कश्मीर घाटी में आतंकी संगठनों की नई रणनीति

लेकिन महबूबा मुफ़्ती ने आतंकियों के राजनैतिक दबाब और आतंक के भय में आने से इन्कार कर दिया । उन्होंने स्पष्ट कहा कि आतंकी और उनके समर्थक अपने बच्चों को तो बाक़ी प्रदेशों में पढ़ने के लिए भेज रहे हैं और ग़रीब के बच्चों को आगे करके उनका दोहन कर रहे हैं । सैयद अहमद शाह गिलानी की पोती के हाथ में पोथी और लाल चौक में ज़मीन पर बैठ कर सब्ज़ी बेचने वाले के बेटे के हाथ में पत्थर ।

kashmirडा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

कश्मीर घाटी में पिछले लम्बे अरसे से पाकिस्तान ने छद्म युद्ध छेड़ रखा है । ज़ाहिर है इस युद्ध के लिए परम्परागत तरीक़ों और हथियारों का तो इस्तेमाल नहीं हो सकता । इसे कुछ विशेषज्ञ हज़ार घाव देने वाला युद्ध भी कहते हैं । यानि शत्रु के शरीर पर एक एक कर हज़ार घाव कर दो ताकि वह निस्तेज हो जाए । पाकिस्तान भारत के शरीर पर हज़ार घाव करने के प्रयास में ही लगा हुआ है , क्योंकि आर पार की लड़ाई वह १९४७ से लेकर कारगिल युद्ध तक चार बार कर चुका है लेकिन उसमें सफल नहीं हुआ । हज़ार घाव करने की लड़ाई उसने कश्मीर घाटी के कुछ लोगों को भी शामिल कर लिया है । ये लोग क्षीण अल्पमत के लोग हैं लेकिन इन्होंने कश्मीर घाटी के बहुसंख्यक लोगों को एक प्रकार से बन्धक बना लिया है । बन्धक बने ये लोग कभी हुर्रियत कान्फ्रेंस के लोगों द्वारा जारी किए गए कैलण्डर का पीछा करते हैं , कभी किसी आतंकवादी गुट द्वारा जारी प्रैस विज्ञ्प्ति को पढ़ कर ही लाल चौक सुनसान हो जाता है । बहुत ही गहरी रणनीति से भूमिगत और उनके भूमि के ऊपर विचर रहे समर्थक भय और आतंक का वातावरण बना कर कश्मीर घाटी को बन्धक बनाए हुए हैं । इस प्रकार के वातावरण में समाजविरोधी तत्व धन सम्पत्ति जुटाने और उगाहने के अभियान में जुट जाते हैं । लेकिन यह सब कुछ तब तक ही संभव है यदि सरकार अपवित्र नैक्सस को तोड़ने में असफल रहती है । अब तक भारत सरकार का तरीक़ा किसी भी ढंग से इस अपवित्र आतंकी गठबन्धन से बातचीत करके कोई बीच का रास्ता निकालने का ही रहा है । उससे शान्ति की कुछ समय के लिए लीपापोती तो होती रहती है लेकिन अन्दर पनप रहे कीड़े नहीं मरते । आम जनता और भी ज़्यादा भयग्रस्त हो जाती है । उसको लगता है जब आतंकी गठबन्धन का सरकार कुछ नहीं बिगाड़ पाती तो हमारी क्या बिसात है । कश्मीर घाटी में पिछले तीस साल से यही हो रहा है । वहाँ के स्थानीय राजनीतिज्ञों को इस आतंकी वातावरण से असीम लाभ मिलता है । वे दिल्ली को डराते रहते हैं कि कश्मीर घाटी और दिल्ली के बीच वे ही इस नाज़ुक दौर में सेतु का काम कर सकते हैं । उनके बिना कश्मीर घाटी से संवाद समाप्त हो जायेगा । इस संवाद के लोभ में उनके भ्रष्ट आचरण की ओर कोई ध्यान नहीं देता । आज कश्मीर घाटी में शेख़ अब्दुल्ला का कुनबा भ्रष्टाचार को लेकर इतना बदनाम है कि उनके भ्रष्ट आचरण की सुगन्ध खाने के लिए वहाँ का बच्चा बच्चा तैयार है । लेकिन आप उनके इस भ्रष्टाचार की जाँच नहीं कर्णाटक सकते क्योंकि उनके अनुसार इससे घाटी की स्वायत्तता का हनन होता है । इसी स्वायत्तता की रक्षा करते करते दिल्ली ने घाटी में पाकिस्तान पोषित राक्षस को जेहलम किनारे पसरने दिया ।
लेकिन लगता है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने सत्ता में आने पर कश्मीर घाटी को समझने का मुहावरा बदल लिया है । पहली बार भारत सरकार ने कश्मीर घाटी में सचमुच का विधान सभा चुनाव करवा दिया ।पहला चुनाव जिसमें वहाँ के लोगों को लगा कि वे अपना प्रतिनिधि केवल रस्सी तौर पर नहीं बल्कि सही अर्थों में स्वयं चुन सके । यह आतंकवादियों और पाकिस्तान दोनों के लिए चौंक उठने का समय था । मोदी ने बातचीत का रास्ता तो पाकिस्तान से भी खुला रखा , लेकिन बातचीत की भाषा बदल गई । अब रिरियाने या सफ़ाई देने या माँगने की भाषा न रहकर मोटा मोटी खरी खरी सुनाने की भाषा हो गई । आतंकवादियों ने एक बार फिर बुरहान बानी के मरने के मौक़े का लाभ उठाकर कश्मीर बन्द और लाल चौक बन्द की पुरानी क़वायद शुरु कर दी । पत्थर फेंकने का पुराना सिलसिला । जगह जगह कुछ हज़ार लोगों के प्रदर्शन । सेना पर हमला । नियंत्रण रेखा पर फ़ायरिंग इत्यादि इत्यादि । लेकिन इस रणनीति का सबसे अहम हिस्सा था , पत्थर फेंकते रहो ताकि सरकार के पास कर्फ़्यू लगाने के अलावा कोई चारा न रहे । सरकार बन्दूक़ चलाए तो लाशों की गिनती बताओ और पैलेट गन चलाए तो शरीर पर लगे छर्रों का हिसाब किताब प्रसारित करते रहो । भारत सरकार कितने दिन यह दबाब झेल सकेगी ? गिलानी का पुराना अनुभव महीना दो महीना बताता था । उसके बाद सरकार फिर आकर किसी गिलानी- खुरासानी-करमानी-हमदानी के दरबाजे पर नाक रगड़ेगी । तब फिर वही पुराना सिलसिला शुरु हो जायेगा । लेकिन नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पाकिस्तान और कश्मीर घाटी में सक्रिय उसके आतंकी संगठनों को अलग अलग उत्तर उन्हीं की भाषा में दिया । पाकिस्तान को उन्होंने बलोचिस्तान की चिन्ता करने के लिए कहा । बताया कि मजलूम बलोचों पर पाकिस्तान की पंजाबी सेना अत्याचार कर रही है । यह भी कहा कि जम्मू कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के क़ब्ज़े में है वहाँ के लोग भारतीय नागरिक ही हैं । पाकिस्तान की पंजाबी सेना वहाँ भी बहुसंख्यक शिया समाज को मार रही है और पाकिस्तान से मुसलमानों को ला लाकर वहाँ बसा रही है । उसे बन्द कर देना चाहिए । गिलगित बल्तीस्तान में इससे एक बारगी तूफान आ गया । वहाँ के लोगों को लगा कि उनकी चिन्ता करने वाला भी कोई है । वहाँ भारत ज़िन्दाबाद के नीरे लगने लगे । बलोचिस्तान के लोग आभार जताने लगे कि किसी ने तो उनकी चिन्ता की ।
दूसरा उत्तर मोदी सरकार ने आतंकी संगठनों को दिया । सरकार किसी गिलानी के पास नहीं गई । यदि बात करनी होगी तो जनता के चुने हुए नुमांयदों के साथ की जायेगी । सीपीएम के कुछ लोग भाग कर गिलानी के दरवाज़े तक गए भी लेकिन झल्लाए गिलानी ने उनके लिए दरवाज़ा खोलने से भी इन्कार कर दिया । आतंकियों ने उड़ी में सेना के शिविर पर आक्रमण किया तो भारतीय सेना ने जम्मू कश्मीर के पाकिस्तान द्वारा क़ब्ज़ा किए गए इलाक़े के अन्दर घुस कर आतंकी शिविरों को नष्ट कर दिया । मोदी सरकार के इस क़दम से तो पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में भी भूचाल आ गया । आतंकी संगठनों को लगता था कि वे दबाब का वातावरण बना कर प्रदेश की मुख्यमंत्री को डरा लेंगे और वह डर कर सरकार से हाथ खींच लेगी तो दिल्ली और घाटी आमने सामने है , ऐसा माहौल बनाने में सहायता मिलेगी । आज तक प्रदेश में यही होता रहा है । वहाँ का मुख्यमंत्री या तो आतंकियों के आगे हथियार डाल देता था या फिर आतंकियों की भाषा में ही बोलना शुरु कर देता था । फ़ारूक़ अब्दुल्ला तो अभी तक रट लगा रहे हैं कि सरकार और किसी से बात करे न करे , हुर्रियत कान्फ्रेंस से जरुर कर ले । दरअसल फ़ारूक़ अब्दुल्ला जैसे लोग ही हैं जो घाटी में हुर्रियत कान्फ्रेंस जैसी तंजीमों को ज़िन्दा रखते हैं । लेकिन महबूबा मुफ़्ती ने आतंकियों के राजनैतिक दबाब और आतंक के भय में आने से इन्कार कर दिया । उन्होंने स्पष्ट कहा कि आतंकी और उनके समर्थक अपने बच्चों को तो बाक़ी प्रदेशों में पढ़ने के लिए भेज रहे हैं और ग़रीब के बच्चों को आगे करके उनका दोहन कर रहे हैं । सैयद अहमद शाह गिलानी की पोती के हाथ में पोथी और लाल चौक में ज़मीन पर बैठ कर सब्ज़ी बेचने वाले के बेटे के हाथ में पत्थर ।
अब पाकिस्तान की शह पर आतंकी संगठनों ने निराशा में आकर अपनी अंतिम चाल चली है । उन्होंने घाटी में स्कूलों को बन्द करवाना या जलाना शुरु कर दिया है । उन्होंने धमकियाँ देना शुरु कर दी हैं कि कोई बच्चा परीक्षा देने के लिए स्कूल में न जाए । जब तक पाकिस्तान के साथ मिल तर आतंकी कश्मीर घाटी को आज़ाद नहीं करवा लेते तब तक विद्यार्थियों को पढ़ने व परीक्षा देने जैसे ग़ैर इस्लामी काम छोड़ने होंगे । प्राथमिकता घाटी की आज़ादी है न कि स्कूल की परीक्षा । लेकिन ख़ास ख़ास मामलों में कुछ बच्चों को परीक्षा देने की छूट भी दे दी गई । जिस स्कूल में हुर्रियत कान्फ्रेंस के सदर सैयद अहमद शाह गिलानी की पोती पढ़ती है , उस स्कूल को छेड़ा नहीं गया । ताकि गिलानी की पोती परीक्षा दे ले । आख़िर बच्ची के भविष्य का सवाल है । लेकिन शेष बच्चों को स्कूल जाने से रोकना जरुरी है । उद्देष्य स्पष्ट है । ग़रीब का बच्चा पढ़ेगा तो सोचेगा । सोचेगा तो समझेगा भी जरुर । एक बार वह समझ गया तो गिलानियों, हमदानियों, खुरासानियों और करमानियों की दुकान बन्द नहीं हो जायेगी ? पाकिस्तान और पाकिस्तान की पंजाबी सेना का स्वार्थी चेहरा भी बेनक़ाब हो जायेगा । लेकिन लगता है यह पाकिस्तान और आतंकी संगठनों की घाटी में अंतिम लड़ाई है जो धीरे धीरे घाटी के आम आदमी तथा वलोचिस्तान और गिलगित बल्तीस्तान के शोर में डूब जायेगी ।

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