लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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अशोक गौतम

हम जैसों को तो नरक की न जिंदे जी चिंता होती है न मरने के बाद, क्योंकि हमें पता होता है कि हमें हर समय ही भोगना है पर अपने शहर के कम्युनिटी हाल में शहर के धनाढयों द्वारा मरने के बाद नरक से मुकित हेतु कराए जा रहे सप्ताह के चौथे दिन मुफ्त में स्वर्ग की अति चाह रखने वाले स्वर्गवासियों को संबोधित करते हुए स्वच्छंद जी बोले,’ हे स्वर्ग की कामना मुफ्त में करने वालो!आज लोगों के अखराजात इतने बढ़ गए हैं कि सिंगल कमाने वाले से तो सिगंल का गुजारा भी नहीं हो रहा। इसलिए हर विवाह योग्य हर पुरूष को चाहिए कि अगर उसे कमाने वाली बीवी मिल जाए तो वह विवाह में देर न करे। बस झट उससे विवाह कर ले। बीवी कमाने वाली न मिले तो छड़े रहने में ही प्रभु प्राप्ति है।पर सुखद, समझदार ऐसा कर भी रहे हैं। विवाह करते हुए वर बस स्त्री के वेतन को देखे, स्त्री के लक्षणों को न देखे। बिना नौकरी वाली स्त्री भले ही कितने उत्तम लक्षणों की क्यों न हों, वह अपने विशुद्ध आचरण से नौकरी विहीन होने के चलते अपने दीर्घायु पति को भी अल्पायु व दुख का भागी बना देती है।

उस बेचारे को फिर समाज में पता नहीं क्या क्या करना पड़ता है। घर में हर समय पड़ोस को देख तनाव रहने लगता है। अत: इस तनाव से बचने के लिए हर पुरूष को आज की डेट में लक्षणा, सुलक्षणा को छोड़ बस कमाऊ बीवी को ही अपनाना चाहिए। यदि……

अभी स्वच्छंदजी अपना वाक्य भी पूरा नहीं कर पाए थे कि सामने से ब्रहमा जी आते दिखे। चेहरे पर इत्ती उदासी कि… मानों चारों खाने चित्त होकर आ रहे हों। उन्हें अपनी ओर आते देख स्वच्छंदजी उनके अभिवादन, स्वागत को दोनों हाथ जोड़ खड़े हो गए। स्वच्छंदजी को ब्रहमा जी के स्वागत के लिए दोनों हाथ जोड़ खड़ा देख वहां पर उपसिथत भक्त भी उनके स्वागत के लिए हाथ जोड़े खड़े हो गए तो स्वच्छंदजी ने बहमा जी की उदासी का कारण पूछते पूछा- हे प्रभु , यह ब्रहमांड क्या देख रहा है? तीनों लोकों के स्वामी की यह दशा? किसीको ग्लोबल वार्मिंग की कतर्इ चिंता नहीं, बुद्धिजीवी हैं कि ग्लोबल वार्मिंग को बस सेमीनार पर सेमीनार कर पर्यावरण को और भी दूषीत किए जा रहे हैं और एपीआर्इ स्कोर के मारे प्रोफेसर अपने नबेर बनाए जा रहे हैं, आपके मुखारविंद को देख तो यही लगता है कि सृष्टि का विनाश होने वाला है।

तब ब्रहमा जी ने स्वच्छंदजी के आसन के सामने बिछे आसन पर बैठ कुछ देर आराम करने के बाद कहा- नहीं स्कंद! ऐसी बात नहीं! सृष्टि का विनाश अभी नहीं होगा! अपने को टीवी के सामने लाने वाले जो बकें बकते रहें। अभी मृत्युलोकियों के पाप का घड़ा रत्ती भर भी नहीं भरा है। हां! अपने देश के नेताओं का कुछ कुछ भर रहा है। इससे प्रलय होने वाला तो नहीं पर सरकार का कुछ जरूर होने वाला है।

तो प्रभु! आपके चेहरे पर उदासी का कारण??

वत्स! क्या बताऊं! देवभूमि में क्षय होते धर्म की स्थापना करने के लिए यह सोच कर स्वर्ग से निकला था कि वहां अपने मंदिर का निमार्ण कर धर्म के स्तर पर क्षय होते समाज में पुन: धर्म की स्थापना तो करूं ही साथ ही साथ युगों से हाथ पर हाथ धर खाने वालों की रक्षा करते हुए चार औरों को रोजगार भी दूं। पर वहां जब अपने मंदिर के लिए जगह खोजने निकला तो कहीं भी जमीन न मिली। सारी जगहों के अवैध सौदे! कइयों से मंदिर बनाने के बारे बात की तो सभी कन्नी काट गए। बोले- मंदिर बनाने से क्या होगा? कोर्इ होटल शोटल बनाना हो तो कहो, कोर्इ पैसे वाला आए तो जमीन के मुंह मांगे दाम मिलें। मंदिर के लिए जमीन! न बाबा न! थक हार कर बड़े परिश्रम से एक र्इमानदार भक्त प्रापर्टी डीलर से मिल मिला एक जगह जमीन मिल ही गर्इ तो रजिस्ट्री करवाने के चक्कर पे चक्कर! बाप रे बाप! छठी का दूध याद आ गया। पर रजिस्ट्री फिर भी न हुर्इ! फिर प्रापर्टी डीलर ने बताया कि अभी तो टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के आफिस में भी जाना पड़ेगा। वहां तो बड़े बड़े बंदों का भी तेल निकल जाता है। पता नहीं लोग कैसे जमीन अपने नाम करवाते हैं? लोग कैसे अपने मकान बना इस देश में रह रहे हैं स्वच्छंद? कह उन्होंने दिसंबर में भी अपने माथे पर आए पसीने को पोंछा जबकि इन दिनों तो पसीना भी ठंड से कांपता दिखता है।

बस प्रभु! इत्ती सी बात! प्रभु होकर भी आप इत्ते परेशान हो तो सोचो आपके देश में आपके द्वारा भेजे बंदे कैसे रह रहे होंगे जहां न तरीके से पानी मिलता है, न सांस लेने के लिए हवा। फिर भी लोग हैं कि मजे से पानी भी पी रहे हैं और सांस भी ले रहे हैं। खाने में तो उनका कोर्इ सानी नहीं!

तो इसका राज वत्स!

असल में प्रभु अपुन के देश के हर शौचालय से लेकर सचिवालय में दो दरवाजे हैं। एक आगे का दरवाजा तो दूसरा पीछे का दरवाजा। यहां के आगे के दरवाजे दिखाने के लिए दस से पांच के बीच खुले रहते हंै, पर जनता को तो छोडि़ए, दरवाजोें को भी नहीं लगता कि वे खुले हैं। इसलिए सारे काम पिछले दरवाजे से ही होते हैं। पिछले दरवाजे आपके देश में चौबीसों घंटे खुले रहते हैं प्रभु! वे अपने भक्तों का इंतजार पलकें बिछाए करते रहते हैं। और तो छोडि़ए प्रभु! यहां के मंदिरों में भी दो दो दरवाजे हैं। एक आगे का तो दूसरा पीछे का। व्यवहारिक भक्त पिछले दरवाजे से आपके दर्षन कर मनोवांछित फल पा आगे हो लेते हैं तो आगे के दरवाजे के आगे अव्यवहारिक भक्त हाथ में प्रसाद पकड़े पकड़े चार चार दिन तक लाइन में खड़े हो एक दूसरे को धकियाते जिम्हाइयां लेते रहते हैं।

पर वत्स मैंने तो ऐसा दरवाजा वहां नहीं देखा। ब्रहमा जी ने भोलेपन से कहा तो स्वच्छंदजी दोनों हाथ जोड़े बोले- प्रभु! उन दरवाजो को देखने के लिए दिव्य चक्षुओं की नहीं, व्यवहारिक चुक्षओं की आवश्यकता होती है और वे आपके पास नहीं! पर आपके बनाए अधिकतर प्राणियों के पास मौजूद हैं। कइयों के पास तो दूसरी आंखें हैं ही नहीं। जिनके पास नहीं हैं वे सड़क से लेकर संसद तक मजे कर रहे हैं। उन्हें आगे का दरवाजा सूझता ही नहीं। उन्हें पता ही नहीं कि आगे का दरवाजा भी होता है। काम करवाने वालों को सूझना भी नहीं चाहिए।

तो???

तो पिछले दरवाजे की तलाश करो प्रभु! देखो तो, जनता के निनयानवे प्रतिशत काम वहीं से निकल रहे हैं। मंदिर बनवाना है, थोड़ा बहुत कमाना है तो देव बन कर नहीं, सांसारिक बन जेब में आदर्ष नहीं, नोट ले आफिस में प्रवेश करो। आफिस वाले हाथों हाथ न लें तो कहना

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