रोहित वेमुला की जांच के बाद मीडिया पर सवाल

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मीडिया के लिए राष्ट्रीय नीति जरुरी सुरेश हिन्दुस्थानी एक कहावत है कि एक झूंठ को सौ बार प्रचारित किया जाए तो वह लगभग सत्य जैसी ही प्रतीत होने लगती है। सांस्कृतिक वातावरण से कोसों दूर जाने वाली हमारे देश की जनता भी इस झूंठ को सत्य मानने के लिए विवश हो जाती है। इसके परिणाम… Read more »

लहू पतला हो गया है

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ई ‘गोला’ पर ही कउनो ‘फिरकी’ ले रहा है जाति और धर्म पर उंगलियां उठाते हुए ई गोला पर कउनो फिरकी ले रहा है। कउनों भिड़ाने की कोशिश कर रहा है। वो किसी अउर गोला से नहीं, इसी गोला से है। अब कउन है ये आप समझो। हालांकि है आपके आस-पास ही, हुई सकत है… Read more »

छात्र आंदोलनः खो गया है रास्ता

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संजय द्विवेदी हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमूला की आत्महत्या की घटना ने हमारे शिक्षा परिसरों को बेनकाब कर दिया है। सामाजिक-राजनीतिक संगठनों में काम करने वाले छात्र अगर निराशा में मौत चुन रहे हैं, तो हमें सोचना होगा कि हम कैसा समाज बना रहे हैं? किसी राजनीति या विचारधारा से सहमति-असहमति एक अलग बात… Read more »

जातिगत आंदोलन का नया रूप

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भारतीय राजनीति की यह अपनी विशेषता है कि घटना के घट जाने के पश्चात उसे राजनीति के गहरे समुद्र में उतार दिया जाता है।ठीक उसी तरह की घटी उससे पूर्व की घटना के कारण जानने के लिए ,उसे दूर करने के लिए हम अग्रसर नहीं होते।आज कल रोहित वेमुला काफी चर्चा का विषय बना हुआ… Read more »