इलाज से उसे मना नहीं कर सकेगा.जबकि अक्सर आप खबरों में देखते होंगे की गंभीर स्थिति में कोई मरीज गया और अस्पताल ने उसके इलाज से मना कर दिया जिससे की उसकी मृत्यु हो गयी,उसका इलाज किया जाता तो उसे बचाया जा सकता था .मेरा यह मानना है की राज्य के हर नागरिक की जान बेशकीमती है और सरकार द्वारा उसे हर संभव रूप से सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए .अच्छा स्वास्थ्य जिस दिन हर नागरिक का मौलिक अधिकार बन गया उस दिन देश की सूरत बदलते भी देर नहीं लगेगी .स्वास्थ्य नागरिक ही स्वास्थ्य राष्ट्र का निर्माण कर सकते है.

-अब तक यह मुहिम कहाँ तक पहुंची है ?सरकार द्वारा क्या प्रतिक्रिया रही है?

यह हर्ष का विषय है कि पक्ष और विपक्ष के लगभग 28 सांसदों और कुछ केंद्रीय  मंत्रियों द्वारा इस मुद्दे को संसद में भी उठाया जा चुका है और माननीय स्वास्थ्य मंत्री श्री जेपी नड्डा जी को भी पूरे मामले से अवगत कराया जा चुका है.मीडिया और आमजन का भी भरपूर सहयोग इस मुहिम को मिल रहा है.

-सरकार को क्या समस्या है स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार बनाने में ?

अजय-देखिए कोई इस तरह की विशेष समस्या नहीं है .स्वास्थ्य और शिक्षा तो सरकार की प्रमुखता में होने ही चाहिए.हमारे पास पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं इस पवित्र कार्य हेतु.हां यह जरूर है की क्यूँकी यह केंद्र के साथ ही साथ राज्य का भी विषय है यानी समवर्ती सूची का हिस्सा है तो केंद्र और राज्य सरकारों को मिलजुलकर इस मामले को गंभीरता पूर्वक आगे बढ़ाना होगा और एक दूसरे का सहयोग करना होगा.

 

-स्वास्थ्य अब तक जन –जन का मुद्दा क्यूँ नहीं बन पाया है ,जब की यह हमारे अस्तित्व से जुड़ा इतना जरूरी मुद्दा है ?

अजय-इसे विडम्बना ही कहेंगे की हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसा महत्वपूर्ण मुद्दा ,जो की हमारे अस्तित्व से जुड़ा हुआ है ,वह इतना उपेक्षित है .डब्ल्यू एच ओ की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक 1000 व्यक्तियों पर एक डॉक्टर होने चाहिए लेकिन यह आंकड़ा हमरे देश में लगभग 1700 है ,जो की चिंताजनक है.कायदे से तो होना यही चाहिए की जन जागरूकता इस स्तर की बढे की दूसरे गौण मुद्दों की बजाय स्वास्थ्य और पर्यावरण चुनाओं का भी मुद्दा बने ,तभी सरकारें भी इस पर गंभीर होंगी.यहाँ मेरी एक सलाह यह भी होगी की स्वास्थ्य के मुद्दे को रोजगार से भी जोड़ा जाए .गाँव-गाँव में वालंटियर्स तैयार किये जाएँ जो अस्पतालों तक एमर्जंसी की स्थिति में मरीज को तत्काल पहुंचा सकें.और इस सेवा के लिए उन्हें अपेक्षित मानदेय भी दिया जाये.

 

-सरकार के अलावा आप आम नागरिकों को क्या सलाह देना चाहेंगे स्वास्थ्य को लेकर?

अजय-एक महत्वपूर्ण बात मै यहाँ कहना चाहूँगा की भौतिक स्वास्थ्य के साथ ही साथ हमारा मानसिक स्वास्थ्य भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है .आज आप देखिए की अच्छी नौकरी ,अच्छा घर होने के बावजूद इन्सान अकेलेपन का शिकार है,वह तनाव का शिकार है. गला काट प्रतिस्पर्धा के युग में वह आत्महत्या को ही आखिरी विकल्प मान लेता है.यह स्थितियां चिंताजनक हैं.इसके लिए सरकारी स्तर पर तो यह प्रयास करना चाहिए की अस्पतालों में साइकेट्रिस्ट की व्यस्था हो,विद्यालयों और महाविद्यालयों में काउंसलर्स हों.नागरिक के स्तर पर यह प्रयास होना चाहिए की वह एक तो को ही सबकुछ न समझे बल्कि परिवार से भी बातचीत करे ,उसके लिए समय निकाले.नियमित व्यायाम और योग करें .खानपान का ध्यान रखें .एक डाईट चार्ट डॉक्टर की सलाह पर तैयार करें .क्या खाना है इससे ज्यादा यह महत्वपूर्ण है की क्या नहीं खाना है. यह ध्यान रखें की स्ववास्थ्य से बढ़कर कोई धन नहीं है.आइए हम सब मिलकर इस दिशा में कदम बढाएं की स्वास्थ्य हर नागरिक का मौलिक अधिकार बने.

 

-बहुत बहुत आभार और शुभकामनाएँ आपको इस जरूरी अभियान के लिए

अजय-जी आपका भी बहुत बहुत धन्यवाद.आशा है की आपके माध्यम से मेरी बात दूर-दराज तक पहुँच सकेगी.

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