तेलंगाना निर्माण और उभरते सवाल

telanganaअब जबकि तेलंगाना का बनना लगभग निश्चित हो गया है तो ये विचार करना उचित होगा की इसके लिए पिछले नौ साल में सेंकडों लोगों की क़ुरबानी देने की आवश्यकता क्यों हुई?यही स्थिति पंजाब और हरियाणा के निर्माण के समय भी हुआ था.लेकिन कांग्रेस की परंपरा है कि ”फूट डालो और राज करो” का अनुसरण करते हुए जब तक लोगों को आपस में लड़ाकर नोर्दोश लोगों की जानें न चली जाएँ कोई निर्णय मत करो.

तेलंगाना नाम की उत्पत्ति त्रिलिंग- तीन लिंगों वाला देश से हुई ऐसा कुछ विद्वानों का मानना है.हिन्दू मान्यता के अनुसार भगवन शिव ने लिंग रूप में तीन स्थानों -कलिश्वरम, श्रीसैलम और द्रक्षरमा में अवतार लिया.और इसी खेत्र में तेलंगाना की सीमा है.आज के तेलंगाना के उत्तर और उत्तरपश्चिम में महाराष्ट्र,पश्चिम में कर्नाटक,पूर्वोत्तर में छत्तीसगढ़ तथा पूर्व में ओडिशा स्थित हैं.इसका क्षेत्रफल ११४८४० वर्ग किलोमीटर है.और २०११ की जनगणना के अनुसार आबादी ३५२८६७५७ है.
ऐतिहासिक दृष्टि से ईसा पूर्व २३० से २२० ईसवीं तक इस क्षेत्र में सातवाहन वंश का शासन था.बाद में अनेकों राजवंशों का शासन रहने के बाद काकतीय राजवंश का शासन यहाँ का स्वर्ण युग था.जो १०८३ से १३२३ तक रहा.गणपतीदेव(११३९) काकतीय राजाओं में महानतम शासक थे.उन्होंने ही गोलकुंडा के किले का निर्माण कराया था.मालिक काफूर द्वारा १३०९ में काकतीय राजाओं के विरुद्ध हमले के बाद काकती वंश का शासन कमजोर हो गया और १३२३ में मोहम्मद बिन तुगलक द्वारा रजा प्रतापरुद्र को पराजित करके वहां मुस्लिम शासन स्थापित कर दिया.
देश की आज़ादी के समय उस क्षेत्र में निज़ाम का शासन था.निज़ाम हेदराबाद रियासत को भारत में विलय का इक्षुक नहीं था.जबकि राज्य की बहुसंख्यक जनता, जो हिन्दू थी, भारत में विलय के पक्ष में थी.निज़ाम द्वारा पाकिस्तान से भी विलय का षड्यंत्र किया जा रहा था जिसकी भनक लगते ही सरदार पटेल ने त्वरित पुलिस कार्यवाही, जिसे ओपरेशन पोलो नाम दिया गया था, करके १७ सितम्बर १९४८ को हेदराबाद रियासत का भारत में विलय करा लिया.१९५६ में राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा हेदराबाद राज्य के पुनर्गठन का प्रस्ताव करते समय तेलंगाना क्षेत्र को उसमे शामिल न करने और तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की संस्तुति की गयी थी.तेलंगाना क्षेत्र को अलग राज्य बनाने की मांग मुस्लिम रजाकार और कम्युनिस्ट भी कर रहे थे.कम्युनिस्टों के इस अभियान को बहरी ताकतों का भी समर्थन व सहयोग प्राप्त था.अंत में सेना द्वारा बल प्रयोग करके इस आन्दोलन को दबाया गया था.बाद में भी १९६९,१९७२ और २००० में तेलंगाना का आन्दोलन हुआ.२००१ से के चंद्रशेखर रो द्वारा तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन किया गया.कांग्रेस ने तेलंगाना के गठन का आश्वासन भी दे दिया था.लेकिन अपनी परंपरा के अनुरूप कांग्रेस अपने वाडे से पीछे हट गयी और आन्दोलन को उग्र बनने दिया.अब जब पानी सर से ऊपर जाने लगा और राजनीतिक रूप से सफाया होता दिखाई देने लगा तो आनन् फानन में तेलंगाना बनाने का निर्णय लिया गया.लेकिन यहाँ भी वाही गलती दोहराई गयी जो पंजाब और हरयाणा की संयुक्त राजधानी चंडीगढ़ बनाने में की थी.
बहरहाल जैसा की दिग्विजय सिंह ने कहा है निर्णय होने के बाद भी कानूनों प्रक्रिया पूरी होने और निर्णय को मूर्त रूप लेने में कमसे कम पांच महीने लग जायेंगे.इस बात की पूरी आशंका है की उससे पहले ही वर्तमान लोकसभा का विघटन होकर चुनावों की घोषणा हो जाएगी और तेलंगाना का सवाल वहीँ का वहीँ लटका रह जायेगा.
तेलंगाना के निर्णय के बाद जो अन्य क्षेत्रों में नए राज्यों की पेंडिंग मांग ठंडी पड़ी हैं उनको भी नया जीवन मिल जायेगा.और नए राज्यों के निर्माण की मांग में तेजी आएगी.उससे कैसे निबटा जायेगा ये भी अभी देखना शेष है.

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