लेखक परिचय

राजेंद्र जोशी

राजेंद्र जोशी

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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नौ नवम्बर को उत्तराखण्ड 10 वर्ष का हो गया । यूं तो दस साल का सफर कोई बहुत ज्यादा नहीं होता लेकिन खुदा कसम बहुत कम भी तो नहीं होता। दस वर्षों में किसी भी नवजात शिशु के आकार मजबूत तथा उसकी बुनियाद ठोस पड़ती है। लेकिन अफसोस कि शिशु रूपी यह उत्तराखण्ड कुपोषण का शिकार हो गया।

   जिस राज्य ने इन दस सालों में पांच मुख्यमंत्री तथा आठ मुख्य सचिव बदलते हुए देखे हों उस राज्य में तरक्की की कल्पना करना भी बेइमानी जैसी लगती है। राज्य के मुख्यमंत्री खजाना लुटाने में मस्त रहे तो नौकरशाही दुम हिलाकर इस खजाने को ठिकाने लगाने में मशगूल रही। राजनीतिक तौर पर भले ही कंगाली आज भी जारी है लेकिन राजनेताओं व ब्यूरोक्रेट के गठजोड़ ने इस राज्य को लूटने का पूरा इंतजाम कर रखा है। जहां उत्तरप्रदेश के जमाने में इस राज्य को दो मण्डलायुक्त चलाते थे वहीं इस राज्य को अब एक मुख्यमंत्री सहित दो -दो मुख्य सचिव चला रहे हैं। कर्मचारियों के वेतन के लिए तो हर दस साल में आयोग समीक्षा करता है लेकिन प्रदेश के नेताओं तथा दायित्वधारियों को प्रमुख सचिवांे के बराबर वेतन की मंजूरी जरूर मिल गयी है। जो लगभग हर साल बढ़ रही है। इतना ही नहीं यह प्रदेश ब्यूरोक्रेटों के सेवा काल के बाद रोजगार का आशियाना भी बन गया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शायद उत्तराखण्ड देश का एकमात्र ऐसा राज्य होगा जहां बेरोजगारों को तो रोजगार के अवसर अभी तक नहीं ढूंढे जा सके है लेकिन सेवानिवृति के बाद बड़े अधिकारियों के रोजगार के अवसर सुरक्षित हैं। इस राज्य की इससे बड़ी बदकिस्मती क्या हो सकती है कि दस वर्षो के बाद भी इसकी अपनी कोई स्थायी राजधानी नहीं है। सरकारें दीक्षित आयोग की आड़ में जनता भी भावनाओं और पहाड़ी राज्य की अवधारणा से खुलेआम खिलवाड़ कर रही है।जबकि वहीं दूसरी ओर देहरादून में स्थायी राजधानी के पूरे इंतजामात सरकारों ने कर दिया है। देहरादून में अब तक कई विभागों ने अपने स्थायी निदेशालयों तक के भवन तैयार ही नहीं कर दिये बल्कि वहां से काम भी शुरू हो चुका है।

  राजनीतिक स्वार्थ की चर्बी राजनेताओं में इस हद तक चढ़ चुकी है कि परिसीमन जैसा गंभीर मुद्दा नेताओं ने स्वीकार कर अंगीकृत तक कर लिया है। नये परिसीमन का आलम यह है कि वर्ष 2032 के बाद उत्तराखण्ड के पहाड़ी हिस्सों में कुल 19 सीटें ही बच पायेंगी। जबकि 51 सीटों के साथ मैदान मालामाल होंगे। साफ है कि आने वाले दो दशक बाद हम एक बार फिर उत्तरप्रदेश के दूसरे संस्करण का हिस्सा होंगे। वहीं दूसरी ओर देश में उत्तराखण्ड जैसी परिस्थिति वाले उत्तर-पूर्वी राज्यों में आवादी के हिसाब से नहीं बल्कि भौगोलिक क्षेत्रफल के आधार पर विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन किया गया है। उत्तराखण्ड के साथ यह बड़ी विडम्बना ही कही जा सकती है कि यहां अब भी उत्तरप्रदेश की मानसिकता वाले राजनीतिज्ञ व ब्यूरोक्रेट राजनीति व नीतिनिर्धारण में पूरी तरह से सक्रिय है जिसके चलते राज्य गठन की मूल अवधारणा पूरी नहीं हो पा रही है बल्कि नये परिसीमन तो कुछ पहाड़ विरोधी नेताओं को ऐसे हथियार के रूप में मिला है जो उत्तराखण्ड के स्वरूप को ही बिगाड़ देगा। आगे चल कर यह राज्य उत्तराखण्ड की जगह दो खण्डों में विभक्त न हो जाये इससे इंन्कार नहीं किया जा सकता। विकास का सारा आधारभूत ढांचा जिस तरह से राज्य के तराई के क्षेत्र में ही विकसित किया जा रहा है यह इस बात का रोल माडल है कि तराई मिनी उत्तरप्रदेश के रूप में तब्दील होता जा रहा है। 

   पलायन पहाड़ की सबसे बड़ी समस्या रही है। लेकिन राज्य बनने के बाद यह मर्ज कम होने के बजाय और बढ़ गया है। पहाड़ों के जो लोग पहले लखनऊ, दिल्ली व मुम्बई जैसे स्थानों पर रोजगार की तलाश करते-करते बर्तन मांजते थे। नीति निर्धारकों ने उनके  लिए रोजगार के नये दरवाजे खोलने के बजाय बर्तन मलने की देहरादून, हरिद्वार तथा हलद्वानी जैसे स्थानों पर व्यवस्था कर दी है। उत्तराखण्ड से बाहर के लोगों से रिश्वत लेकर इन्हे माई बाप बनाने में हमारे नेता एक सूत्रीय कार्यक्रम में जुटे हुए हैं। खेती बाड़ी पहले ही बिक चुकी थी सो रहे सहे गाड़ गधेरे इन सरकारों ने बेच डाले हैं। दस सालों में पंचायती राज एक्ट, कृषि नीति, शिक्षा नीति और न जाने कितनी ही और नीतियां नहीं बन पायी हैं। विकास की चकाचौंध हलद्वानी, हरिद्वार और देहरादून में ही दिखायी देती है। इसकी एक नन्ही सी किरण भी पहाड़ी गांवों व कस्बों तक नहीं पहुंची है। अपराधी और माफियाओं के लिए सत्ता प्रतिष्ठान आश्रय के केन्द्र बने हुए हैं तो सत्ताधीश उनके कवच का का कर रहे हैं। राजनीतिक कंगाली इस हद तक गहरा गयी है कि विकास की उम्मीदों के अब सिर्फ निशां ही बाकी हैं। राज्य का असल नागरिक लाचार और हताश है।

One Response to “हताशा व निराशा के दस साल”

  1. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    उत्तरांचल या उत्तराखंड जो भी नाम दें आधनिक भौतिकवादी ग्लोवल विकास से जितना दूर रहेगा और पृकृति के नजदीक रहेगा उतना ही जीवंत और निसर्गिक होगा .

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