लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under चिंतन, धर्म-अध्यात्म.


mandirधर्म और अध्यात्म वे मार्ग हैं जो संसार की यात्राओं की परिपूर्णता अथवा सांसारिकता से वैराग्य अथवा अनासक्त जीवन से जुड़े हैं और इन रास्तों पर चलने वाले लोगों को अधर्म, अनाचार आदि सब कुछ छोड़ छुड़ा कर इस मार्ग की ओर आना चाहिए तभी वे सफल हो पाते हैं।

सदाचार, शुचिता, ईश्वर के प्रति अगाध आस्था एवं अनन्य श्रद्धा भाव के साथ ही मानवीय जीवन के लिए आदर्श मूल्यों और नैतिकताओं का अवलंबन जरूरी ही नहीं बल्कि इनकी परिपक्वता नितान्त आवश्यक है।

धर्म एवं अध्यात्म के लिए मानवीयता की बुनियाद का मजबूत और अभेद्य होना जरूरी है और यहीं से शुरू होती है धर्म और अध्यात्म की यात्रा। लेकिन मौजूदा समय में धर्म के मर्म से अनभिज्ञ लोगों ने धर्म को जीवन में भोग-विलासिता और धनसंग्रह के साथ ही बहुरूपिया धंधों के रूप में प्रचारित और विकसित कर रखा है और इसी कारण धर्म के मूल तत्व और मर्म पलायन करते जा रहे हैं और इनका स्थान ले रहा है रिलीजियस बिजनैस।

धर्म के नाम पर हर कहीं धंधों का जोर है। कभी पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा और पुण्य के नाम पर, कभी देवी-देवताओं के नाम पर तथा कभी अंधविश्वासों तथा किसी और बहाने।

हर तरफ कहीं व्यक्तिगत तौर पर धर्म के नाम पर धंधे चल रहे हैं। कभी सामूहिक, संगठन के नाम पर, संस्थाओं, ट्रस्टों, कहीं गिराहों और किन्हीं और नामों से। गांव, ढाणियों, कस्बों, शहरों और महानगरों से लेकर तीर्थ स्थलों तक धर्म के नाम पर धंधों की बहार छायी हुई है।

कई किस्मों के लोग इन सभी जगहों पर पसरे हुए हैं। इनमें सर्वाधिक निचले स्तर पर जो लोग हैं वे भिखारी हैं जो हजारों-लाखों की संख्या में विचरण कर रहे हैं अथवा मन्दिरों के बाहर या इर्द-गिर्द डेरा जमाये हुए हैं।

इन लोगों को यह भ्रम है कि उन्हें दान-दक्षिणा देकर ही भगवान या पुण्य को पाया जा सकता है और जो ऐसा नहीं करते हैं वे भगवान की नज़रों में गिर जाया करते हैं और उन्हें स्वर्ग प्राप्त नहीं हो पाता है।

इतनी बड़ी संख्या में भिखारियों को दान-दक्षिणा देने वाले हम लोग स्वर्ग या ईश्वर को पाने की कामना में देश की बहुत बड़ी जनसंख्या को कामचोर और हरामखोर बना रहे हैं जबकि इस मानव क्षमता का उपयोग जन कल्याण और विकास के कई आयामों में किया जा सकता है। इससे हमारे देश की छवि खराब हो रही है सो अलग। कई जगह तो ये भिखारी लपकों की भूमिका में आक्रामक और पराक्रमी हो जाते हैं। दिन के उजाले में भगवान के नाम पर भीख मांगने वाले भिखारियों में काफी ऎसे  हैं जो रात के अंधेरे में वे सारे काम करते हैं जो काले व आसुरी कारनामों की श्रेणी में आते हैं।

जब किसी को बिना कुछ किए सब कुछ मिल जाए तो वह  आखिरकार मेहनत क्यों करेगा। फिर अपने यहां धर्म के नाम पर भिखारियों को पालने वाले और लुटाने वालों की कोई कमी थोड़े ही है। ये लोग किसी जरूरतमन्द को कुछ देना हो तो पल्ला झाड़ लेंगे और बिदक जाएंगे लेकिन धर्म के नाम पर भिखारियों को देने में पूरी श्रद्धा उण्डेल देंगे।

धर्म के नाम पर एक और किस्म के लोगों का जमावड़ा है जिनमें किसम-किसम के बाबा आते हैं। इनमें कुछ अखाड़ों, मन्दिरों और प्रतिष्ठित बाबाओं, महामण्डलेश्वरों, महंतों, संत-महात्माओं और सच्चे साधुओं को छोड़ दिया जाए तो काफी लोगों की भीड़ ऎसी है जिसका मकसद ही श्रद्धालुओं की जेब खाली करना, मन्दिरों और भगवान के नाम पर लोगों को लूटना रह गया है।

ऎसे लोग कभी ज्योतिष, भविष्यदर्शन, स्वर्ग प्राप्ति, कामनाओं की पूर्ति और लोगों की इच्छाओं के नाम पर गुमराह करते हुए क्या कुछ नहीं कर गुजर रहे हैं, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है।

संसार को त्याग बैठे बाबाबों का संबंध ईश्वर से होना चाहिए न कि एसी रूम्स, टीवी, रेडियो, कम्प्यूटर, इंटरनेट और रुपयों-पैसों अथवा ऎशो-आराम भरे भोग-विलासिता भरे संसाधनों से। इन लोगों को भगवान से मतलब होना चाहिए। असली संत तो संसार से दूर रहते हैं और पैसों को हाथ तक नहीं लगाते, और चीजों की बात तो दूर है।

धर्म के नाम पर धंधों में रमी तीसरी प्रजाति है धर्मशालाओं, होटलों, रेस्टोरेंट्स और दुकाने चलाने वालों की। इन लोगों को श्रद्धा या श्रध्दालुओं से कहीं ज्यादा फिकर अपने धंधों और मुनाफे की है।

जो श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ आता है वह चाहता है कि उसे भी श्रद्धा और आस्था का भरा-पूरा माहौल मिले। लेकिन भगवान के धामों पर ऐसा देखने में नहीं आता बल्कि हर तरफ लगता है कि जैसे हर आदमी दुकान हो गया है और श्रद्धा तीर्थों पर आदमियों की बजाय मुँह बोलती और चलती-फिरती दुकानों का डेरा हैं जो सिर्फ और सिर्फ अपनी कमायी के लिए चिंतित है।

ऐसे धंधेबाजों को न श्रद्धा से कोई मतलब है, न भगवान या श्रद्धालुओं से। एक और अभिजात्य किस्म है जो तीर्थों और तीर्थ क्षेत्रों में एकान्तिक भोग-विलास के लिए आती रही है। इन सभी किस्मों के दिग्दर्शन उत्तराखण्ड की वादियों में होने लगे थे और पाप इतना बढ़ गया था कि भगवान केदार और गंगा को न चाहते हुए भी धरती का भार कम करने के लिए महाप्रलय और ताण्डव करना पड़ा।

उत्तराखण्ड की आपदा उन सभी लोगों के लिए महा सबक है जो धर्म को धंधा मानते हैं और खुद को धर्म का ठेकेदार। धर्म को धर्म ही रहने दें धंधा न बनाएं। वरना तैयार रहें भुगतने को। आखिर नियति की भी अपनी कोई सीमा होती है। प्रकृति के विरूद्ध कर्मों की जब अति हो जाती है तब विधाता भी विनाश को रोक नहीं पाता है। दुःख तो इस बात का है कि धर्म के धंधेबाजों के पापों के कारण निरीह श्रद्धालुओं की बलि चढ़ गई।

2 Responses to “उत्तराखण्ड आपदा से सबक लें धर्म के नाम पर धंधा चलाने वाले”

  1. बीनू भटनागर

    बहुत अच्छा लेख, पूर्ण सहमति

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  2. mahendra gupta

    मैं भी शत प्रतिशत आपके विचारों से सहमत हूँ.वास्तव में दान आदि देकर लोगों को निकम्मा ,काहिल, व अपराधी बनाते जा रहें हैं.मैं भी धार्मिक स्थानों पर ऐसी लूटमार,भगवान के नाम पर फर्जी दुकानदारियों को देख कर उस और जाना पसंद ही नहीं करता ईश्वर तो सब जगह बसा है. लेकिन आप हमारी सरकार की नीतियों की और भी नजर उठाकर देखते,तो बड़ा अच्छा लगता .आदर्शवाद का चोगा पहन ज्ञान देना बहुत आसान है पर कुछ वैसी ही सचाई को देखना गैरमुनासिब न होगा.सरकार द्वारा मनरेगा चालू किया गया,तो लोगों ने घर बैठे नाम लिखा कर बिना काम किये पैसे कमाना शुरू कर दिया.कुछ पैसे देकर यदि बिना काम किये दिन भर चौपाल पर बैठ गप्प मारना किसे अच्छा नहीं लगेगा? भी पी एल के नाम पर अच्छे खासे कमाने वाले लोग,अपना नाम लिखा सुविधाएँ उठा रहें हैं,और देश के लोगों की कमाई का टैक्स सरकार इन पर खर्च कर बाकि देश वासिओं के विकास का हक मार रही है,,वह शायद आपकी नजरों से चूक गया.
    रही सही कसर अब खाद्य सुरक्षा बिल ला कर 67 प्रतिशत जनता की काहली नाकारा,आलसी लोगों की बड़ी फ़ौज खड़ी करने जा रही है, केवल वोटों का पुण्य कमाने के लिए,इस पर भी आप गौरतलब करते तो बड़ी ख़ुशी होती.आज श्रमिक वर्ग में कोई भी व्यक्ति काम कर राजी नहीं.जब सब कुछ लगभग मुफ्त में मिल रहा हो,अनाज,दवा,चिकित्सा वस्त्र ,शिक्षा,लैपटॉप और न जाने क्या क्या,तो कौन काम करने आएगा,? देखें कुछ कमाने वालों पर कर लगा जो निश्चित ही शेष पुरे 33 प्रतिशत तो नहीं है, सरकार कितने लोगों का कितना दिन पेट भरती है.राजस्थानी में कहावत है घर सु घर कोणी चाले,और चाले तो कीत्ना दिन चाले वही यहाँ भी देर सबेर लागू होगी.आपने बड़ा अच्छा प्रश्न उठाया,पर हमारी सरकार को जो बड़े बड़े अरथ्शास्त्रियों से सजी हुई है,भी अपनी नायाब जागरूक कलम से जगाएं तो बहुत ही आनंद आएगा,जो सामाजिक आर्थिक व्यवस्था को वोट के लिए महज वोट के लिए चरमराने को तैयार है,चाहे वह किसी भी दल की क्यों न हो.

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