मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थू?

निर्मल रानी

भारतीय राजनीति में पिछले दिनों उस समय एक कोहराम सा बरपा हो गया जबकि कांग्रेस पार्टी के युवराज कहे जाने वाले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने अपने एक बयान में उत्तर प्रदेश के सबसे अधिक भिखारी होने जैसी ‘कटु’ शब्दावली का जि़क्र कर दिया। देश के लगभग सभी प्रमुख राजनैतिक दलों के नेता एक के बाद एक मीडिया के समक्ष आकर राहुल गांधी के इस बयान की घोर आलोचना करते दिखाई दिए। और तो और शिवसेना व महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेतागण भी इस बात को लेकर राहुल गांधी की आलोचना करने से नहीं चूके। राहुल गांधी के सभी आलोचकों द्वारा एक तीर से दो निशाने साधे जा रहे थे। एक तो राहुल गांधी की निंदा कर उन्हें नीचा दिखाने, कमज़ोर करने व उन्हें राजनैतिक रूप से अपरिपक्व बताने की कोशिश करना और दूसरे उत्तर प्रदेश की अवाम के दिलों में अपने प्रति हमदर्दी जगाने का एहसास पैदा करना।

अब आईए उसी राज्य उत्तर प्रदेश के कुछ ऐसे वास्तविक तथ्यों पर नज़र डालते हैं जिन्हें सुनकर हम गदगद् हो जाते हैं और मारे खुशी के फूले नहीं समाते। उदाहरण के तौर पर हिंदू धर्म के सबसे बड़े दो प्रमुख आराध्यों भगवान श्रीराम व श्री कृष्ण की जन्मस्थली आज के उत्तर प्रदेश राज्य में ही स्थित है। इसके अतिरिक्त देश के बड़े से बड़े संतों व पीरों फकीरों का भी यह प्रदेश प्रमुख केंद्र है। देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश, देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री व सांसद देने वाला भी राज्य है। ताजमहल जैसा विश्व के सात अजूबों में से एक अजूबा इसी राज्य के आगरा शहर में स्थित है। नवाबों का शहर कहा जाने वाला लखनऊ इसी प्रदेश की राजधानी है। इस प्रकार के अलंकरण युक्त वास्तविक तथ्य सुनते हुए हमारे कानों को कितना भाता है। और आगे बढ़ें तो हम देखेंगे कि देश के सबसे अधिक साहित्यकार, लेखक, कवि, मिर्ज़ा ग़ालिब, अकबर इलाहाबादी, जिगर मुरादाबादी, महादेवी वर्मा, फिराक गोरखपुरी क्या नहीं है इस राज्य की आग़ोश में? चंद्रशेखर आज़ाद व अशफाक उल्लाह से लेकर वीर अब्दुल हमीद तक के राष्ट्रभक्त अमर शहीद सेनानी इसी राज्य की माटी के सुपूत हैं। देश के सर्वोच्च शिक्षण संस्थान इसी राज्य में, देश को प्रत्येक वर्ष सबसे अधिक भारतीय प्रशासनिक अधिकारी देने वाला यही उत्तर प्रदेश। फिल्म जगत में तमाम महत्वपूर्ण अभिनेता, निर्देशक व देश के तमाम उद्योगपति सब इसी राज्य से संबंधित हैं। और यदि हम थोड़ा और पीछे की ओर जाएं तो तुलसीदास, कबीरदास, जायसी जैसे तमाम प्राचीन कवियों की कर्मभूमि भी आज का यही उत्तर प्रदेश रहा है। पवित्र संगम तथा काशी व सारनाथ इसी प्रदेश के आंचल में समाए हुए हैं। उर्दू, अवधी, भोजपुरी जैसी भाषाओं की परवरिश का भी यही राज्य गहवारा रहा है। यह सब बातें सुनकर हमें कितना आनंद आता है। क्योंकि उपरोक्त सभी बातें सच्ची हैं, सुंदर हैं, आकर्षक हैं, सकारात्मक हैं तथा राज्य के सभी निवासियों को अच्छी लगती हैं।

परंतु सवाल यह है कि इसी सिक्के के दूसरे पहलू को देखना हम गवारा क्यों नहीं करते? हम ऐसा क्यों चाहते हैं कि दुनिया की सभी अच्छाईयां तो हमारे खाते में गिनी जाएं परंतु नकारात्मक वास्तविकताओं को दूसरों के मत्थे मढ़ दिया जाए? उत्तर प्रदेश की उपरोक्त उल्लिखित लगभग समस्त विशेषताओं का एक प्रमुख कारण वहां का बहुत बड़ा क्षेत्रफल तथा सबसे बड़ी आबादी है। जहां बड़ा क्षेत्रफल व बड़ी आबादी का होना तमाम विशेषताओं को अपने-आप में समेटता है, वहीं यही बातें तमाम नकारात्मक परिस्थितियों का भी कारण बनती हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा राज्य है जो देश में सबसे तेज़ व अधिक जनसंख्या वृद्धि का जि़म्मेदार है। अधिक जनसंख्या होने के कारण सबसे अधिक बेरोज़गारी भी इसी राज्य में है।इसी कारण सबसे अधिक पलायन भी इसी राज्य के लोगों द्वारा किया जाता है। देश व दुनिया में पाए जाने वाले भारतीय प्रवासी मज़दूर सबसे अधिक इसी राज्य से संबंधित होते हैं। इसके अतिरिक्त नकारात्मक तथ्यों का जहां तक प्रश्र है तो सबसे अधिक गैंगस्टर, अराजक तत्व यहां तक कि फिल्म जगत का दशकों तक आकर्षण बना रहा चंबल घाटी का काफी बड़ा क्षेत्र भी इसी राज्य में स्थित है। जहां तक प्रदेश की राजनैतिक दशा का प्रश्र है तो निश्चित रूप से लगभग पूरे देश के राजनैतिक हालात इस समय अत्यंत दयनीय हो रहे हैं। परन्तु उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जिसमें आज भी सबसे अधिक सम्प्रदायवाद व जातिवाद की राजनीति का बोलबाला रहता है। अपराधी प्रवृत्ति के लोग बेशक पूरे देश से चुनाव लड़ते देखे गए हों, परंतु उत्तर प्रदेश में तो चंबल के डाकुओं को विधानसभा व लोकसभा के चुनाव लड़ते व विजयी होते भी देखा गया है।

अब क्या यह सच्चाईयां हमें उसी प्रकार सहर्ष स्वीकार नहीं कर लेनी चाहिएं जिस प्रकार की हम उपरोक्त प्रशंसा को सुनकर $खुशी के मारे फूले नहीं समाते। अब आईए भिखारी शब्द को देखते हैं।। तो इसका रिश्ता भी सीधे तौर पर धर्म व धर्म स्थानों से जुड़ा हुआ है। अयोध्या, मथुरा, वृंदावन तथा हरिद्वार जैसे स्थान हमारे पवित्र देवी देवताओं से सीधी तरह जुड़े हुए हैं। करोड़ों भक्तजन पूरे देश व दुनिया से इन तीर्थस्थलों पर जाते हैं तथा वहां दान-पुण्य जैसे धार्मिक कत्र्तव्यों का निर्वहन करते हैं। इस प्रकार के दान-दक्षिणा को ग्रहण करने के लिए आखिर भिक्षा ग्रहण करने वाले लोगों की भी दरकार होती है। अब यह भिखारी आखिर कहां से लाए जाएं? यह भी हो न हो इसी प्रदेश के ही लोग होते हैं जोकि भिक्षा लेते-लेते पूरी तरह से इसी व्यवस्था पर आधारित हो जाते हैं तथा बाद में नि:शुल्क रेल यात्रा जैसी अघोषित सरकारी सुविधा पाकर उन क्षेत्रों की ओर निकल पड़ते हैं जहां इनका व्यवसाय अर्थात् भीख मांगना परवान चढ़ सके। फिर अब चाहे तीर्थस्थल हों मुंबई, पंजाब, हरियाण, दिल्ली, कोलकाता जैसे महानगर हों या फिर देश के तमाम रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म। राहुल गांधी ने क्या गलत कहा कि किसी भिखारी से पूछ कर तो देखो वह स्वयं को यूपी का बताता है। निश्चित रूप से राहुल गांधी का प्रत्येक आलोचक रेलवे प्लैटफ़ार्म पर या बाज़ार में फिरने वाले किसी भिखारी से जब उसका राज्य पूछेगा तो 90 फीसदी संभावना इसी बात की है कि वह स्वयं को यूपी का ही बताएगा। उसकी बोल-भाषा से भी साफ पता चल जाएगा कि वह उत्तर प्रदेश का रहने वाला है।

निश्चित रूप से यह एक अलग प्रकार की बहस है कि भिाखारियों में उत्तर प्रदेश के लोगों की संख्या सबसे अधिक होने का दरअसल राजनैतिक व प्रशासनिक कारण क्या है, इसका जि़म्मेदार कौन है और इसका निवारण कैसे किया जाना चाहिए। परंतु इस वास्तविकता का सबसे बड़ा कारण धर्म, धर्मान्धता, दानी सज्जनों द्वारा जगह-जगह दिया जाने वाला दान तथा दूसरी ओर सरकार द्वारा निठल्लों के प्रति बरती जाने वाली ढिलाई, विशेषकर ट्रेनों, स्टेशन प्लेटफार्म, बस अड्डों,पार्कों आदि में इन भिाखरियों का आज़ादी से घूमना, फिरना व रहना, इनका आलसीपन, निठल्लापन, हरामखोरी की बढ़ती जा रही प्रवृत्ति तथा दान के पैसों पर पलने की पड़ चुकी इनकी आदत आदि भी है। ऐसे लोग दरअसल प्रदेश की इज़्ज़त-आबरू व मान-सम्मान के लिए भी बदनामी का कारण बनते हैं। सोचना यह चाहिए कि राहुल गांधी जैसे व्यक्ति को किन परिस्थितियों में ऐसा कहने के लिए बाध्य होना पड़ा। बजाए इसके कि ऐसा कहने के लिए राहुल गांधी की आलोचना की जाए कि उन्होंने उत्तर प्रदेश को ऐसा क्यों कहा। राहुल गांधी ने जो भी कहा है उसे लेकर उनकी आलोचना करने के लिए जो शक्तियां जिस ढंग से एकमत होकर सामने आई, उसमें ज़रूर पूरी राजनीति नज़र आई। यही सभी शक्तियां यदि ठाकरे घराने द्वारा उत्तर भारतीयों पर किए जा रहे अत्याचार व उनके विरुद्ध ज़हर उगलने के समय ठाकरे घराने के खिलाफ एकजुट हुई होतीं तो संभवत: उत्तर प्रदेश के लोगों को आत्मीयता का अधिक एहसास होता तथा वे स्वयं सुरक्षित भी महसूस करते। परंतु ऐसा करने के बजाए राहुल के वक्तव्य के पीछे सभी का एकसाथ हाथ धोकर पड़ जाना तो यह दर्शाता है कि हमें अपने राज्य की प्रशंसा तो स्वीकार्य है कड़वी सच्चाई का जि़क्र कतई नहीं। गोया मीठा-मीठा गप्प कड़वा-कड़वा थू।

3 thoughts on “मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थू?

  1. kitnai पैसे अपने liye राहुल जी साईं, yai लेख लिखने kai ??????????????????????????

  2. उत्तर प्रदेश की बर्बादी में ५०% योगदान कोंग्रेस (गांधी-नेहरू परिवार) का, २५% मायावती का और २५% मुलायम का है.

    उत्तर प्रदेश की बुलंदी में १००% योगदान उत्तर प्रदेश की जीवट और मेहनतकश जनता का है.

  3. ऐसे आपका यक लेख आदमी को सोचने के लिए बाध्य अवश्य करता है,पर आपका यक लेख सत्य से मीलों परे है.मैंने पहले भीलिखा है कि भिखारियों का न कोई राज्य होता है न कोई स्थाई स्थल और न वे किसी बेरोजगारी के शिकार होते हैं.भीख मांगना उनका पेशा है और वे बहुधा अपने इस पेशे से खुश भी नजर आतें हैं.भीख मांगना कुछ लोगों के लिए मजबूरी भी हो सकती है और उसमे सभी राज्यों का कुछ न कुछ हिस्सा सम्मिलित है. वृन्दावन में इतनी बंगाली विधवाएं भीख मांगती हुई मिल जायेंगी कि तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन करने से उतनी विधवाएं वहां उत्तर प्रदेश कीनहीं मिलेगी..राहुल गांधी ने कितने भिखारियों से यह पूछा होगा?वे तर्क शाश्त्र में वर्णित फैलेसी आफ इल्लिसित जेनारालैजेसन के शिकार हैं.दो चार भिखारियों से पूछ कर पूरे भिखारी वर्ग का सामुहिकरण नहीं किया जा सकता..अगर ऐसा हीं है तो क्या वे बता सकते हैं कि उनके और उनके माताजी के लोक सभा क्षेत्र से कितने भिखारी मुम्बई में मौजूद हैं?ऐसे दिल्ली सरकार ने भिखारियों के लिए शरण स्थल बनाने की चेष्टा की है,पर कितने भिखारी वहां टिक पाते हैं?.
    अंत में मैं यही कहना चाहता हूँ कि उत्तर प्रदेश अवश्य पिछड़ा हुआ है.अन्य कारणों के साथ उसकी विशालता भी एक बड़ा कारण है, ,पर उसके पिछड़ेपन का आकलन मुम्बई में दो चार भिखारियों से पूछ ताछ कर नहीं किया जा सकता.

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