चाहे लाख करो तुम पूजा , तीर्थ करो हज़ार दीन दुखी को ठुकराया तो सब कुछ है बेकार

NETAमुझे यह देखकर बड़ा दुःख हुआ कि उत्तराखंड त्रासदी पर देश के बड़े बड़े धर्म गुरु चाहे आसा राम बापू हों या सुधांशु जी महाराज और सैकड़ो गुरु जो धार्मिक चैनलों पर प्रवचन देते हैं और उनके करोड़ों अनुयायी है किसी ने भी इस दुःख की घड़ी में कोई सहानुभूति पूर्ण ब्यान नहीं दिया और कोई आर्थिक मदद या राहत सामग्री नहीं भेजी। जबकि मानवता का सबसे बड़ा धर्म दीन दुखिओं , जरूरतमंद और संकट में फंसे लोगों की मदद करना होता हैं। आज इन धर्म गुरुओं के पास अकूत सम्पति हैं। इनके अलावा भी शिर्डी मंदिर, तिरुपति बालाजी का मंदिर हो या देश के कई बड़े बड़े मंदिर हैं किसी ने भी पीड़ितो की तरफ मदद का हाथ नहीं बढ़ाया। हम लोग जीवन में बातें तो बड़ी ज्ञान ध्यान की करते हैं, बड़े बड़े प्रवचन देते हैं , ये करना चाहिए, वो करना चाहिए लेकिन  जब वास्तव में कुछ करने का समय आता है तो हम प्रक्टिकली जीरो साबित होते हैं।

देश के नामी गिरामी किसी भी  क्रिकेट खिलाड़ी ने मैच रद्द करने की नहीं सोची कि चलो इस आपदा की घड़ी में हम एक महीने तक कोई भी राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय मैच नहीं खेलेंगे और अपनी तरफ से ज्यादा से ज्यादा आर्थिक मदद भेजेंगे लेकिन किसी ने कुछ नहीं कहा। अगर ये ऐसा कर देते तो देश इनको सलाम करता और ये असली हीरो साबित होते लेकिन पैसे और सम्मान की भूख ने इनके पैरों में बेड़िया दाल दी ..किसी भी धर्म गुरु, मोलवी या  इमाम ने या छोटे बड़े मुस्लिम संगठन ने इस आपदा की घड़ी में मजाल कोई मदद की पेशकश की हो।  अगर ये चाहते तो बढ़चढ़ कर इस मिशन में हिस्सा लेकर राष्ट्रीय हीरो बन जाते और हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल कायम करते लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। फिल्म इंडस्ट्रीज में करोड़ों कमाने वाले एक दो को छोड़ कर किसी ने भी इस आपदा की घड़ी में सहानुभूति नहीं दिखाई । इतनी बड़ी आपदा को सरकार ही राष्ट्रीय आपदा मानने को तयार नहीं। कई हज़ार  निर्दोष लोग काल के गाल में समा गए , गाँव के गाँव जमींदोज हो गये। हजारों लोग भूख और प्यास से तड़फ रहे हैं। उनतक राहत सामग्री नहीं पहुँच रही।  इस से तो यही साबित हो रहा है कि सरकार और देश का एक बहुत बड़ा तबका मानवीय तौर पर खोखला हो चूका है , संवेदनहीन हो चूका हैं। अभी तो सिर्फ यात्रा में फंसे हुए यात्रिओं को बाहर निकलने और सुरक्षित पहुंचाने पर ही ध्यान दिया जा रहा है जबकि वहां के लोकल आदमी की तो कोई चर्चा ही नहीं कर रहा। उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। भूख और प्यास से तड़फ रहे हैं ये लोग सब कुछ तबाह हो गया। कैसे खड़े होंगे दुबारा ये लोग। कौन सहारा देगा ? सहारा ग्रुप को छोड़ कर किसी भी बड़े उद्योग पति ने इनके लिए मदद का , मकान बना कर देने का कोई वादा नहीं किया हैं। सरकार तो वैसे हे नाकारा साबित हो रही है। उत्तराखंड के लोग बदनसीब हैं। क्योंकि ये हिन्दू हैं। अगर ये सीख, इसाई या मुसलमान होते तो साड़ी भारत सरकार कारपेट की तरह बिछ जाती।  सरकार की कारगुजारियो को देखकर ही हमें बार बार हिन्दू शब्द का प्रयोग करना पड़  रहा है क्योंकि इनके साथ आज तक यही होता आया हैं।

देश के सभी सामाजिक संगठनों, सभी धनाड्य वर्ग से, बड़े उद्योगपतियो से  से करबद्द प्रार्थना करता हूँ कि दुःख की इस घड़ी में उत्तराखंड के पीड़ितो की जी जान से मदद करें और उनको खड़ा होने में सहायता करें। तीर्थ यात्री तो अपने घर वापस आ जायेंगे और कुछ समय बाद इस भयंकर त्रासदी को भूल जायेंगे लेकिन इन स्थानीय निवासिओ को तो वहीँ रहना हैं।  कहाँ जायेंगे ये मुकद्दर के मारे  के मारे  इन बेघर बेचारों की किस्मत है तुम्हारे हाथ में .. गरीबो की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा  तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा। आओ मेरे देश वासिओं इन की मदद करके वासुदेव कुटुम्बकम की भावना को चरितार्थ  करें जय हिन्द जय भारत।

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