कविता ; बस दिल्ली का समाचार है – श्यामल सुमन

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श्यामल सुमन सबसे पहले हम पहुँचे। हो करके बेदम पहुँचे। हर चैनल में होड़ मची है, दिखलाने को गम पहुँचे।   सब कहने का अधिकार है। चौथा-खम्भा क्यूँ बीमार है। गाँव में बेबस लोग तड़पते, बस दिल्ली का समाचार है।   समाचार हालात बताते। लोगों के जज्बात बताते। अंधकार में चकाचौंध है, दिन को भी… Read more »

कविता ; खबरों की अब यही खबर है – श्यामल सुमन

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श्यामल सुमन देश की हालत बुरी अगर है संसद की भी कहाँ नजर है सूर्खी में प्रायोजित घटना खबरों की अब यही खबर है   खुली आँख से सपना देखो कौन जगत में अपना देखो पहले तोप मुक़ाबिल था, अब अखबारों का छपना देखो   चौबीस घंटे समाचार क्यों सुनते उसको बार बार क्यों इस… Read more »

कविता ; अखबारों का छपना देखा – श्यामल सुमन

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श्यामल सुमन मुस्कानों में बात कहो चाहे दिन या रात कहो चाल चलो शतरंजी ऐसी शह दे कर के मात कहो   जो कहते हैं राम नहीं उनको समझो काम नहीं याद कहाँ भूखे लोगों को उनका कोई नाम नहीं   अखबारों का छपना देखा लगा भयानक सपना देखा कितना खोजा भीड़ में जाकर मगर… Read more »

कविता ; सुमन अंत में सो जाए – श्यामल सुमन

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 श्यामल सुमन कैसा उनका प्यार देख ले आँगन में दीवार देख ले दे बेहतर तकरीर प्यार पर घर में फिर तकरार देख ले   दीप जलाते आँगन में मगर अंधेरा है मन में है आसान उन्हीं का जीवन प्यार खोज ले सौतन में   अब के बच्चे आगे हैं रीति-रिवाज से भागे हैं संस्कार ही… Read more »

कविता ; भाई से प्रतिघात करो – श्यामल सुमन

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श्यामल सुमन मजबूरी का नाम न लो मजबूरों से काम न लो वक्त का पहिया घूम रहा है व्यर्थ कोई इल्जाम न लो   धर्म, जगत – श्रृंगार है पर कुछ का व्यापार है धर्म सामने पर पीछे में मचा हुआ व्यभिचार है   क्या जीना आसान है नीति नियम भगवान है न्याय कहाँ नैसर्गिक… Read more »

कविता ; चिंता या चेतना – मोतीलाल

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मोतीलाल अपना कोई भी कदम नए रुपों के सामने कर्म और विचार के अंतराल में अनुभव से उपजी हुई कोई मौलिक विवेचना नहीं बन पाता है और विचार करने की फुर्सत में ज्यादा बुनियादी इलाज उपभोक्ताओं की सक्रियता के बीच पुरानी चिंता बनकर रह जाती है   शून्य जैसी हालत मेँ स्वीकृति के विस्तार को… Read more »

कविता ; मंत्र – श्यामल सुमन

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श्यामल सुमन लोकतंत्र! जिसकी आत्मा में पहले “लोक”, बाद में “तंत्र”। मगर अब नित्य पाठ हो रहा- “तंत्र” का नया मंत्र।   परिणाम! नीयत, नैतिकता बेलगाम   मानव बना यंत्र और तंत्र – स्वतंत्र, लोक – परतंत्र।  

कविता ; अंधेरी गलियों में………… – नवल किशोर शर्मा

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प्रस्तुत कविता अंधेरी गलियों में………… उस जन-समूह को समर्पित है जो कि विभिन्न फसादों एवं मानवीय विद्रूपताआं के कारण अपना अमन-चैन खो चुके हैं।   अंधेरी गलियों में………………. अंधेरी गलियों में भटकना फिर रहा मेरा ये मन, ढूंढता हूं एक पल कि शांति,चैन और अमन।।   सोचता हूं जब कभी बन्द करके अपने नयन, किस… Read more »

गजल-श्यामल सुमन- दीपक

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श्यामल सुमन जिन्दगी में इश्क का इक सिलसिला चलता रहा लोग कहते रोग है फिर दिल में क्यों पलता रहा   आँधियाँ थीं तेज उस पर तेल भी था कम यहाँ बन के दीपक इस जहाँ में अनवरत जलता रहा   इस तरह पानी हुआ कम दुनियाँ में, इन्सान में दोपहर के बाद सूरज जिस… Read more »

गजल-श्यामल सुमन- इंसानियत

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श्यामल सुमन इंसानियत ही मज़हब सबको बताते हैं देते हैं दग़ा आकर इनायत जताते हैं   उसने जो पूछा हमसे क्या हाल चाल है लाखों हैं बोझ ग़म के पर मुसकुराते हैं   मजबूरियों से मेरी उनकी निकल पड़ी लेकर के कुछ न कुछ फिर रस्ता दिखाते हैं   खाकर के सूखी रोटी लहू बूँद… Read more »