आत्माराम यादव पीव
पहले प्रिन्ट मीड़िया होती थी जिसकी खबर दूसरे दिन अखबार में पढ़ने को मिलती थी, अब इलेक्टानिक मीड़िया हो गयी, घटना घटी, स्पाट पर पहुॅचे, कैमरे लगाये और शुरू हो गये, बक-बक करने। घटना के पल झपकते ही टी.व्ही.पर, मोबाईल से व्हाटसअप-फेसबुक पर एक समाचार अनेक एंगल से प्रस्तुत होता है, ताकि पेश करने वाला मीड़ियामेन कह सके, कि उसने सनसनीखेज एक्सक्यूजीव दिखाई थी। समाचारों में जो खबर या समाचार बनता है, वह खबर न होकर विस्फोटक के चक्कर में तमाशा हो जाती है और सत्य घटना या समाचार वास्तविकता से कोशों दूर हो जाती है और कवरेज की होड़ में मीड़ियामेनों का हुजूम लग जाता है। कहते हैं मीड़िया निष्पक्ष होती है, अब ऐसा नहीं है। मीड़िया उसी के पक्ष में होती है जिससे उसे गुड़फीलिंग हो जाये, चाहे आॅखों देखी समाचार की हवा निकालनी हो, मीड़ियामेन को गुड़फीलिंग करा दे, वह महाभारत युद्ध में गुरू द्रोण की ताकत को शून्य करने के लिये अश्वस्थामा हाथी के मरने को पुत्र के मरने के सम्प्रेषण की कला का इस्तेमाल करके सत्य को असत्य का असली जामा पहनाकर माहौल बदल देता है। इसलिये कहते है मीड़िया मीड़िया है, जो करे, सो थोड़ा है। मीड़िया का कारोबार विश्वव्यापी हो जाने से जब खबर नहीं मिलती तब मीड़िया स्टुडियों में बैठकर समाचार बनाती है, बेमतलब की बहसें कर किसी का जायका अच्छा तो किसी का खराब भी करती है। मीड़िया पूंजीपतियों की गोद में, आईमीन पूॅूजीपतियों के द्वारा संचालित होने से खबरे नहीं दिखाती बल्कि वे ही खबरे दिखाती है जिससे उसका कारोबार फले-फूले। कारोबारी मीड़िया अब खबरों के साथ-साथ सरकारें बनाने, सरकारें गिराने का भी काम बखूबी करती है।


मीड़िया जिसको जादू की झप्पी दे दे, श्मसान जाने वाला मुर्दा भी जाग उठता है, शव को शिव बनाने में मीड़िया को गुड़फीलिंग दे दो, काम चैखा हो जायेगा। यह आॅखों देखा, कानों सुना, सबने गुना भी है। अब मध्यप्रदेश की ही बात ले लो, मध्यप्रदेश में 15 सालों से भाजपा गुडफीलिंग में रही, जनता ने काॅग्रेस की गुडफीलिंग की पर भाजपा के पल्ले बेड़फीलिंग आयी, किन्तु मीड़िया की गुड़फीलिंग हो जाने के बाद उसने भाजपा की गुड़फीलिंग की खबरें उछाली। शिवराज का चक्कर चल गया और उसने काॅग्रेस से डेढ़ साल में ही दुलत्ती मारकर गुड़फीलिंग लपक ली और अपने भाग्य की बेड़फीलिंग काॅग्रेस को थमा दी। मुख्यमंत्री की कुर्सी सभी को दुल्हन लगी और उसे पाने स्वयंवर हुआ परन्तु काॅग्रेस ने युवा को आगे करके बूढ़े कमलनाथ को दूल्हा बना दिया, युवा दुल्हन को देख-देख तिलमिलाते रहे और मन ही मन कमलनाथ को कोसते रहे और बाराती युवाओं के महाराज ने अपने दुल्हा से दुल्हन छीनकर शिवराज को दे दी, शिवराज डेढ़ साल से दुल्हन का घूंघट उठाने के लिये तरस गये थे। महाराज को सभी ने कोसा उसके पूर्वजों ने जो गददारी की उसे लेकर लताडा, पर यह सब राजनैतिक जुमलेवाजी में चली गयी और प्रदेश की सत्तासुन्दरी स्वरूपा कुर्सी दुल्हन के रूप में कुख्यात हुई जो जायज से नाजायजी का शिकार हुई, और कोरोना काल की गाइडलाईन को फालों करते 24 बारातियों के लौटने तक उसका भविष्य अंधर में लटका था, शिवराज ने मध्यावधि कराकर सत्ता के दम पर दूल्हे का सेहरा पहन बारातियों को भी षगुन देकर उनके न्यारे-ब्यारे दिनों कीष्षुरूआत कर दी और काॅग्रेस कोसते ही रह गयी।
शोहरत कौन नहीं चाहता है। हर ऐरा-गैरा भी अपने पूरे जीवन में हर संभव प्रयास करता है कि वह नामी-गिरामी बन जाये। हमारा देश भारत बड़ा ही निराला है। देश को निराला बनाने का पूरा श्रेय प्रदेशों को जाता है। अब होशंगाबाद की ही बातें कर लें जहाॅ मैं रहता हॅू, एक से एक रणबांकुरे, धुरन्धर और नकारात्मक घटनाओं के लालबुझक्कड़ों का गढ़ है जो नाकामयाबी भरी बुझी मृतप्रायः सूचनाओं को अपने दिमाग में कैच कर जायकेदार खबर बनाकर परोसने में माहिर है। आप उनकी इस मक्कारी को भी दाद देकर उन्हें अपना आदर्ष मानने को विवष होंगे, यही उनकी काबिलियत है जिसके दम पर यह नगर नामर्द राजनेताओं को सिर पर बिठाये है और मोदी फार्मूले का विकास इस जिले के कूचे-कूचे में फैला विष्व के किसी भी विकासषील देष के सामने फीका पड़ जायेगा। इस छोटे सेष्षहर को जोड़ने वाला रेल्वेफाटक बंद हो गया, हजारों लोग तकलीफ में रहे, नेताओं ने वायदे किये, फाटक के स्थान पर बतौर समस्या रेल्वे ओव्हरब्रिज मिला जो सुविधा कम तकलीफदेह ज्यादा रहा। यहाॅ के स्कूली बच्चे, नागरिक, माता-बहने रामजीबाबा की समाधि हो, नर्मदास्नान को जाना हो, षहर जाना हो पैदल ही रेल्वेस्टेषन के डगडगा से चले जाते थे, कोरोनाकाल में लाकडाउन के समय रेल्वे ने वह सुविधा छीन ली और नेताओं की हेकड़ी निकल गयी, कोई भी ग्वालटोली-एसपीएम जैसे क्षेत्रों को पैदल दूरी कम करने वाले इस डगडगा को तोड़ने से नहीं बचा सका। ऐसे तमाम उदाहरण है जो यहाॅ के नामजद नेताओं और लालबत्ती की सैरसपाटा करने वाले दर्जनों नेताओं को भी इन लोगों के दर्द से रिझा नहीं सके और लोगों को जूते के अन्दर कीललगी पन्हैया/जूता पहनाकर जनता के पैरों को लहुलुहान कर दर्द से चीखने के लिये छोड़ आये और इलाज के नाम पर विष्व का अजूबा डगडगा इस प्लेटफार्म पर बनवाकर अपनी बेषर्म राजनीति को बचाने के लिये बयानवाजी के लिये छोड दिये, जिसे आज तक अपनी खबरों में उठाने के लिये ये तथाकथित पत्रकार आगे नहीं आये, अगर ये चाहते तो एक मुहिम छेड़कर प्रदेष-देष के नेताओं की नींद हराम कर लोगों को ऐसे दर्द में जीने के लिये विवष नहीे करते,। कोरोना संक्रमण काल में पुलिसवाले ग्वालटोली पुलिया के बेरिक्ेटस लगाकर ग्वालटोली के रास्ते बंद कर वहाॅ के नागरिकों को आगदमगढ़ रोड़ पर नयी पुलिया के भरोसे छोड़ दिये, जबकि पुलिसवाले जानते है कि वहाॅ से किसी भी व्यक्ति का सुरक्षित निकल पाना संभव नहीं है, क्योंकि पुलिसवालों के संरक्षण में यहाॅ सारे अवैध काम होते है और अपराधी चैबीस घन्टे इस मार्ग पर खड़े होकर अपना कारोबार करते है जिसमें षराब की डिलेवरी हो, चाकू-छूरी जैसे घातक हथियार से लेकर पिस्टल तक की सौदेवाजी इसी जगह होती है, सटटा का कारोबार होने से सटोरियों की भीड़ घरों के सामने सड़क पर लगी रहती है, सड़क असमाजिक तत्वों से भरी होती है जहाॅ आमनागरिकों को चलना दूभर होता है, पर पुलिसवाले जानबूझकर कोरोना की गाइडलाईन के नाम पर ग्वालटोली के नागरिकों के साथ अत्याचार करते है और विवष होकर इन्हें इन रास्तों पर जाकर अपनी जान को जोखिम में डालना पड़ता है, अधिकारी आॅखों पर पटटी बाॅधे होते है और पत्रकारों की कलम अधिकारियों के पीछे उनकी छुटपुट कार्यवाहियों में उनकी फोटो खींचकर समाचार गढ़ने की कला में लगी होती है।
ऐसा नहीं कि यहाॅ सकारात्मकतापूर्ण तथ्यों का अभाव हो, जैसा देश-दुनिया मंें होता है, वैसा ही मिथक यहाॅ का भी है। मैं देखता हॅू कि नर्मदापुरम संभाग के ऐतिहासिक-भौगालिक,राजनैतिक पहलूओं पर अन्वेषणकर्ताओं की प्रकाशित तमाम रिपोर्टो में प्रौढ़ता का अभाव रहता है और आधा-अधूरा या कहे अधकचरा ज्ञान अपनी रिपोर्टो में प्रकाशित कर स्वयं को त्रिकालदर्शी समझ कूलांचे मारते नवसिखिये बड़े अखवारों में इन्हें छापकर लाखों पाठकों का दिमाग बदल देते है, जब उनके सामने सत्य आता है तो वे पाठक बड़े छवि के बड़े अखबार में छपे असत्य को ही सत्य ठहराकर उसे प्रमाणित करने लग जाते है। नर्मदापुरम संभाग मुख्यालय होशंगाबाद में मुंगेरीलाल से लेकर शेखचिल्ली तक और डाकू गब्बरसिंह से लेकर रंगा-बिल्ला और नटवरलाल जैसे आचरण और कर्म करने वाले यहाॅ की राजनीति में घुस पूजनीय हो गये तो कोई आश्चर्य की बात नही लेकिन चैथे स्तम्भ समझे जाने वाले पत्रकारिता के क्षैत्र में इनका घुस आना और तैश दिखाना कदाचरण नहीं सदाचरण में शुमार हो गया है। यह गजब प्रयोग पत्रकारिता में पूंजीपतियों-व्यापारियां के हाथों में समाचार-पत्रों व चैनलों का स्वामित्व आने के बाद से शुरू होकर एक प्रथा बनने की ओर अग्रसर हुआ है। पत्रकारिता में क्षेैत्रीय स्थानांें का भूगोल-अतीत,वर्तमान एवं ऐतिहासिक महत्व, पुरातन महत्व आदि के साथ राजनैतिक घटनाओं एवं किस क्षैत्र में जनता की क्या अपेक्षायें या समस्यायें है इसे पटल पर रखकर समाचारों को लिखने वाले पत्रकार गुजरे जमाने के म्युजियम में रखने योग्य समझे जाने लगे है। झूठ-फरेब, मक्कारी में पारंगतों की अपनी दुनिया है। सरकारी योजनों को बनाकर उन सुविधाजन्य क्षैत्रों में जहाॅ पूर्व ही इनकी आवश्यकता नहीं है जबरिया थोपकर विकास की गंगोत्री बहाने वाले अधिकारियों की मेघना शक्ति को भुलाया नहीं जा सकता जो सिर्फ भ्रष्टाचार के दम पर नौकरी ज्वाईन करने से लेकर सेवानिवृत्त होने तक जमे होते है, उनका कोई बालबाॅका नहीं कर सकता क्योंकि वे जितने भी काम या योजनायें लाते है वे इन योजनाओं को पूर्व विकसित क्षैत्रों में कार्यान्वित करके जमकर भ्रष्टाचार कर अपने दायित्व का निष्ठा से निर्वहन करना बताते है। आज हरेक ओर अपराधांें का बोलबाला है। चिकित्सा क्षैत्र में चिकित्सक के रूप में चिकित्सामाफिया सक्रिय हो गये है जो 90 प्रतिशत सामान्य प्रसव से होने वाले प्रसव को माॅ-बच्चे की जान का खतरा बतलाकर आपरेशन द्वारा प्रसव कराकर लूटने का काम कर रहा है। वही हृदयरोग से लेकर सभी बीमारियों में सामान्य चिकित्सीय सलाह और दवा से व्यक्ति निरोगी हो जाये, उसका प्रयोग बंद कर व्यक्ति को बीमार रखने के प्रयोग और दवायें चल रही है, आपरेशन हो रहे है ताकि यह लूट सभ्यों द्वारा जारी रहे। शरीर में गंभीर बीमारी बताकर आपरेशन करने के बाद कितने लोग कितने दिन जिंदा रहे है इसकी फिकर किसी को नहीं है। सामान्य डिलेवरी को आपरेशन से कराते या जो भी अनुचित हो उसे उचित का जामा पहनाने ये सभी लोग इन्हीं अखबारों-चैनलों को विज्ञापनों से पाल-पोसकर इनका संरक्षण पा मानवता के दुश्मन बन बैठे है और अपना लाभ मिल जाने पर ये मीड़ियामेन इनकी करतूतें नहीं दिखाते और समाज इन बैरियों को अपना मित्र मानकर लूटने-पिटने को तैयार हो जाता है।
अब जनता के हितों का, क्षै़त्र के विकास का पत्रकारिता में कोई स्थान नहीं रह गया है। जनता के हित किस बात में निहित है, क्षैत्र में क्या समस्यायें है, कौन से कार्य और विकास क्षैत्र के लोगों का भला करंेंगे यह अब जनता से नहीं पूछे जाते है। नेताओं के द्वारा क्षैत्रों में पूर्व से चल रही कार्ययोजनाओं, कार्यक्रमों आदि से जनता को मिल रहे सुख-चैन और आनन्द के समाचार नहीं आते है। समाचार आते है? राजनीति की दुकान चलाने के लिये हर जिले में, हर मोहल्लों में पानी सप्लाई से लेकर सफाई कराने तक हर नेता अपना चुनाव खर्च का लाभ भुनाने के लिये वर्षो से बिना किसी रूकावट के चली आ रही पानी सप्लाई को असफल बताकर उस योजना में हुये करोड़ों रूपये के नुकसान की परवाह न कर नयी योजनायों पर काम करने लग जाते है ताकि नेताओं को लाखों रूपये के कमीशन से हर्जा-खर्चा मिल जाये। पुरानी योजना को बंद कर नयी योजना पर काम शुरू हो जाता है। नेता बयानवाजी करते है, अधिकारी पिछलग्गू बने उनको अनुमोदन करते है, पत्रकार जनता की भावनाओं को समझे बिना इन योजनाओं का धुंआधार प्रचार प्रसार अपने समाचारों से करते है। सुरसा के मॅुह की तरह तरक्की कर चुके इन अखबारों का गरूर सातवे आसमान पर होता है, अब यहाॅ किसी के सुख-दुख के समाचार बेमानी हो गये है। नगर में किसी लोकप्रिय समाजसेवी व्यक्ति,नेता या अधिकारी के मरने की खबरें इन समाचारों में नहीं छपती है, इनके लिये ये गुजरे जमाने की बातें हो गयी है, इसलिये ये समाचार पत्र ऐसे लोगों के मरने की सूचना या अन्य जानकारी के लिये व्यवसायिक रूप लेकर उठावना, पगड़ीरस्म में इनके परिजनों से रकम ऐंढकर अपनी जिम्मेदारी से हट गये है, जो अच्छे संकेत नहीं है।
बड़े अखबार वालों ने तनखैयया पत्रकारों को नौकरी दे रखी है वे अपनी डयूटी को लेकर साफगोई से यह दावा कर नहीं अघाते कि जिस जगह वे नौकरी कर रहे है उस जगह की उनको चिंता है, वहाॅ की छोटी-बड़ी हर घटना पर उनकी पकड़ है जबकि उनका दावा खोखला होता है और जिन पूर्व की योजनाओं को स्थानीय स्तर पर संरक्षण मिलना चाहिये वह नहीं मिलता है। नगर का ऐतिहासिक महत्व की घटनाओं आदि को ध्यान में रखकर जनभावनाओं को समझकर उनकी बात को पटल पर रखने वाले पत्रकारों की कलम गुजरे जमाने की बात हो गयी है और और ऐसे पत्रकार म्युजिम में रखे जाने योग्य ही समझे जा सकते है। कलम घिस-घिसकर जो पत्रकारिता कर रहा है वे जंग लगे अनुपयोगी हो गये है और आपराधिक दुनिया में प्रयोगवादी ही नाम कमा रहे है। नाम कमाने की होड़ में राजनीति से लेकर पत्रकारिता में खरपतबार की तरह प्रगट हो गये है। सरकार और प्रशासन इन खरपतवारों के आने से शकून में है। जब से देश में मोदी जी आये है सभी मीड़िया के प्रमुख-व्यापारियों को, चैनल-अखबार मालिकों को गुडफीलिंग महसूस हो रही है वत इसी गुड़फिलींग ने विपक्ष का पूरी तरह सफाया कर उनको बेडफीलिंग में डाल दिया है। जिन सरकारों के की नीतियों -कार्यक्रमों को मोदी जी विरोध करते थे आज वहीं नीतियाॅ कार्यक्रम मोदी जी की सरकार में देशहित में गुडफीलिंग का सुख दे रही है और मीड़िया गोदी मीड़िया के नाम पर बेडिफीलिंग की जगह गुडफीलिंग में खुष है। अब सरकार के खिलाफ कमजोर विपक्ष के रहते कोई मुददा तूल नहीं पकड़़ पाता क्योंकि सरकार की ओर से पक्ष रखने वाले बयानवाजी में धुरन्धर है जिनकी वाणी से निकले झूठ भी अकाटय सत्य बन जाते है जिसका सामना करने में विपक्ष कमजोर होने से खामोश रह जाता है, तो कुछेक सत्तापक्ष दल के प्रतिनिधियों के कुतुर्क के आगे धराषाही हो जाता है, जो धराषाही नही होकर टिका रहता है वहाॅ ये कुतुर्की भटका कर बातों का रूख बदल देते है जिसमें मीड़िया सरकार के प्रति रक्षात्मक खड़ा होकर सरकार के खिलाफ बयानवाजी को उपलब्धि में तब्दील कर विपक्ष और जनता को सड़कों पर खड़ा होने का बचाव करता है।
देश के प्रख्यात शायर स्वर्गीय दुष्यंतकुमार का यह शेर मेरे लिये हमेशा प्रेरणाप्रद रहा है लेकिन भ्रष्टाचार मिटाने के मामले में यह प्रयोग विपरीत है। शेर है-कौन कहता है आकाश में सुराख नहीं हो सकता। एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों। जिसे आज की परिस्थितियों में बेड़फीलिंग को गुड़फीलिंग महसूस करने के लिये इस प्रकार प्रयोग किया जा सकता है-कौन कहता है कि भ्रष्टाचार में सुराख नहीं हो सकता।। हैसियत देखकर रिश्वत की रकम तो तबियत से उछालो यारों। इस प्रकार सरकारी संरक्षण में गोदी मीड़िया के द्वारा जनहित के समाचार तबितय से उछलते है और पत्रकार गुड़फीलिंग में समाचारों को जिन्दा रखकर जनभावनाओं को बैड़फीलिंग वास्तविक सच्चाई और हकीकत के समाचारों को रिजेक्ट कर खुद गुडफीलिंग में प्रजा की सेवा को ही अपना धर्म मान चुका है।

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